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देश में तार-तार हो रही आश्रय गृहों की इज्जत

बिहार के मुजफ्फरपुर के बाद यूपी के देवरिया के आश्रय गृह में शारीरिक और मानसिक यातनाओं की घटनाएं सामने आईं हैं. आश्रय गृह से जैसे तैसे भाग निकली एक लड़की ने जिले के पुलिस अधीक्षक को जो भी बताया वह दिल दहला देने वाला था.

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आशीष मिश्रलखनऊ, 13 August 2018
देश में तार-तार हो रही आश्रय गृहों की इज्जत मनीष अग्निनत्री

देवरिया रेलवे स्टेशन के ठीक सामने बाजार में 12,000 वर्ग फुट से अधिक क्षेत्रफल में फैली एक दो मंजिला पुरानी-सी इमारत आजादी की लड़ाई की गवाह है. सौ साल से भी ज्यादा पुरानी इस इमारत में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित नवनाथ शर्मा ने 1927 में भास्कर प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना की थी. आजादी के संघर्ष के दौरान "पूर्वांचल के गांधी'' कहे जाने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बाबा राघवदास के आंदोलनों के प्रति लोगों को जागरूक करने में इस प्रेस से छपी सामग्री की महती भूमिका रही थी.

इसी प्रेस के पीछे कांग्रेस का दफ्तर भी था जहां महात्मा गांधी और पंडित जवाहर लाल नेहरू आकर रुकते थे. स्वतंत्रता संग्राम की यादों को समेटे इस बूढ़ी इमारत पर अब एक बदनुमा दाग लग गया है.

इमारत में पिछले नौ वर्षों से निराश्रित बच्चों को आश्रय देने वाले बाल गृह से बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले की रहने वाली एक दस वर्षीया किशोरी 5 अगस्त की शाम चार बजे भाग निकली. तेज बारिश के बीच लगातार भागते हुए वह देवरिया के मुख्य बाजार में मौजूद कुछ दुकानदारों को मिली.

वे लोग उसे तुरंत बगल के महिला थाने में ले गए. लड़की बुरी तरह सहमी हुई थी. वह गुमसुम थी, कुछ बोलना चाहती थी लेकिन डर के मारे मुंह नहीं खोल पा रही थी. देवरिया के पुलिस अधीक्षक (एसपी) रोहन पी.

कनय ने बच्ची की हालत देखकर उसे अपने दफ्तर न बुलाकर घर पर बुलाया. पत्नी, बच्चों के बीच बिठाया ताकि मानसिक तौर पर वह सामान्य हो सके. कुछ देर बाद बच्ची के भीतर का डर कम हुआ. इसके बाद उसने एसपी को जो बताया उसने प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मचा दिया. बच्ची ने कहा, "संरक्षण गृह में लड़कियों से गलत काम कराए जाते हैं.

कुछ दीदी लोग शाम को जबरदस्ती बाहर भेजी जाती थीं और सुबह वापस आने पर बहुत रोती थीं.'' बिना देर किए कनय ने पुलिस की छह टीमें बनाकर देवरिया के स्टेशन रोड पर मौजूद 'मां विंध्यवासिनी महिला प्रशिक्षण एवं समाज सेवा संस्थान' से संचालित बाल गृह बालिका में दबिश देकर कुल 21 बच्चियों औ र 3 बच्चों को मुक्त करा लिया.

बच्चियों के बयान से संरक्षण गृह में चल रहे देह व्यापार पर से पर्दा हट गया. संचालिका गिरिजा त्रिपाठी और उनके पति मोहन त्रिपाठी और बाल गृह की अधीक्षिका कनकलता त्रिपाठी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया.

आश्रय गृह में सेक्स रैकेट के खुलासे ने महिला सुरक्षा के दावों की पोल खोलकर रख दी. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने देवरिया के जिलाधिकारी सुजीत कुमार को हटाते हुए पूर्व जिला प्रोबेशन अधिकारी (डीपीओ) को निलंबित कर दिया. बावजूद इसके संरक्षण गृह में यौन उत्पीड़न की घटना से देश भर में पैदा आक्रोश शांत न हुआ.

योगी आदित्यनाथ ने पूरे प्रकरण की सीबीआइ जांच की संस्तुति कर दी. तथ्यों से कोई छेड़छाड़ न हो इसके लिए अपर पुलिस महानिदेशक की अध्यक्षता में एक समिति भी गठित की. देवरिया के बाल गृह में यौन उत्पीडऩ की इस घटना ने प्रदेश में चल रहे संप्रेक्षण या आश्रह गृहों में चल रही नाजायज गतिविधियों पर से फिर पर्दा हटा दिया है.

पिछले दो साल में प्रदेश के कई इलाकों में संरक्षण गृहों में अनैतिक गतिविधियां सामने आई हैं (देखें बॉक्स) लेकिन सरकार की सुस्ती ने हालात विस्फोटक कर दिए.

एनजीओ-अधिकारी गठजोड़

महिला कल्याण और बाल विकास विभाग में "किशोर न्याय (बालकों की देखरेख) और संरक्षण'' अधिनियम के तहत पूरे प्रदेश में कुल 56 बाल-बालिका गृह या संप्रेक्षण गृह चल रहे हैं. इसके अलावा केंद्रीकृत योजनाओं में पंजीकृत स्वयंसेवी संस्थाएं (एनजीओ) भी प्रदेश भर में 175 आश्रय गृह चला रही हैं.

देवरिया में दिमागी बुखार पीड़ित बच्चों के लिए काम कर रहे समाजसेवी डॉ. शिवानंद बताते हैं, "सरकारी ग्रांट की बंदरबाट के लिए एनजीओ संचालक और अधिकारी गठजोड़ कर रहे हैं. अधिकारियों की सरपरस्ती मिलने पर एनजीओ कोई भी अनैतिक काम करने से नहीं डरते.''

देवरिया में बाल गृह संचालिका गिरिजा त्रिपाठी ने कुछ ऐसा ही किया. ढाई दशक पहले भटनी के एक छोटे-से इलाके में एनजीओ शुरू करने वाली गिरिजा ने कुछ ही वर्षों में देवरिया और गोरखपुर में सिक्का जमा लिया. उसने "मां विंवध्यवासिनी महिला प्रशिक्षण एवं समाज सेवा संस्थान'' के तहत गोरखपुर में संवासिनी गृह और वृद्धावस्था आश्रम भी खोला था.

दो वर्ष पूर्व आर्थिक अनियमितता पर संस्था को काली सूची में डालने के साथ गोरखपुर की चाणक्यपुरी कॉलोनी में संचालित संवासिनी गृह को जिला प्रशासन ने बंद करा दिया था.

देवरिया के बाल गृह को भी बंद करने के आदेश हुए थे पर अधिकारियों के बीच सिन्न्का जमा चुकी गिरिजा पर कोई कार्रवाई न हुई. प्रदेश में सचल पालना गृहों में गड़बडिय़ों की सीबीआइ जांच के बाद शासन ने जून 2017 को श्मां विंध्यवासिनी महिला प्रशिक्षण एवं समाज सेवा संस्थान्य की मान्यता रद्द करने के साथ संचालिका पर प्राथमिकी दर्ज करने के आदेश दिए थे, जिसे देवरिया जिला प्रशासन ने टोकरी में डाल दिया.

देवरिया और आसपास के जिलों में निराश्रित मिलने वाली किशोरियों को गिरिजा के बाल गृह में भेजा जाता रहा. कनय बताते हैं, "पुलिस को इस बात की जानकारी नहीं थी कि बाल गृह की मान्यता रद्द हो चुकी है.

इसे बंद कराने की जिम्मेदारी जिलाधिकारी कार्यालय की थी.'' साल भर बाद 31 जुलाई को पुलिस ने प्राथमिकी तो दर्ज की पर दोषियों की गिरफ्तारी का कोई प्रयास नहीं किया. मुख्यमंत्री ने इस पूरे प्रकरण में पुलिस की सुस्ती की जांच के आदेश दिए हैं.

गायब महिलाओं का रहस्य

देवरिया के संरक्षण गृह में यौन उत्पीडऩ का मामला सामने आने के बाद लखनऊ के आश्रय गृहों की जांच भी शुरू हुई. 6 अगस्त की शाम अपर सिटी मजिस्ट्रेट प्रफुल्ल त्रिपाठी एक टीम लेकर प्राग नारायण रोड स्थित राजकीय महिला शरणालय पहुंचे.

यहां के दस्तावेज जांचे गए तो पता चला कि एक संवासिनी 29 जुलाई से लापता है. संरक्षण गृह की संचालिका ने लापरवाही बरतते हुए सिर्फ स्थानीय पुलिस से शिकायत करके औपचारिकता पूरी कर ली. संचालिका ने न तो जिला प्रशासन और न ही बाल कल्याण समिति को खबर की.

इस प्रकरण ने संवासिनियों की सुरक्षा और संरक्षण गृहों में उनकी जिंदगी से हो रहे खिलवाड़ की ओर स्पष्ट इशारा किया है. महिला कल्याण विभाग से पंजीकृत एक संस्था की अध्यक्ष आशा श्रीवास्तव बताती हैं, "संरक्षण गृहों में संवासिनियों के साथ रेप की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं (देखें बॉक्स).

सरकार की मामूली कार्रवाई के चलते हर बार संरक्षण गृहों की आरोपी संचालिकाएं बच निकलती हैं.'' इलाहाबाद के खुल्दाबाद स्थित महिला निकेतन और बालिका संरक्षण गृह एक तीन मंजिला मकान में संचालित हैं. पिछले महीने नारी निकेतन से दो महिलाएं साड़ी लटकाकर नीचे उतर फरार हो गई थीं, जबकि सीसीटीवी में ऐसी कोई घटना दर्ज नहीं हुई. पुलिस की जांच में सामने आया कि महिलाओं के गायब होने से पहले सीसीटीवी कैमरे में आटा लगा दिया गया था.

इलाहाबाद के एक पुलिस अधिकारी बताते हैं, "महिलाओं का साड़ी के जरिए तीन मंजिला मकान से नीचे उतरकर भागने की बात संहेदास्पद है. सीसीटीवी कैमरे में आटा लगे होने से नारी निकेतन के कर्मचारी ही शक के घेरे में हैं.'' फिलहाल पुलिस इन गायब महिलाओं का पता नहीं लगा सकी है. देवरिया प्रकरण के बाद जब प्रदेश भर में संप्रेक्षण गृहों की जांच की गई तो सुल्तानपुर मे संरक्षण गृह से छह महिलाएं गायब मिलीं.

ताक पर नियम-कानून

बाल गृहों में रहने वाले बच्चों की निगरानी के लिए जिला स्तर पर बनाई गई बाल कल्याण समितियां (सीडब्ल्यूसी) बेअसर साबित हुई हैं. नाबालिग बच्चियों को बरामद कर उन्हें पहले बाल कल्याण समिति के सामने पेश किया जाता है.

यह समिति इन बच्चियों को बाल गृह में आश्रय दिलाती है. महिला कल्याण एवं बाल विकास विभाग के एक उपनिदेशक बताते हैं, "आश्रय गृहों में आने से पहले नाबालिग बच्ची का मेडिकल होना बहुत जरूरी है ताकि इस बात का पता चल सके कि उसके साथ कोई अनहोनी तो नहीं हुई है.

मेडिकल न होने से बच्ची के साथ यौन उत्पीडऩ का मामला तब उजागर होता है जब वह गर्भवती हो जाती है.'' ऐसे में कानूनी कार्रवाई में देरी होती है और यौन उत्पीडऩ के आरोपी बच निकलते हैं.

संरक्षण गृहों में बच्चों की सुरक्षा के लिए समय-समय पर कई नियम-कानून बनाए गए (देखें ग्राफिक्स) पर इनका सख्ती से पालन कराने की जहमत किसी भी सरकार ने नहीं उठाई. महिला कल्याण विभाग की कैबिनेट मंत्री रीता बहुगुणा जोशी कहती हैं, "नियमों का पालन न करने वाले बाल गृहों पर सरकार सख्त है.

ऐसे बाल गृहों को ब्लैक लिस्ट कर संचालकों पर मुकदमा दर्ज कराया जाएगा.'' नारी संरक्षण गृहों की स्थिति पर असंतोष जताते हुए प्रदेश के महिला संगठनों ने जुलाई में महिला एवं बाल कल्याण मंत्री को एक पत्र लिखकर संरक्षण गृहों के हालात जानने के लिए वहां जाने की इजाजत मांगी थी.

भारतीय महिला फेडरेशन की अध्यक्ष आशा मिश्र कहती हैं, "प्रदेश के सभी नारी संरक्षण गृहों की सीबीआइ जांच होनी चाहिए. इससे यौन उत्पीडऩ से जुड़े कई और बड़े मामलों का खुलासा हो सकता है.''

"बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ'' का नारा देने वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार के सामने असल चुनौती महिलाओं को सुरक्षा मुहैया कराने की ही है.

सुरक्षित नहीं हैं शेल्टर होम

बरेली

बीच शहर में स्थित संवासिनी गृह में रह रही एक लड़की की 12 जनवरी, 2018 को तबियत खराब होने पर जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया. इलाज के दौरान वह रहस्यमय ढंग से गायब हो गई जिसका अभी तक कोई पता नहीं चला.

मेरठ

अब्दुल्लापुर में मौजूद राजकीय बाल संप्रेक्षण गृह में पोछा लगाने को लेकर हुए विवाद में 6 जनवरी, 2018 को दो गुट आपस में भिड़ गए. दोनों पक्षों में जमकर मारपीट हुई जिसमें नौ किशोर घायल हुए. पुलिस ने मुश्किल से हालात पर काबू पाया.

मथुरा

कोतवाली क्षेत्र की कुशक गली में मौजूद नारी निकेतन की छत से 30 मई, 2018 की रात दो संवासिनियां कूद गईं. एक फरार हो गई जबकि दूसरी घायल होने के कारण नहीं भाग सकी. भागने वाली संवासिनी का कोई सुराग नहीं लग सका.

कानपुर

स्वरूप नगर स्थित राजकीय महिला शरणालय में आठ साल से रह रही एक संवासिनी की 2 जनवरी, 2018 को संदिग्ध स्थितियों में मौत हो गई. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में रेप के बाद हत्या की पुष्टि हुई. दो लोगों पर कार्रवाई.

सोनभद्र

रॉबर्ट्सगंज कोतवाली क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले उरमौरा के बालक बालगृह में 14 जनवरी 2018 को एक विकलांग बालक की संदिग्ध मौत हो गई. एक हफ्ते के भीतर बालगृह में दो बालकों की मौत से हड़कंप मच गया.

वाराणसी

राजकीय बाल संप्रेक्षण गृह, रामनगर में 1 जुलाई, 2017 को भोजन की गुणवत्ता खराब बताते हुए किशोरों ने बवाल कर दिया. कर्मचारियों पर जानलेवा हमला किया, मोटर साइकिल फूंक दी और दो किशोर भाग निकले.

शाहजहांपुर

हथौड़ा बुजुर्ग स्थित बालिका सुधार गृह में बिना पुलिस वेरिफिकेशन के महिलाएं काम कर रही थीं. जिलाधिकारी की जांच में यहां केवल एक ही सीसीटीवी कैमरा लगा मिला जबकि सुधार गृह में 22 बालिकाएं थीं.

लखनऊ

राजकीय बालगृह बालिका मोतीनगर में बंद दो संवासनियों के गर्भवती हो जाने का प्रकरण अप्रैल 2016 में सामने आया था. अधीक्षिका को सस्पेंड कर दिया गया. यहीं से 5 जनवरी, 2018 की सुबह दो किशोरियां भाग निकलीं थीं.

गोरखपुर

खोराबार थाना क्षेत्र में मौजूद राजकीय संप्रेक्षण गृह में दो किशोरों के गुट 31 जुलाई, 2017 की रात कैरम खेलने के विवाद में आपस में भिड़ गए. संप्रेक्षण गृह में जमकर तोडफ़ोड़ हुई और आठ किशोर भाग निकले.

तोड़ने के लिए बनाए गए नियम

पंजीकरणः किशोर न्याय (बालकों की देखरेख) और संरक्षण अधिनियम (जेजे ऐक्ट) के अंतर्गत सभी प्रकार के आश्रय गृहों का पंजीकरण अनिवार्य है. इससे यौन उत्पीडऩ के मामलों पर त्वरित कार्रवाई संभव हो पाती है.

हकीकतः प्रदेश में स्वैच्छिक संस्थाओं के ज्यादातर शेल्टर होम जेजे ऐक्ट के तहत पंजीकृत नहीं हैं.

भवनः बाल संरक्षण अधिनियम के अनुसार संप्रेक्षण गृह के भवन में 10 बच्चों के लिए 40 वर्ग फुट का एक कमरा, 100 बच्चों के पढऩे के लिए 120 वर्ग फुट का एक कमरा, 500 वर्ग फुट का भोजन कक्ष समेत कई जरूरी व्यवस्थाएं होनी चाहिए.

हकीकतः प्रदेश में 70 फीसदी से ज्यादा संप्रेक्षण गृह मानक के अनुरूप नहीं चल रहे. सभी में क्षमता से अधिक बाल अपचारियों की संख्या.

शरणालयः आम संवासिनियों के रहने के लिए महिला कल्याण एवं बाल विकास विभाग ने लखनऊ, बाराबंकी, नोएडा समेत चार जिलों में राजकीय शरणालय और 12 जिलों में मानसिक रूप से बीमार संवासिनियसों के लिए शरणालय बनाने की योजना बनाई.

हकीकतः योजना फाइलों से बाहर ही नहीं निकल पाई. शासन से अनुमति मिलने का इंतजार.

वार्डः मंद बुद्धि या पॉक्सो ऐक्ट के तहत बालिका गृह में आने वाली लड़कियों के लिए अलग-अलग वार्ड बनाए जाएंगे. बालिका गृह से बाहर जाने वाली किशोरियों के लिए वैन की सुविधा होगी.

हकीकतः दो वर्ष पहले लागू हुई यह योजना अभी भी पूरी तरह से क्रियान्वित नहीं. 75 फीसदी से अधिक बालिका गृहों में अलग-अलग वार्ड नहीं.

सुरक्षाः संवासिनियों या किशोरों के भागने की घटनाओं को देखते हुए सभी बाल संप्रेक्षण गृहों में महिला और पुरुष होमगार्ड की तैनाती के आदेश दिए गए थे. संप्रेक्षण गृहों की चारदीवारी ऊंची करने का आदेश भी था.

हकीकतः किसी भी संप्रेक्षण गृह में पर्याप्त सुरक्षा नहीं. शाहजहांपुर समेत कई जिलों में संप्रेक्षण गृहों की चारदीवारी निर्धारित मानक से काफी कम.

बायोमीट्रिकः संप्रेक्षण गृहों में तैनात बच्चों और कर्मचारियों की उपस्थिति दिन में दो बार दर्ज की जाएगी. शाम को सभी की उपस्थिति बायोमीट्रिक मशीन के जरिए दर्ज होगी.

हकीकतः 80 फीसदी संप्रेक्षण गृहों में बायोमीट्रिक मशीन से उपस्थिति दर्ज करने की व्यवस्था नहीं.

सीसीटीवीः शेल्टर होम के मुख्य द्वार और बच्चों के कमरों के बाहर सीसीटीवी कैमरे होने चाहिए. निर्बाध रिकॉर्डिंग हेतु इन्वर्टर जैसे साधनों की व्यवस्था होनी चाहिए.

हकीकतः आधे से ज्यादा संप्रेक्षण गृहों में पर्याप्त सीसीटीवी कैमरे की व्यवस्था नहीं.

ऑनलाइनः सीसीटीवी और बायोमीट्रिक डिवाइस को आपस में जोड़कर इंटरनेट-कंप्यूटर के जरिए ऑनलाइन सिस्टम बनाना ताकि निदेशालय स्तर से इन पर निगरानी रखी जा सके.

हकीकतः सभी शेल्टर होम अभी तक पूरी तरह ऑनलाइन नहीं हो पाए हैं.

काउंसिलिंगः हर संप्रेक्षण गृह में रहने वाले लड़के-लड़कियों की नियमित काउंसिलिंग के लिए काउंसलर की व्यवस्था. लड़कियों के स्वभाव में अचानक बदलाव होने पर अधिकारियों को इसकी जानकारी देना.

हकीकतः संप्रेक्षण गृह में काउंसलर का काम केवल खानापूर्ति का. प्रदेश में किसी भी काउंसलर ने स्थानीय प्रशासन को एक बार भी संदेहास्पद गतिविधियों की जानकारी नहीं दी.

बाल मित्रः प्रदेश के बाल और संप्रेक्षण गृहों पर निगरानी के लिए सितंबर, 2015 में बाल मित्र तैनात करने का आदेश जारी किया. हर जिले में 10-10 बाल मित्र तैनात करने की योजना थी. तैनाती का जिम्मा डीएम को दिया गया.

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