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फिर बोल पड़ा रामायण का धोबी

अंग्रेजी लेखक जी.के. चेस्टरटन ने पत्रकारिता को बेकार की कारगुजारी बताते हुए ‘लॉर्ड जोन्स गुजर गए’ की ताजा खबर उन लोगों को सुनाई जिन्हें यह भी मालूम नहीं था कि लॉर्ड जोन्स जिंदा हैं. जो भी हो पत्रकार वैसे मौके पर तो कुछ काम कर ही जाता है जब उसे भनक मिलती है कि लॉर्ड जोन्स आखिर कर क्या रहे हैं, खासकर उस समय जब वह लेडी जोन्स को खैरात की रकम साफ करते रंगे हाथ पकड़ ले.

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एम.जे. अकबरनई दिल्‍ली, 23 October 2012
फिर बोल पड़ा रामायण का धोबी

अंग्रेजी लेखक जी.के. चेस्टरटन ने पत्रकारिता को बेकार की कारगुजारी बताते हुए ‘लॉर्ड जोन्स गुजर गए’ की ताजा खबर उन लोगों को सुनाई जिन्हें यह भी मालूम नहीं था कि लॉर्ड जोन्स जिंदा हैं. जो भी हो पत्रकार वैसे मौके पर तो कुछ काम कर ही जाता है जब उसे भनक मिलती है कि लॉर्ड जोन्स आखिर कर क्या रहे हैं, खासकर उस समय जब वह लेडी जोन्स को खैरात की रकम साफ करते रंगे हाथ पकड़ ले.

ऑक्सफोर्ड से कभी वास्ता रखने वाले लॉर्ड सलमान खुर्शीद आम इनसान की तरह बुरी खबर पसंद नहीं करते; पर उन्हें उससे भी ज्यादा नफरत खबरनवीस यानी पत्रकारों से है. सत्ता में बैठने और सत्तावादी बनने के बीच का अंतर भूलने वाले अपने झेले में धमकियों का पटाखा लेकर घूमते हैं. 14 अक्तूबर को अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस की धूल भरी आंधी के शांत होने पर लॉर्ड सलमान ने आजतक को धमकी के रूप में एक सादा संदेश दियाः ‘तेरा बेड़ा गर्क हो!’ लेकिन तंग करने वाले रिपोर्टर अच्छे से जानते हैं कि जब आस-पास के सारे लोग अपना आपा खो रहे हों तो शांत कैसे रहा जाए.

ऐसे लॉड्रर्स यह मानते हैं कि शरारती खबरनवीस बुरी नीयत से यह सब करते हैं. ऐसी खबरों का शुरुआती सबब होता है—जो छिपा है उसे जानने की खतरनाक इच्छा. जानने की इच्छा इनसान का सबसे सार्थक गुण है. अखबार पढऩे और टीवी देखने के पीछे भी यही वजह काम कर रही होती है.

बेशक ज्यादा जानने का जुनून कभी-कभी उस खोजी का किस्सा ही खत्म कर देता है. और ऐसे भी मौके आए हैं जब किन्हीं रोशनदानों से खबरों को सूंघने के चक्कर में छज्जे से और झुकता पत्रकार औंधे मुंह गिर गया है. पर ऐसी घातक लुकाछिपी से ही 99 फीसदी कामयाबी के किस्से गढ़े जाते हैं. सलमान खुर्शीद का पर्दाफाश करने वाली खबर इंतकाम की परवाह न करने वाले ऐसे ही जुझारू पत्रकारों की शानदार मिसाल है.

शायद खुर्शीद को पत्रकारिता की दुनिया के काल्पनिक दुश्मनों की अपेक्षा राजनीति में अपने असली दोस्तों को लेकर ज्यादा सचेत रहना चाहिए. उनके सीनियर कैबिनेट सहयोगी और यूपी चुनाव प्रचार में भागीदार बेनी प्रसाद वर्मा ने एक दिलचस्प सवाल पूछाः सरकार के इतने सीनियर नेता केवल 71 लाख रु. के लिए ईमान क्यों खराब करेंगे? यह अच्छा सवाल है. जब मौजूदा सरकार के ऊपर हजारों करोड़ रु. खाने का आरोप लग रहा है तो चिल्लर की बात कौन करे? खुर्शीद किसी केंद्रशासित प्रदेश में जूनियर अधिकारी नहीं; वे ऑक्सफोर्ड की डिग्री से सजे, देश के कानून मंत्री हैं. पर क्या करें उत्सुक निगाहें सामने खुली रखी चीजों को नहीं देखतीं.

मालूम होता है कि कांग्रेस ने बुरी खबरों को खारिज करने के लिए दो तकनीक ईजाद की हैः झांसा और उग्र रवैया जो खुर्शीद के मामले में दिखा; और बेचारगी के नाटकीय जामे से मीडिया और अधिकारियों को दी गई धमकियां जो रॉबर्ट वाड्रा के मामले में नजर आई. शायद नीचता की हद तब हो गई जब दिग्विजय सिंह बेतुकी टिप्प्णी कर बैठे कि रसूखदार लोगों के परिवारों को भ्रष्टाचार पर उठने वाली बहस से दूर रखा जाए.

इससे यह बात तो स्पष्ट हो गई कि वाड्रा ही इकलौते आदर्श दामाद नहीं हैं, जवाहरलाल नेहरू का भी एक दामाद था. उनका नाम फिरोज गांधी था और देश का सबसे ज्यादा प्रभावशाली सत्ताधारी परिवार इसी कुलनाम का इस्तेमाल कर रहा है. फिरोज जिस समय इंदिरा के पति और सांसद थे, उस वक्त नेहरू की शक्ति निर्विवाद थी. फिरोज ने पत्नी की खूबसूरत मुस्कान से प्रोत्साहित होकर और यह सोचकर कि प्रधानमंत्री के दामाद हैं इसलिए कुछ भी नहीं होगा, अमीर बनने के लिए जमीन की ऐसी कोई खरीद-फरोख्त नहीं की जिससे हाथ मैले हो जाएं. इसके उलट उन्होंने बतौर सांसद नेहरू सरकार के कार्यकाल में एक बड़े वित्तीय घोटाले का पर्दाफाश किया था. बेशक आज की तुलना में उस घोटाले की राशि छोटी थी.

सरकार में कई ऐसे हैं जो सोचते हैं कि खबर को दबाया जा सकता है. आप सूचना को एक हद तक ही दबा सकते हैं, उसके आगे यह खुद ही आपके हाथ से निकल जाता है. सबसे प्राचीन और सबसे ज्यादा पूजनीय रामायण में एक सवाल खड़ा होता है लेकिन उसका जवाब कहीं नहीं दिया गया. अयोध्या के धोबी को कैसे पता चला कि लंका में सीता को लेकर बातें बनाई जा रही हैं?

खबरें जब जबानी सुनाई जाएं तो बहुत तेजी से फैलती हैं. हिंदुस्तान के मर्यादा पुरुषोत्तम ने धोबी को धमकी नहीं दी थी, जबकि वे जानते थे कि धोबी गलत है, क्योंकि वे समझते थे कि उनके सिंहासन की विश्वसनीयता आशंकाओं और गलतफहमी को विवेक और साक्ष्यों की बदौलत अलग करने की उनकी काबिलियत पर निर्भर है. उस धोबी का कोई नाम नहीं, लेकिन इतिहास के पन्नों से उसे हटाया नहीं जा सकता क्योंकि वह सत्ता के सामने सवाल खड़ा करके वापस कपड़े धोने के अपने काम में व्यस्त हो गया.

हिंदुस्तान सत्ता संभाल रही सरकारों से बड़ा है. हिंदुस्तान की सरजमीं पर एक ऐसे अनोखे जन आंदोलन का जन्म हुआ जो सत्ता के गलियारों को चुनौती दे रहा है कि बस बहुत हुआ, अब आम आदमी की बारी है. ऐसी हर संकट की घड़ी से एक अनाम-सा क्रांतिकारी उठ खड़ा होता है और राष्ट्रीय मिशन की मशाल थाम लेता है. वाड्रा की जमीन के सौदे का पर्दाफाश करने वाले हरियाणा के आइएएस अधिकारी अशोक खेमका ऐसे ही हीरो हैं जो मानते हैं कि अगर वे अपना काम ईमानदारी से निभाएंगे तो राष्ट्र सुरक्षित होगा.

हिंदुस्तान के मर्यादा पुरुषोत्तम ने धोबी को धमकी नहीं दी थी. उस धोबी का कोई नाम नहीं, लेकिन इतिहास के पन्नों से उसे हटाया नहीं जा सकता क्योंकि वह सत्ता के सामने सवाल खड़ा करके वापस कपड़े धोने के अपने काम में व्यस्त हो गया.

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