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जिनकी अब बस यादें शेष

एक प्रतिष्ठित कार्टूनिस्ट से लेकर एक संवेदनशील शहरी योजनाकार, एक हरदिल अजीज राष्ट्रपति से लेकर फायरब्रांड हिंदू नेता तक कई तरह की शख्सियतें अब सिर्फ यादों में
जिनकी अब बस यादें शेष
30 December 2015

2015 में गुजरी हस्तियांआर.के. लक्ष्मण
1921-2015
कार्टूनिस्ट

“मैं प्रेरणा का इंतजार नहीं करता. प्रेरणा तो आनी ही है. मैं लेखकीय गतिरोध जैसी किसी चीज को नहीं मानता. यह आलसी लोगों के लिए गढ़ी गई एक पश्चिमी अवधारणा है.”

एपीजे अब्दुल कलाम
1931-2015
भारत के पूर्व राष्ट्रपति

-देश के मिसाइल प्रोग्राम की संचालक शक्ति रहे कलाम ने भारत के “मिसाइल मैन” से “जनता का राष्ट्रपति” बनने तक का अपना सफर बखूबी तय किया.
-सरकारी सेवा में पांच दशक बिताने के बाद भी उनके पास संपत्ति के नाम पर 2,500 किताबें, एक घड़ी, छह शर्ट, चार पैंट, तीन सूट और एक जोड़ी जूते ही थे.
-उनकी मृत्यु अपना पसंदीदा काम करते हुए हुई&उस वक्त वे आइआइएम-शिलांग में युवाओं को संबोधित कर रहे थे.

2015 में गुजरी हस्तियांबृजमोहन लाल मुंजाल
1923-2015
संस्थापक और सह-अध्यक्ष, हीरो समूह

“हम हमेशा से जानते थे कि हमारे पास सर्वश्रेष्ठ तकनीक और कारोबारी तरीके हैं लेकिन इतनी जल्दी बाजार का नेतृत्व कर पाने की हमें उम्मीद नहीं थी.”
जब 2001 में हीरो मोटोकॉर्प दुनिया की सबसे बड़ी
दोपहिया निर्माता कंपनी बन गई

जे.बी. पटनायक
1927-2015
ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री, असम के पूर्व राज्यपाल

-प्रतिष्ठित लेखक और तीन बार ओडिशा के मुख्यमंत्री रहे पटनायक के 14 साल के कार्यकाल को अक्सर “स्वर्ण युग” का नाम दिया जाता है.
-उनके कार्यकाल में हालांकि घोटालों और अवैध यौनाचारों के आरोप लगे.
-वे कहते थे, “लेखन से मुझे ज्यादा नहीं तो उतना ही सुख मिलता है जितना कि राजनीति से.”

2015 में गुजरी मशहूर हस्तियांनेक चंद
1924-2015
कलाकार

-वे चंडीगढ़ में एक मामूली रोड इंस्पेक्टर थे जिनकी बालसुलभ कल्पना ने रॉक गार्डेन को जन्म दिया, जो दुनिया में आज “बाहरी” कला का सर्वश्रेष्ठ नमूना माना जाता है.
-अपनी 40 एकड़ की इस रचना को वे “देवों और देवियों का साम्राज्य” कहते थे, जिसने उन्हें चंडीगढ़ के वास्तुकार ला कार्बूजिए जैसी ख्याति दिलाई.

सुभाष घीसिंग
1936-2015
गोरखालैंड आंदोलन के जनक

-उन्होंने फौज की नौकरी छोड़कर पश्चिम बंगाल के गोरखा लोगों के लिए एक अलग क्षेत्र बनाने को एक लंबे अभियान की शुरुआत की.
-गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट के नेता के रूप में उन्होंने 1998 में केंद्र और पश्चिम बंगाल सरकार के साथ दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल के गठन संबंधी समझौते पर दस्तखत किए.
-वे मानते थे कि नेता को अडिय़ल नहीं होना चाहिए. वे कहते थे, “नेता खुद जहर पी ले लेकिन अपने साथ मासूम लोगों को वह जहर नहीं पिला सकता.”

जगमोहन डालमिया
1940-2015
क्रिकेट प्रशासक

“एक प्रशासक की कामयाबी उसकी टीम पर टिकी होती है. यह सिर्फ  संयोग है कि मैं नेतृत्व कर रहा हूं.”

चार्ल्स कोरिया
1930-2015
वास्तुकार

“...मैं जब भारतीय वास्तुकारों को अमेरिका और यूरोप की बड़ी कंपनियों के लिए भाड़े पर काम करते देखता हूं तो मुझे बुरा लगता है, क्योंकि मुझे नहीं लगता कि भारत को उनकी उतनी जरूरत होगी जितनी कि उन्हें भारत की जरूरत है.”

2015 में गुजरी मशहूर हस्तियांडी. रामानायडू
1936-2015
फिल्मकार

-एक अकेले की बनाई गई सबसे ज्यादा फिल्मों का गिनेस रिकॉर्ड इनके नाम है&तेलुगु, हिंदी, तमिल, कन्नड़ और यहां तक कि पंजाबी में इन्होंने कुल 135 फिल्में बनाई हैं.
-प्रकासम जिले के उपजाऊ गांव करमचेड़ु में पैदा होने के बाद इन्होंने खेती से जीवन की शुरुआत की, उसके बाद चावल की मिल और ट्रांसपोर्टर की नौकरी के रास्ते सिनेमा तक पहुंचे.
-उनका मंत्रः “मेरे पास एक ही हुनर है, सिनेमा बनाना. मुझे और कुछ नहीं आता.”

गोविंद पानसरे
1933-2015
तर्कवादी और कम्युनिस्ट

-मराठी में लिखी पुस्तक शिवाजी कौन होता में उन्होंने एक हिंदू शासक के रूप में इस मराठा शासक की स्थापित सांप्रदायिक व्याख्या को चुनौती देते हुए शिवाजी को “जनता का शासक” सिद्ध किया है.
-उन्होंने 21 किताबें लिखीं हैं और सभी पुस्तकें सामाजिक बुराइयों के खिलाफ हैं.
“आरएसएस के सौ मुंह हैं और यह अलग-अलग तरह की भाषाएं बोलता है.”

रवींद्र जैन
1944-2015
गायक-संगीतकार

“अपने कई समकालीनों की तरह मुझे कभी संघर्ष नहीं करना पड़ा.”
मशहूर गीत
सजना है मुझे (सौदागर, 1973)
ले जाएंगे, ले जाएंगे दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे
(चोर मचाए शोर, 1974)
गोरी तेरा गांव बड़ा प्यारा (चितचोर, 1976)

सईद जाफरी
1929-2015
अभिनेता

“एक अभिनेता को अभिनय करने का संजीदा काम मिला हुआ है. ईश्वर ने उसे अलग-अलग किरदारों को समझने का हुनर दिया है. उसे यह काम ईमानदारी से और सचेत ढंग से करना होगा.”

अशोक सिंघल
1926-2015
विश्व हिंदू परिषद के शीर्ष नेता

“पंचकोसी परिक्रमा मार्ग में मस्जिद बनाने की हम बिल्कुल अनुमति नहीं देंगे. इसकी अनदेखी की गई तो फिर महाभारत होकर रहेगा.”

आदेश श्रीवास्तव
1966-2015
संगीतकार

“...मैं असह्य पीड़ा से गुजरा हूं. उस बुरे दौर से अब निकल आया हूं. अब मैं कहीं ज्यादा जोशोखरोश के साथ काम पर जुट जाना चाहता हूं.”

प्रो. तुलसीराम
1950-2015
शिक्षाविद् और लेखक

-आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश) के धरमपुर गांव से 1964 में तुलसीराम निकले तो फिर लौटकर नहीं गए. काशी हिंदू विवि में पढ़ाई के दौरान कक्वयुनिस्ट विचारधारा से प्रभावित होकर उसके पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गए पर धीरे-धीरे उन्हें उसकी आंतरिक राजनीति से खीज होने लगी.
-जेएनयू से एमए और पीएचडी कर 1986 में वहीं पर रूसी और मध्य एशियाई अध्ययन केंद्र में शिक्षक हो गए. सन् 2000 में रूस गए और उसके विघटन पर तद्भव पत्रिका में लंबी डायरी लिखी. उसके बाद इसी पत्रिका में क्रमशः छपी
-वे मानते थे कि नेता को जडिय़ल नहीं होना चाहिए. वे कहते थे, “वह खुद जहर पी ले लेकिन अपने साथ मासूम लोगों को वह जहर नहीं पिला सकता.”
-उनकी आत्मकथा मुर्दहिया ने हिंदी साहित्य जगत में तहलका मचा दिया.
-अपने साथ हुई ज्यादतियों को भी जिस तटस्थ भाव से उन्होंने लिखा वह हैरत में डालने वाला था. वे कहते थे कि “यह बौद्ध दर्शन में अटूट विश्वास की वजह से संभव हुआ. बुद्ध ने क्रोध को खौलता पानी बताया है, जिसमें आपको अपना चेहरा नहीं दिखाई देगा. वही ठहर जाए तो दिखने लगता है.”
-उनके कार्यकाल पर हालांकि घोटालों और अवैघ यौनाचारों का आरोप लगा.
-वे कहते थे, “लेखन से मुझे ज्यादा नहीं, तो उतना ही सुख मिलता है जितना राजनीति से.”
“जो लोग दुख सहते हैं, उनकी याददाश्त बड़ी तगड़ी होती है.”

डॉ. महीप सिंह
1930-2015
कथाकार

“हर व्यक्ति बहुत व्यस्त और भीड़ से घिरा होने के बावजूद, कहीं बहुत अकेला होता है. यह अकेलापन उसे उसके स्व के सामने खड़ा करता है और उससे उसकी पहचान कराता है. लेखक के लिए अपने स्व को निरंतर जानने और पहचानने की जरूरत होती है.”

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