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अटल अशेषः मैं जी भर जिया

भारत के लोकतंत्र की अवधारणा, इसकी विविधता और धर्मनिरपेक्षता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता हमेशा बरकरार रही और उन्होंने इसे आगे बढ़ाने के प्रयास किए. गठबंधन की सरकार चलाने के लिए देश को एक ऐसे नेता की जरूरत थी जो व्यक्तिवादी न हो बल्कि सामूहिक और समावेशी राजनीति का पक्षधर हो. अटल जी के पास सिर्फ 6 साल का समय था, पर उन्होंने देश के हित में ऐसे फैसले लिए जिसने भारत को आगे बढ़ाया. 
अटल अशेषः मैं जी भर जिया बंदीप सिंह
सुधींद्र कुलकर्णीनई दिल्ली, 22 August 2018

भारत के 12वें प्रधानमंत्री के रूप में अपना कार्यकाल पूरा करके मई 2004 में दफ्तर छोडऩे के बाद से अटल बिहारी वाजपेयी खराब स्वास्थ्य के कारण घर की चहारदीवारी तक सीमित होकर रह गए थे. कई वर्षों तक उनकी आवाज तक नहीं सुनी गई—एक ऐसे नेता की जिन्हें स्वतंत्र भारत के सबसे ओजस्वी वक्ता के रूप में जाना जाता हो, इससे दुखद और क्या होता! इसके बावजूद वाजपेयी किसी की स्मृतियों से लेशमात्र भी ओझल नहीं हुए. उनकी विरासत राष्ट्रीय राजनीति और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), दोनों के लिए अब भी प्रासंगिक है. भारत के पूर्व प्रधानमंत्रियों में जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के बाद सबसे ज्यादा उन्हें ही याद किया जाता है.

अटल के बाद प्रधानमंत्री बनने वाले वाले डॉ. मनमोहन सिंह 10 वर्षों तक इस पद पर रहे. मनमोहन सिंह के बाद पद संभालने वाले नरेंद्र मोदी ने वाजपेयी की तुलना में ज्यादा बड़ा संसदीय जनादेश जीता. पर मोदी ने जान-बूझकर ऐसी शासन शैली अपनाई जो वाजपेयी के तौर-तरीकों से बिल्कुल अलग थी—मनमोहन सिंह से भी अलग. शासन का मोदी का तरीका बहुत व्यक्तिवादी है. न केवल अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों को हाशिये पर रखा गया है, बल्कि इस बात की कोशिश हुई कि देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरू समेत मोदी के सभी पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों को जनमानस की स्मृति धुंधला कर दिया जाए. अपनी सरकार को एक व्यक्ति तक सिमटी सरकार बनाने के अलावा मोदी भाजपा को भी एक व्यक्ति मात्र तक सिमटी पार्टी बना देना चाहते हैं. वह पार्टी जिसकी स्थापना वाजपेयी ने 1980 में की थी.

वाजपेयी देश की चेतना में एक ऐसे संवेदनशील कवि-राजनेता के रूप में अपनी मौजूदगी हमेशा दर्ज कराते रहे जिनकी लोकप्रियता पूरे देश में थी. राजनीति के पंडित कुछ समय के लिए खासतौर पर मोदी और वाजपेयी की बीच तुलना करना जारी रखेंगे.

जब तक कि बीमारी ने वाजपेयी को अक्षम नहीं किया तब तक अटल भाजपा के सबसे कद्दावर और करिश्माई नेता बने रहे और उन्होंने पार्टी के उचित मंचों पर अलग-अलग दृष्टिकोणों को भी व्यक्त करने की इजाजत दी. दरअसल, उन्होंने समझ लिया था कि अगर भाजपा किसी भी नेता या निश्चित विचारधारा की जकड़ में आ जाती है तो वह तरक्की नहीं कर सकती. यहां तक कि हिंदुत्व भी, और हम सबको निकट भविष्य में इसका भी आभास हो जाएगा.

यही कारण है कि भाजपा कभी किसी एक नेता के कब्जे वाली पार्टी नहीं बन सकती. वैचारिक और संगठनात्मक रूप से भी, भाजपा को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) नियंत्रित करता है. 1971 में द्वितीय सरसंघचालक गुरुजी गोलवलकर के निधन के बाद, आरएसएस सभी स्तरों पर सामूहिक परामर्श के सिद्धांत पर तेजी से काम कर रहा है. यह किसी भी भाजपा नेता को पार्टी का सर्वोच्च नेता बनने और अतीत की अपनी मेहनत को दरकिनार करने की अनुमति नहीं देगा क्योंकि इससे पार्टी पर उसकी पकड़ ढीली हो जाएगी.

भाजपा एक ओर तो कमोबेश आरएसएस द्वारा निर्धारित खांचे में रहेगी और दूसरी ओर वाजपेयी द्वारा तैयार उस खांचे में जो उन्होंने अपने आजीवन वफादार सहयोगी लालकृष्ण आडवाणी के साथ मिलकर तैयार किया है. आरएसएस की विचारधारा में वाजपेयी विश्वास नहीं करते थे.

दरअसल, राजनीति में उनका अनुभव जैसे-जैसे बढ़ता गया, उन्हें समझ आने लगा कि आरएसएस का विश्व दृष्टिकोण बहुत संकीर्ण है. हालांकि वे अपने स्वयंसेवकों के अनुशासन और समर्पण तथा एक परिष्कृत व एकजुट हिंदू समाज के आधार पर भारत को एक मजबूत राष्ट्र बनाने के संघ की प्रतिबद्धता के प्रशंसक रहे, फिर भी राष्ट्र निर्माण के वाजपेयी के दृष्टिकोण में अतिवाद के लिए स्थान नहीं था. एक बार वे आरएसएस के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार पर लिखी एक पुस्तक के विमोचन में जा रहे थे. अचानक उन्होंने यह पूछकर मुझे चैंका दिया, "भारत के स्वाधीनता आंदोलन में डॉ. हेडगेवार का क्या योगदान था?'' मुझे लगा कि शायद वे हेडगेवार का कोई बड़ा योगदान नहीं मानते थे.

फिर भी, वाजपेयी ने यह भी महसूस किया कि भाजपा आरएसएस से अलग नहीं हो सकती है. प्रधानमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) और स्वदेशी जागरण मंच ने कई बार उनकी आलोचना की. वाजपेयी की मुश्किलें बढ़ाने के लिए 2001 में वीएचपी ने अयोध्या आंदोलन को फिर से हवा देनी शुरू की. उसने मांग की कि 6 दिसंबर, 1992 तक जहां बाबरी मस्जिद खड़ी थी और कारसेवकों ने उसे गिराकर मूर्तियां स्थापित की थीं, उस विवादित स्थल की 67 एकड़ जमीन उसको तत्काल दी जाए, ताकि वहां राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो. मैंने एक बार उनसे पूछा कि उनकी सरकार को कमजोर करने के वीएचपी के प्रयासों पर वे सख्त रवैया क्यों नहीं अपना रहे. उनका जवाब था, "अगर हम वीएचपी से टकराने का निर्णय करते हैं तो भाजपा टूट जाएगी.'' वाजपेयी ने इस तरह संघ परिवार के खांचे के भीतर भी स्वयं और अपनी पार्टी, दोनों के लिए एक स्वाधीन स्थान तैयार करने की कोशिश की. कुछ लोग इसे उनकी कमजोरी भी कह सकते हैं पर वे राजनीति में यथार्थवादी और व्यावहारिक थे.

भारत के लोकतंत्र, इसकी विविधता के प्रति सक्वमान, धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा और विकास के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को उन्होंने कभी कम नहीं होने दिया. उनकी राजनीति की ये चार परिभाषित विशेषताएं थीं. ये चारों भारत के लिए हमेशा प्रासंगिक रहेंगे और किसी भी नेता या संगठन द्वारा उन्हें कमजोर करने का कोई भी प्रयास आत्मघाती सिद्ध होगा.

पार्टी के मामलों से लेकर राष्ट्रीय राजनैतिक परिदृश्य में भी वाजपेयी बेहद लोकतांत्रिक थे. गुजरात में बड़े पैमाने पर हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद वाजपेयी गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदी का इस्तीफा चाहते थे. पर आडवाणी और 2002 में गोवा के सत्र में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बहुमत की राय को देखते हुए वे पीछे हट गए. जॉर्ज फर्नांडीस और जसवंत सिंह की मदद से उन्होंने और आडवाणी ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) बनाया था. इसमें शामिल कई दल पहले भाजपा के मुखर विरोधी थे. फिर भी, वे अगर भाजपा के साथ खड़े हुए तो यह वाजपेयी के प्रति उन दलों के विश्वास के कारण संभव हुआ.

देश के इतिहास में वाजपेयी का एनडीए पहला सफल गठबंधन था. उन्होंने एनडीए को एक ऐसे सियासी मंच के रूप में माना जो क्षेत्रीय भावनाओं और गौरव के साथ एक सुदृढ़ भारत की सोच के साथ चलता था. उन्होंने एनडीए पर भाजपा का एजेंडा नहीं थोपने दिया (विशेष रूप से इसके तीन प्रमुख मुद्दे—अयोध्या में राम मंदिर, समान नागरिक संहिता और संविधान के अनुच्छेद 370 को रद्द करना जिसमें भारतीय संघ के भीतर जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा दिया गया है). उन्होंने गठबंधन को एकजुट रखने के लिए "गठबंधन धर्म'' शब्द दिया. उन्होंने जो कहा उसका खुद पालन भी किया. उनके नेतृत्व और भारत को विकास के रास्ते पर सरपट दौड़ाने के उनके दृढ़ संकल्प की विपक्ष ने भी प्रशंसा की. मिसाल के तौर पर, वाजपेयी ने एक बार बिजली क्षेत्र के सुधारों पर मुख्यमंत्रियों की एक बैठक बुलाई थी. लेकिन लोगों की राय थी कि केंद्र में भाजपा की अगुआई वाली सरकार विपक्षी दलों, खासतौर से कांग्रेस शासित राज्यों को मनाने में सक्षम नहीं होगी. फिर भी, कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह, जो मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री थे, ने बैठक में कहाः "अटलजी, कृपया इन कठिन सुधारों को पेश करें. हम आपका समर्थन करते हैं और हम यह भी जानते हैं कि सिर्फ आप ही ऐसा कर सकते हैं.''

वाजपेयी ने विपक्षी दलों से सम्मान प्राप्त किया था, क्योंकि वे खुद विपक्षी दलों और नेताओं के प्रति सम्मान दिखाते थे. वे अक्सर कहते थे कि लोकतंत्र सिर्फ संख्याओं का एक खेल भर नहीं है, जिसमें 51 फीसदी लोग सोचें कि उन्हें 49 फीसदी लोगों की अनदेखी करने का अधिकार है. यह लोकतांत्रिक मानसिकता की मांग करता है. असहिष्णुता और अहंकार की जगह सहनशीलता, विनम्रता और भिन्न दृष्टिकोण वाले लोगों के साथ भी काम करने की इच्छा होनी चाहिए.

भारतीय राजनीति कभी दो-दलीय प्रणाली नहीं बनने वाली और न ही यह कभी साम्यवादी शासन वाले चीन की एक पार्टी प्रणाली को गले लगाएगी. इसलिए, वाजपेयी के सिद्धांत और गठबंधन शासन का तरीका हमेशा प्रासंगिक रहेगा.

भारतीय संदर्भ में लोकतंत्र व विविधता के प्रति सम्मान कहीं अधिक निकटता से जुड़ा हुआ है, और इस बात को वाजपेयी ने अपने दौर के अधिकांश नेताओं से बेहतर समझा. दूसरों पर पूर्ण प्रभुत्व स्थापित करने में कोई समुदाय, संगठन या विचारधारा कभी सफल नहीं हो सकती है. वाजपेयी इसे जानते थे. सो, उन्होंने मौजूदा भाजपा नेताओं द्वारा "कांग्रेस-मुक्त भारत'' बनाने की अहंकारी और अदूरदर्शी बात की अनुमति कभी नहीं दी होती.

धर्मनिरपेक्षता में वाजपेयी का विश्वास लोकतंत्र और विविधता के प्रति उनकी धारणा का एक सहज परिणाम था. यह धर्मनिरपेक्षता का कांग्रेसी ब्रांड नहीं था, जिसमें जान-बूझकर या अनजाने में मुस्लिमों को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया जाता था. वह धर्मनिरपेक्षता का कम्युनिस्ट ब्रांड भी नहीं था जिसमें जान-बूझकर भारत की हिंदू छवि को खराब करने की कोशिश होती है. कांग्रेस और वामपंथियों ने भाजपा पर "सांप्रदायिक पार्टी'' बताते हुए जितना हमला बोला, उतना ही वे भाजपा को अपने पक्ष में हिंदुओं को गोलबंद करने में मदद करते गए. वाजपेयी कभी भी अपनी हिंदू विशेषताओं स्वीकार करने से पीछे नहीं हटे. उनकी एक शुरुआती कविता जो आज भी भाजपा-संघ समर्थकों में बहुत लोकप्रिय है इसकी स्वीकारोक्ति है. उसकी पंक्तियां इस तरह हैं, "हिंदू तन-मन, हिंदू जीवन, रग-रग हिंदू मेरा परिचय.''

फिर भी, किसी भी सच्चे हिंदू की तरह, वे कभी भी मुस्लिम या इस्लाम विरोधी नहीं रहे. राजनीति में उनके लंबे अनुभव से उनका विश्वास और पक्का हुआ कि भारत धर्मनिरपेक्षता के प्रति अपनी वचनबद्धता को त्याग नहीं सकता. जब 1980 में भाजपा की स्थापना हुई, तो उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि "सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता'' को पार्टी अपनी मूल विचारधारात्मक प्रतिबद्धताओं में से एक के रूप में शामिल करे. पार्टी ने इस वचनबद्धता की "सभी के लिए न्याय, किसी का तुष्टिकरण नहीं'' के रूप में व्याख्या की.

यह अलग बात है कि वाजपेयी ने 1980 में जनता पार्टी की विरासत के वास्तविक उत्तराधिकारी के रूप में भाजपा के लिए जो राह तय की थी, वह उस पर कायम नहीं रह सकी. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 के संसदीय चुनावों में हुई अपमानजनक हार, जिसमें वाजपेयी को हार का सामना करना पड़ा था, के बाद भाजपा ने अपने पुनरुत्थान के लिए अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के मुद्दे को छेड़ दिया. वाजपेयी दिल से कभी नहीं चाहते थे कि अयोध्या आंदोलन में पार्टी भाग ले लेकिन उनके सबके निर्णय के आगे झुकना पड़ा. हालांकि जब भाजपा को ऐसा लगा कि अयोध्या मुद्दा उसे सत्ता में नहीं पहुंचा सकेगा तो उसने फिर से वाजपेयी की समावेशी राजनीति के ब्रांड की ओर रुख किया. यह आरएसएस और वीएचपी के कट्टरपंथी खेमे को पसंद नहीं था.

इसलिए, जब 2004 में वाजपेयी एनडीए को फिर से सत्ता में वापस लाने में नाकाम रहे तो इस खेमे ने जोर देकर कहा कि भाजपा को अपने हिंदुत्व के एजेंडे पर लौटना होगा. भाजपा की हार ने उन्हें उदास कर दिया था क्योंकि शासन के अपने एजेंडे से जुड़े कई काम—विशेष रूप से, पाकिस्तान के साथ संबंधों को सामान्य बनाने के उनके लगातार प्रयास—अधूरे रह गए थे. वे इस बात से भी उतने ही दुखी थे कि संघ परिवार के भीतर से कई आवाजें इस हार के पीछे वाजपेयी के हिंदुत्व के एजेंडे को छोड़ देने को जिम्मेदार बता रही थीं. मुझे चुनावी हार के कारणों पर विचार-विमर्श के लिए अगस्त 2004 में गोवा में आयोजित एक "चिंतन शिविर'' याद है.

हिंदुत्व का मुद्दा चर्चा के लिए आया, लेकिन अटलजी इसमें हस्तक्षेप करने से बचते रहे. टी ब्रेक के दौरान, जब मैं उनके साथ अकेले बैठा था. वे काफी देर तक मौन रहे, फिर अचानक उनके एक सवाल ने मुझे पूरी तरह झकझोर दिया. उन्होंने पूछा, "यह हिंदुत्व क्या होता है?'' इस प्रश्न में ही उत्तर छुपा था—वाजपेयी हिंदुत्व में विश्वास नहीं करते थे—या कम से कम हिंदुत्व की उस व्याख्या में तो कतई नहीं, जो आरएसएस-वीएचपी में उनके आलोचकों ने दी थी. भारत अपने विविधतापूर्ण समाज के हर वर्ग को साथ लेकर ही अच्छा शासन दे सकता है, यह कहने का उनका अपना तरीका था.

वाजपेयी की सबसे बड़ी उपलब्धि सुरक्षा और विदेशी नीति के क्षेत्र में रही. उन्होंने पाकिस्तान और चीन के साथ संबंधों को सामान्य बनाने के ईमानदार प्रयास किए. वे समझते थे कि अगर भारत को तरक्की की रफ्तार तेज करनी है तो उसे इन दो अहम पड़ोसियों के साथ विरासत में मिले विवादों का निपटारा करना ही होगा. 1991 में करगिल में विश्वासघात के बावजूद पाकिस्तान के साथ बातचीत के उनके प्रयासों में एक दूरदर्शी राजनेता की झलक मिलती थी. वाजपेयी ने जनता पार्टी सरकार (1977-79) में विदेश मंत्री के रूप में 1962 के युद्ध के बाद भारत-चीन संबंधों को बहाल करने की दिशा में पहली सफलता हासिल की थी.

वाजपेयी जब प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने भारत-चीन आधिकारिक वार्ता के केंद्र में में सीमा विवाद को लेकर आने जैसा एक साहसी कदम उठाया. 2003 में बीजिंग की अपनी यात्रा के दौरान, उन्होंने और चीनी नेतृत्व ने सीमा विवाद पर बातचीत के लिए दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों के बीच बातचीत का एक मसौदा तैयार करने का फैसला किया. उनके भरोसेमंद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्रा और चीन के वरिष्ठ उपाध्यक्ष दाई बिंगगुओ वार्ता को सही दिशा में आगे ले गए. बिंगगुओ ने अपने संस्मरणों में उल्लेख किया है कि यदि वाजपेयी फिर से सत्ता में आते तो सीमा विवाद को निपटाने को लेकर बेहतर सर्वसम्मति बन सकती थी.

वाजपेयी के देहांत के साथ ही भारत की राजनीति में एक युग का अंत हो गया.

(सुधींद्र कुलकर्णी 1998 से 2004 के दौरान प्रधानमंत्री कार्यालय में अटल बिहारी वाजपेयी के सहयोगी थे)

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