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समाचार सारः अयोध्या में फिर सियासी उबाल

32 साल बाद भी अयोध्या में राम मंदिर का मुद्दा एजेंडे पर हावी था. फर्क यह था कि अब विहिप मानती है कि वक्त उसकी तरफ है. मुख्य वक्ता आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा, ''राम जन्मभूमि को लेकर कोई अस्पष्टता नहीं होनी चाहिए कि केवल राम मंदिर ही बनेगा..

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सौगत दासगुप्तानई दिल्ली, 07 December 2017
समाचार सारः अयोध्या में फिर सियासी उबाल मंदिर की रणनीति उडुपि में विहिप की 'धर्म संसद' में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत (बीच में)

अगले साल कर्नाटक में चुनाव होने वाले हैं. फिलहाल यह देश में कांग्रेस की हुकूमत वाले महज पांच राज्यों में से एक है. हिमाचल प्रदेश भी उन राज्यों में एक है और उम्मीद की जा रही है कि 9 नवंबर को हुए विधानसभा चुनाव में यह भाजपा के पाले में चला जाएगा. इसलिए सियासी जानकारों को इस कयास के लिए माफ किया जा सकता है कि कर्नाटक के चुनाव भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के 'कांग्रेस मुक्त भारत' के नारे के साकार होने के लिए बेहद अहम होंगे. यही वजह है कि जानकारों को यह देखकर कोई ताज्जुब नहीं हुआ कि विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने अपनी 'धर्म संसद' का आयोजन 1985 के बाद पहली बार कर्नाटक में मंदिरों के शहर उडुपि में किया. 24 नवंबर से यह समागम तीन दिन चला.

32 साल बाद भी अयोध्या में राम मंदिर का मुद्दा एजेंडे पर हावी था. फर्क यह था कि अब विहिप मानती है कि वक्त उसकी तरफ है. मुख्य वक्ता आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा, ''राम जन्मभूमि को लेकर कोई अस्पष्टता नहीं होनी चाहिए कि केवल राम मंदिर ही बनेगा... उन्हीं पत्थरों से उसी रंग-रूप में... उन्हीं लोगों के हाथों जो इसके लिए 20-25 साल से लड़ते आए हैं.'' उन्होंने कहा कि यह 'हिदू समाज' की 'एकमात्र इच्छा' है.

विहिप के अध्यक्ष प्रवीण तोगडिय़ा ने कहा कि ''अयोध्या में राम मंदिर बनाना चाहते हैं और भारत में राम राज्य लाना चाहते हैं.'' उन्होंने यह दावा करके गफलत भी फैलाई कि इस सम्मेलन की कोई 'राजनैतिक दिशा' नहीं है, जबकि लगभग हर वक्ता ने मौजूदा माहौल की बात की. इस धर्म संसद का आयोजन करने वाले मठ के स्वामी ने 2,000 से ज्यादा श्रोताओं के सामने सौगंध ली कि राम मंदिर का निर्माण 2019 तक किया जाएगाः ''माहौल अनुकूल है... इसी के आधार पर मैं यह आश्वासन दे रहा हूं.'' भागवत ने भी तस्दीक की, ''जीत बस नजदीक ही है.''

लगता यही है कि राम मंदिर के मुद्दे पर इतना जोर कट्टर हिंदुओं को फिर यह बताने की कोशिश में दिया गया कि यह मुद्दा अब भी कितना अहम है. खासकर जब 5 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट अयोध्या के विवादित स्थल को लेकर इलाहाबाद हाइकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई शुरू करने जा रहा है. यह एक किस्म की चेतावनी ही थी कि अदालत में चल रहे विवाद के बावजूद कट्टर भीड़ ने 1992 में मस्जिद को ढहा दिया था.

2010 में हाइकोर्ट ने फैसला सुनाया था कि जमीन को तीन हिस्सों में बांट दिया जाए और उसमें से दो-तिहाई हिस्से मामले से जुड़े हिंदू पक्षों को सौंप दिए जाएं और एक तिहाई सुन्नी वक्फ बोर्ड को दे दिया जाए. तीनों ही पक्षों ने इस फैसले के खिलाफ अपील की है. सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि सभी पक्ष आपस में बातचीत करके विवाद सुलझाएं. मगर इसकी तो शुरुआत तक नहीं हुई. उधर, शिया और सुन्नी वक्फ बोर्डों में विवाद छिड़ गया. शिया वक्फ बोर्ड के चेयरमैन सैयद वसीम रिजवी ने कहा कि वे मंदिर के लिए जमीन छोडऩे को तैयार हैं और मुसलमान लखनऊ में मस्जिद बनाएं. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और उसके शिया समकक्ष ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया.

यहीं इस मामले में आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन के संस्थापक श्री श्री रविशंकर की एंट्री होती है. हाल ही में उत्तर प्रदेश के दौरे में उन्होंने कहा कि वे इस विवाद में मध्यस्थता कर सकते हैं. मगर उनकी पेशकश को मामले से जुड़े मुसलमानों और हिंदुओं दोनों ने शक की नजर से देखा. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रविशंकर की कोशिशों को 'बहुत देरी' से उठाया गया कदम कहकर खारिज कर दिया.

उडुपि में कही गई बातों से यही सामने आया कि ज्यादातर हिंदू धड़े अदालत के बाहर मामले का निबटारा चाहते हैं, क्योंकि वे मानते हैं कि वे मोलभाव की मजबूत स्थिति में हैं. अदालत के फैसले पर तो शायद उनका बस नहीं है. मगर विहिप के प्रवक्ता शरद शर्मा कहते हैं, ''मौजूदा हकीकत अयोध्या में राम मंदिर के पक्ष में हैं, इसलिए अदालत का फैसला मंदिर के पक्ष में होगा.'' अगले साल मार्च में विहिप जन जागरूकता की योजना बना रही है.

आपसी मध्यस्थता की सिफारिश करके सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में, जिसके तमाम किस्म के नतीजे हो सकते हैं, फैसले को लेकर अनिच्छा ही दर्शाई थी. इसे शायद तब तक टाला जाता रहेगा जब तक मुमकिन हो सकता है. ऐसे एक मामले में, जिसका कोई आसान या स्वीकार्य समाधान नहीं है, क्या यह बहुत हर्ज की बात होगी?

—साथ में आशीष मिश्र, लखनऊ में

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