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उत्तराखंडः प्राइमरी में बस दो-दो प्यारे!

उत्तराखंड के गांवों में सरकारी प्राथमिक स्कूलों की हालत बेहद दयनीय हो गई है और उन्हें बंद करने की नौबत इसलिए आ गई है क्योंकि विद्यार्थियों की तादाद कई जगह दहाई तक भी नहीं पहुंच सकी है.

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aajtak.in
सरोज कुमार नई दिल्ली, 14 November 2017
उत्तराखंडः प्राइमरी में बस दो-दो प्यारे! पौड़ी के पयाल गांव के स्कूल में प्रार्थना करते दो छात्र और शिक्षक

उत्तराखंड के पौड़ी जिले में पयाल गांव के स्कूल में 6 नवंबर को सुबह की प्रार्थना का नजारा अनोखा थाः दो छात्र और एक शिक्षक. यह बानगी है सरकारी स्कूलों के हालात की. राज्य के दोनों मंडलों कुमाऊं और गढ़वाल के ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार घटती छात्र संख्या ने तकरीबन 2,430 सरकारी प्राइमरी स्कूलों को बंदी के कगार पर पहुंचा दिया है. राज्य बनने के बाद से अब तक सरकारी प्राथमिक स्कूलों में छात्र घटकर 50 फीसद से कम रह गए हैं. शिक्षा मंत्री अरविंद पांडे ने दस या इससे कम छात्रों वाले स्कूलों को नजदीकी विद्यालयों में मिलाने का आदेश जारी किया है और विभाग इसके पालन की रूपरेखा बनाने में जुटा है.

राज्य के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के साथ शिक्षक संगठनों की बैठक में भी प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में घटती छात्र संख्या का मुद्दा उठा. इसके बाद रावत ने कम छात्रों वाले प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों को नजदीकी स्कूल में विलीन करने के निर्देश दिए.

उत्तराखंड में 15,428 प्राथमिक विद्यालय हैं. इनमें सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में 5,56,000 से ज्यादा छात्र पढ़ते हैं. जबकि सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों के बच्चों की संख्या जोडऩे पर यह संख्या 10,50,000 ज्यादा पहुंच जाती है. दोनों मंडलों में 2,430 ऐसे प्राथमिक विद्यालय हैं जिनमें बच्चों की संख्या 10 से कम है. गढ़वाल मंडल में ही दस से कम बच्चों वाले स्कूलों की संख्या 1,365 हैं. जबकि कुमाऊं मंडल में ऐसे विद्यालयों की संख्या लगभग 1,065 है. पांडे ने कम छात्र संख्या वाले विद्यालयों को बंद करने की घोषणा की है. जो प्राइमरी स्कूल बंद होंगे उनके विद्यार्थियों को आस-पास के गांव के विद्यालयों में समायोजित किया जाएगा. इससे पहले तत्कालीन शिक्षा मंत्री मंत्री प्रसाद नैथानी ने भी अपने कार्यकाल में ऐसी ही घोषणा की थी. जिस पर अमल नहीं हो पाया था.

गढ़वाल मंडल में प्रारंभिक शिक्षा विभाग के अपर शिक्षा निदेशक एस.पी. खाली का कहना है कि अकेले गढ़वाल मंडल के पांचों पहाड़ी जिलों के साथ देहरादून, हरिद्वार को भी मिलाकर 1,365 प्राथमिक स्कूल ऐसे हैं जहां छात्र संख्या दस से कम है. सबसे खराब स्थिति पौड़ी में है, जहां 540 सरकारी प्राथमिक विद्यालय संकट में हैं, तो टिहरी में भी 304 स्कूल ऐसे हैं जहां छात्र संख्या दस से कम है. चमोली के भी यही हाल हैं. सरकारी प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में छात्र संख्या में हर साल गिरावट आ रही है. खाली के अनुसार छात्रों की घटती संख्या की समीक्षा हो रही है. नवंबर के अंत तक यह तय होगा कि इनमें से कितने स्कूलों को बंद किया जाए.

बिना छात्रों वाले स्कूलों में ताले लग गए हैं. लेकिन दूसरी ओर, स्कूलों को स्मार्ट बनाने का भी प्रयास हो रहा है और जिन स्कूलों को स्मार्ट बनाया गया है, वहां छात्र बढ़ रहे हैं, खाली के अनुसार, शिक्षक भी विद्यार्थियों की संख्या बढाने का अभियान चला रहे हैं. इससे भी कुछ हद तक छात्र संख्या में सुधार होने की आशा है. वैसे छात्र संख्या घटने का मुख्य कारण गांवों से पलायन है. गढ़वाल में पहाड़ पर लोग या तो कोटद्वार या फिर देहरादून और उसके आस-पास बसने कीफिराक में हैं. अधिकांश आबादी के पलायन से यह स्थिति बनी है. कई जगहों पर माता-पिता बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ा रहे हैं इसलिए सरकारी स्कूल खाली हो रहे हैं. लेकिन स्मार्ट स्कूलिंग से स्थितियों पर काबू पाया जा सकता है.

शासन ने दस या इससे कम छात्र संख्या वाले विद्यालयों को आरटीई मानक के मुताबिक, एक किलोमीटर की दूरी के अंतर्गत प्राथमिक विद्यालय उपलब्ध होने की दशा में ही विलीन करने के आदेश दिए हैं. शासन ने निदेशालय से विलय की कार्रवाई से पहले ऐसे स्कूलों को चिह्नित करने को कहा है.

उत्तराखंड में प्राथमिक शिक्षा की बदहाली का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि एक ओर जहां पढऩे वाले बच्चों की संख्या घट रही है, वहीं दूसरी ओर कई जगहों पर बहुत कम छात्र संख्या पर दो से ज्यादा अध्यापक हैं. राज्य में 77 विद्यालय ऐसे हैं, जहां पर 20 से कम छात्र संख्या पर दो से अधिक शिक्षक तैनात हैं. आरटीई 2009 के मानकों के मुताबिक, प्राथमिक स्कूलों में 60 तक छात्र संख्या वाले स्कूलों में दो शिक्षक रखे जाते हैं, 61 से 90 तक की संख्या पर तीन, 91 से 120 तक पर चार, 121 से 150 पर पांच और इससे अधिक छात्र संख्या पर अधिक शिक्षक तैनात करने का प्रावधान है.

अधिकारियों का तर्क है कि इन विद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों की पदोन्नति, स्थानांतरण, सेवानिवृत्ति आदि के कारण हर साल छात्र-शिक्षक अनुपात प्रभावित हो रहा है. राज्य गठन के 17 साल होने पर तुलनात्मक रूप से शिक्षा पर खर्च तो बढ़ा पर गुणवत्ता घटती चली गई.

2001 में शिक्षा पर खर्च 6.74 अरब रु. था जो अब 61 अरब रु. तक पहुंच चुका है. प्राथमिक शिक्षा में बच्चों की संख्या में पचास फीसद तक कमी आई है. इतना ही नहीं, उच्च प्राथमिक स्तर पर भी बच्चों की संख्या 67,000 तक कम हो चुकी है. इसकी वजह यह है कि सरकारी स्कूलों के परिणाम से निराश अभिभावक बच्चों को निजी स्कूलों में भेजना पसंद करते हैं.

नई टिहरी और पौड़ी में सरकारी स्कूलों में लगातार ताले लगते जा रहे हैं. जिले में पिछले शिक्षा सत्र में 18 स्कूल बंद हो चुके हैं. जिले में छात्र संख्या शून्य होने से 73 स्कूल अब तक बंद हो चुके हैं. 479 विद्यालयों में दस या इससे कम छात्र रह गए हैं. इनमें से 152 स्कूलों में तो विद्यार्थियों की संख्या एक से पांच तक सिमट गई है. पौड़ी में शून्य छात्र संख्या वाले सरकारी प्राइमरी स्कूलों की संख्या बढ़कर 229 हो गई है. टिहरी में 1,473 प्राथमिक स्कूल संचालित थे, पर 38 पिछले शिक्षा सत्र से बंद हो चुके हैं. टिहरी में 273 प्राथमिक स्कूल 10 से कम छात्र होने के चलते बंद होने के कगार पर हैं.

2014 में आई एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट के आंकड़े इस बदहाली की तस्दीक करते हैं. रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों के कक्षा आठ तक के करीब 42 फीसदी बच्चे शब्द तक ठीक से नहीं पढ़ पाते. छठीं, सातवीं, और आठवीं के बच्चे सामान्य जोड़-घटाना और गुणा-भाग तक करने में सक्षम नहीं हैं. पहाड़ी इलाकों के कई विद्यालय एकल शिक्षकों के भरोसे चल रहें हैं. तीस फीसदी स्कलों में शौचालय नहीं हैं और 56 फीसदी में लड़कियों के लिए अलग शौचालय नहीं है. 30 फीसदी में पीने के पानी की व्यवस्था तक नहीं है. जंगली जानवरों के आतंक से जूझ रहे पर्वतीय क्षेत्र के 54 फीसदी स्कूलों में सुरक्षा की दृष्टि से चारदीवारी नहीं है. पुस्कालय केवल 37 फीसदी स्कूलों में है. यही कारण है कि सरकारी शिक्षा पर आमजन का भरोसा बहाल नहीं हो पा रहा है.

कुमाऊं मंडल में तो कई विद्यालयों के भवन भी जर्जर हैं. अल्मोड़ा में 12, बागेश्वर में 62, नैनीताल में 37, पिथौरागढ़ में छह, चंपावत में 21 और ऊधमसिंह नगर में 52 माध्यमिक विद्यालय भवन जर्जर हैं. पिछले साल 26 नवंबर को हाईकोर्ट ने प्राथमिक शिक्षा की दशा सुधारने के लिए गाइडलाइन जारी की थी. जिसमें सभी स्कूलों में पानी का इंतजाम करने, मिड डे मील का भोजन देने, शौचालय बनाने जैसे निर्देश दिए थे. इनका पालन न होने पर याचिकाकर्ता दीपक राणा ने फिर से प्रार्थना पत्र दाखिल किया. इस पर अदालत ने जून में शिक्षा सचिव को तलब किया. इसके बावजूद कोई बदलाव नजर नहीं आया. अब मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अफसरों को स्कूल जाकर बच्चों से संवाद करने को कहा है. देखते हैं रावत के इन प्रयासों का क्या परिणाम निकलता है.

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