एडवांस्ड सर्च

फुरसतः वादा-खिलाफ निकले वे

जलालपुर कस्बे में जन्मे अनवार अहमद ने शायरी की रूहानी दुनिया में उतरने के बाद अपने कस्बे के नाम पर ही तखल्लुस रखा

Advertisement
शिवकेश मिश्रलखनऊ, 09 January 2018
फुरसतः वादा-खिलाफ निकले वे अनवर जलालपुरी 1947-2017

यही कहने को जी करता है कि अनवर साब ने वादाखिलाफी की. यही कोई डेढ़ महीने पहले उनसे बात हुई थी. वे कैंसर की वजह से लंदन में दम तोडऩे वाली बेटी की आखिरी रस्म में शिरकत करके लौटे थे. आवाज की नमी भीतर की टूटन की खबर दे रही थी. ऐसे ही मौकों पर इनसान की सीमाएं बता देने वाला एक शेर पढ़कर उन्होंने ही माहौल को संभाला, जिसका उन्हें खासा तजुर्बा था. उत्तर प्रदेश में आंबेडकर नगर के जलालपुर कस्बे में जन्मे अनवार अहमद ने शायरी की रूहानी दुनिया में उतरने के बाद अपने कस्बे के नाम पर ही तखल्लुस रखा अनवर जलालपुरी. लंबे अरसे से देश, दुनिया के नामी मुशायरों का संचालन अमूमन वे ही संभालते आ रहे थे.

लखनऊ में लालकुआं का धींगरा अपार्टमेंट उनकी रिहाइश जरूर था लेकिन रहे वे हमेशा शायराना सफर पर. जून 2014 में उर्दू शायरी में गीता छपकर आने के बाद उन्हें मुशायरों के समानांतर मसरूफियत का एक और मकसद मिल गया था. उन्होंने कहा भी थाः ''गीता ने मुझे खासा व्यस्त कर दिया है. पूना में एक आयोजन में लेक्चर देने जाना है, कुरुक्षेत्र में गीता पर एक आयोजन में चीफ गेस्ट हूं, हरिद्वार में भी एक प्रोग्राम में बुलाया है." भात की एक-एक शीत की तरह साफ और जैविक उच्चारण में अवधी का खास टच होता था. अलिफ-लैलवी जबान से लगाव का वे अक्सर जिक्र करते.

डेढ़ महीने पहले की उस बातचीत के दौरान ही यात्राओं का जिक्र छिड़ा. सालों से आप बड़े शायरों के बीच बैठते-बतियाते, साथ सफर करते हैं, आपके पास उनसे जुड़े तमाम संस्मरण होंगे, हमारे लिए कभी उन्हें लिखें. उन्होंने एक हल्का विराम लिया, फिर बोले कि ''सुझाव तो वाकई अच्छा है. बहुत-से दिलचस्प किस्से जमा हो गए हैं, जिनके बारे में लिखा जा सकता है. अब देखिए, कभी फुरसत मिलै तब लिखैं." पर वे तो वादा तोड़कर हमेशा के लिए चल दिए.

Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay