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शब्दशः: खुदा का शुक्र है कि मैं खुदा नहीं

राहुल गांधी के कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष या कैबिनेट मंत्री के रूप में सत्ता के गलियारे में प्रवेश करने की संभावना से उत्सुकता बनी रहती है. पर इससे एक सवाल उठता है. पिछले आठ बरसों में राहुल गांधी क्या कभी सत्ता से दूर रहे? जब भी उन्होंने जो काम करना चाहा किया. वे कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष की तरह हमेशा मंच पर विराजमान रहे.
शब्दशः: खुदा का शुक्र है कि मैं खुदा नहीं
एम.जे. अकबरनई दिल्‍ली, 10 September 2012

सरकार के दिल की गहराइयों में एक घिसापिटा राग गूंजता रहता है. राष्ट्र के सामने दो संकट खड़े हैं जो दीमक बनकर उसकी स्थिरता को चाट रहे हैं. भ्रष्टाचार का विषधर सरकार की गर्दन पर अपनी कुंडली कसने लगा है-यह सिर्फ भीमकाय ही नहीं, बल्कि ऐसे रूप में अवतरित हुआ है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. जिस सरकारी लूट को सरकारी एजेंसियों ने ही उधेड़कर रख दिया है, उसके सामने अन्य गलत कामों और अपराधों की फेहरिस्त आहत जनता को जैसे राहत दे रही है.

असम में कांग्रेस की सरपरस्ती में हिंसा जारी है; मुंबई में वैर भड़काकर अपनी चुनावी आकांक्षाओं की रोटी सेंकने वाले शिवसेना नेताओं के भाषणों में नस्लवाद की चिनगारी को हवा दी जा रही है.

मुमकिन है कि यूपीए के पास अब भी वक्त हो, लेकिन अगर मंत्रिमंडल में फेरबदल कर वे अपनी दूरदर्शिता जताना चाहते हैं तो कहना होगा कि उनके सोचने-समझने की शक्ति चुक गई है. वजूद को बनाए रखने का सवाल प्रधानमंत्री को यकीनन बेबस बना देगा: फेरबदल, किसका और किस ओर? उनकी आवाज सुनकर मदद के लिए भागकर आने वाला शायद ही कोई सुयोग्य पात्र बचा है.

इस उजाड़ में जादू की छड़ी हाथों में थामे ऐसा कोई हीरो नहीं जो इतिहास के पन्नों पर लिखी इबारत के साथ मुकाबला कर सके. ऐसा कोई नहीं जो कांग्रेस शासित दिल्ली और गुवाहाटी के बीच एक सिरा तलाशकर उसे एक ऐसा नीतिगत स्वरूप दे सके जिसका फाहा पूर्वोत्तर के जख्मों को भर दे. भ्रष्टाचार के प्रति उनकी सरकार का जवाब कुछ ऐसा है—अपने कंधे पर लगी धूल झाड़कर हटा लो, उसके बाद विरोधियों पर दोगुनी धूल बरसाओ; अगर हमारा चेहरा भ्रष्टाचार से काला तो बीजेपी का चेहरा भी काला. हो सकता है यह सच हो, लेकिन इससे क्या उन मंत्रियों का अपराध कम हो जाएगा जिन्होंने अपने-अपने कांग्रेसी या भाजपाई दोस्त-नातेदारों को कोयला खदान आवंटित कीं?

इन सबके बीच राहुल गांधी के कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष या कैबिनेट मंत्री के रूप में सत्ता के गलियारे में प्रवेश करने की संभावना से उत्सुकता बनी रहती है. पर इससे एक सवाल उठता है. पिछले आठ बरसों में राहुल गांधी क्या कभी सत्ता से दूर रहे? जब भी उन्होंने जो काम करना चाहा किया. वे कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष की तरह हमेशा मंच पर विराजमान रहे.

जब भी उन्होंने कोई फैसला किया, उसे सरकार या पार्टी स्तर पर लागू किया गया. मुख्यमंत्रियों की युवा पीढ़ी के लिए वे जहां भी जोर लगा सकते थे, लगाया; और उन्हें कश्मीर एवं आंध्र में कुर्सी पर बैठाया. उन्होंने युवा कांग्रेस के जरिए पार्टी में क्रांतिकारी बदलाव लाना चाहा, किसी ने उन्हें नहीं रोका. वे अपनी सूची से प्रत्याशी चुनकर बिहार में पार्टी का चुनाव प्रचार खुद करना चाहते थे, सो उन्होंने किया. उत्तर प्रदेश में कुछ और सीटें पाने की उम्मीद में उन्होंने अपने थैले से सारी लुभावनी चीजें निकालकर दांव पर लगा दीं. वे आगे बढ़ते गए.

लेकिन हर बार नतीजा बुरा नहीं तो निराशाजनक तो रहा ही. पर इसके लिए उन्हें कभी जवाबदेह नहीं ठहराया गया. राजीव गांधी उस समय भी इतने प्रभावशाली नहीं थे जब उनकी मां, इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं. कांग्रेस के सभी बड़े और छोटे नेताओं ने संकल्प के साथ राहुल गांधी को ही कांग्रेस का उत्तराधिकारी और गौरव मान रखा है; यह वफादारी के लिए ली जाने वाली कसम का नया चोला है.

राहुल गांधी को पूरी छूट है कि वे जो मंत्रालय या जिम्मा लेना चाहें, ले सकते हैं. वे इसी सप्ताह गृह मंत्री बन सकते हैं और अपनी काबिलियत से असम और तेलंगाना की समस्या को दूर कर सकते हैं. अगर वे प्रधानमंत्री बनते हैं तो ये दोनों ही मुद्दे उनके एजेंडे में सबसे ऊपर रहेंगे.

किसी युवा सांसद की जिंदगी में वह पल बेहद अहमियत रखता है जब उसे प्रधानमंत्री की ओर से सरकार में शामिल होने का न्योता मिलता है. लेकिन उस शख्स के लिए इसका कोई मतलब नहीं जो कैबिनेट को सीधे तौर पर या अपनी मां की परोक्ष सत्ता के जरिए नियंत्रित कर रहा हो.

अगर सितंबर के संभावित फेरबदल में कोई चिनगारी है तो वह राज्यों से आएगी. राजनीति की बेशुमार अफवाहों का शहर बनी दिल्ली मानती है कि कांग्रेस आंध्र प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र में अपने मुख्यमंत्रियों को बदल डालेगी. अगर यह सच हुआ तो इसका अर्थ यह नहीं निकलता कि उनके काम से खुश होकर ऐसा फैसला किया गया, बल्कि वजह उन तीनों का असफल होना है.

कहीं से भी यह काबिलियत का वजीफा नहीं. हो सकता है कि नाकामी ने पृथ्वीराज चह्वाण के लिए एक कड़े फैसले की भूमिका तय कर दी हो, लेकिन अशोक गहलोत और किरण रेड्डी का जाना तो कब से बाकी है. फिर उनका दिल्ली आना डॉ. सिंह को कैसे फायदा पहुंचाएगा? अगर वे इतने ही सक्षम होते तो असफल ही नहीं होते. गहलोत और किरण रेड्डी पार्टी के फीके हो रहे रंगों में वापस नूर नहीं भर सकते; रीत रहे कोष को वे और खाली कर जाएंगे.

सिर्फ एक कांग्रेस नेता हैं जो डॉ. सिंह के कैबिनेट को एक सशक्त संबल दे सकती हैं—वे हैं शीला दीक्षित, लेकिन तब दिल्ली सरकार के लिए राज्य में मौजूदा तूफान का सामना करने का संकट खड़ा हो जाएगा.

डॉ. सिंह के निढाल बाजुओं में शक्ति का संचार करने की काबिलियत किसी में है तो वह शख्स पार्टी के अंदर नहीं, बल्कि बाहर खड़ा है. उदाहरण के लिए, शरद पवार अच्छे गृह मंत्री बन सकते हैं. एक मसखरे ने कहा, शुक्र है खुदा का कि मैं खुदा नहीं. शायद शरद पवार, अपने आसपास की बदहाली देखकर कुछ ऐसा ही कह रहे होंगे: शुक्र है प्रधानमंत्री जी, मैं प्रधानमंत्री नहीं.

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