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छवि चमकाने की जद्दोजहद

भाजपा नेताओं का कहना है कि लोकसभा चुनाव से ठीक पहले पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की छवि अगर संदेहास्पद बन गई तो इससे कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटता है. पार्टी के प्रदर्शन पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है. कांग्रेस ने कमोबेश यही रणनीति 2013 में तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के खिलाफ पूर्ति मामला उठा कर अपनाई थी. यह दांव भोथरा करने को गडकरी को अध्यक्ष पद से हटाना पड़ा था.

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सुजीत ठाकुर 08 January 2019
छवि चमकाने की जद्दोजहद अमित शाह

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को पार्टी ने ऐसे समय पर राजनैतिक षड्यंत्र से प्रताड़ित शख्स के रूप में प्रोजेक्ट करना शुरू कर दिया है जब अजेय चुनावी रणनीतिकार का तमगा उनसे छिन चुका है. इस मौके को सियासी तौर पर अपने पक्ष में करने के लिए विरोधी दल खासकर कांग्रेस, शाह की छवि को संदेहास्पद, आपराधिक और तानाशाह वाली बनाने की कोशिश में लग गई है. उसकी इस कोशिश को और बल मिला जब पांच राज्यों के चुनावों में भाजपा के निराशाजनक प्रदर्शन की जिम्मेदारी शाह ने आगे बढ़कर नहीं ली और पार्टी के ही कुछ नेताओं ने परोक्ष रूप से इस पर नुक्ताचीनी की. कांग्रेस ने एक बार फिर सोहराबुद्दीन शेख मुठभेड़ कांड से शाह का नाम जोड़ा और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इसको लेकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर पर ट्वीट भी किया. पार्टी शाह के लिए तड़ीपार अध्यक्ष का जुमला सोशल मीडिया से लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस तक में उछालने लगी.

भाजपा नेताओं का कहना है कि लोकसभा चुनाव से ठीक पहले पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की छवि अगर संदेहास्पद बन गई तो इससे कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटता है. पार्टी के प्रदर्शन पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है. कांग्रेस ने कमोबेश यही रणनीति 2013 में तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के खिलाफ पूर्ति मामला उठा कर अपनाई थी. यह दांव भोथरा करने को गडकरी को अध्यक्ष पद से हटाना पड़ा था.

भाजपा ने यह फैसला ऐसे समय में लिया था जब गडकरी को दोबारा राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने का फैसला हो चुका था पर विवादों में घिरे राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ चुनाव में जाने का जोखिम भाजपा ने नहीं उठाया. लोकसभा चुनाव से ठीक पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष को विवादों और आरोपों के घेरे से निकालने के लिए पार्टी ने फैसला किया कि देश भर में मीडिया के जरिए लोगों को बताया जाए कि शाह लंबे समय से कांग्रेस के राजनैतिक षड्यंत्र का शिकार रहे; कांग्रेस ने सीबीआइ और दूसरी एजेंसियों के जरिए शाह को प्रताड़ित करवाया लेकिन शाह अदालत से पाक-साफ होकर निकले. केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी कहती हैं कि कांग्रेस ने प्रपंच करके शाह को फंसाने की कोशिश की.

लेकिन अदालत में साबित हो गया कि शाह पर जो भी आरोप लगाए गए, वे न सिर्फ बेबुनियाद थे बल्कि राजनैतिक षड्यंत्र के तहत लगाए गए. उनके शब्दों में ''सीबीआइ के विशेष न्यायाधीश ने शाह की 30 दिसंबर, 2014 को डिस्चार्ज ऐप्लिकेशन सुनते वक्त अपनी फाइंडिंग में 2010 के केस के संदर्भ में हाइकोर्ट के फैसले को दोहराते हुए जोड़ा कि यह केस सरासर राजनैतिक कारणों से अमित शाह पर थोपा गया है.''

सूत्रों का कहना है कि भले ही शाह को अदालत ने बरी कर दिया हो लेकिन उन पर तड़ीपार का जो तमगा लगा हुआ है, उससे पीछा छुड़ाना मुश्किल हो रहा है. तड़ीपार भी चूंकि अदालत ने किया था, इसलिए इसकी काट भाजपा के पास भी नहीं. ऐसे में पार्टी ने देश भर में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर स्थिति साफ करने का फैसला किया है. इसके तहत 2 जनवरी को भाजपा शासित हर राज्य में मुख्यमंत्री, पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और वरिष्ठ नेता प्रेस कॉन्फ्रेंस कर यह बताने की कोशिश करते दिखे कि शाह को कांग्रेस ने राजनैतिक रूप से फंसाने के लिए जांच एजेंसियों का सहारा लिया लेकिन शाह अदालत से ससम्मान बरी हुए हैं.

नेताओं को विशेष रूप से यह बताने के लिए कहा गया है कि अदालत ने शाह को तड़ीपार नहीं किया बल्कि शाह ने खुद अदालत में कहा था कि यदि कांग्रेस की (तत्कालीन) केंद्र सरकार को लगता है कि वे (शाह) न्याय प्रक्रिया में हस्तक्षेप करेंगे तो वे अपने राज्य से, परिवार से दूर रहना पसंद करेंगे ताकि पूरी प्रक्रिया बिना किसी हस्तक्षेप के संपन्न हो सके.

भाजपा के मीडिया विभाग के प्रमुख और राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी कहते हैं, ''अमित शाह ने जो आठ वर्ष संघर्ष के गुजारे हैं, यह संघर्ष उनके अकेले का नहीं था बल्कि इस दौरान उनके परिवार को भी प्रताड़ित किया गया, लांछन लगाए गए. इसलिए यह बात लोगों के सामने लाना जरूरी है कि कांग्रेस ने षड्यंत्र के तहत भाजपा अध्यक्ष को बदनाम करने की कोशिश की और इसके लिए जांच एजेंसियों का दुरुपयोग किया.'' अब देखना होगा कि पार्टी का यह तर्क मतदाताओं के गले कितना उतरता है.  

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