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शब्दशः: ऐसे आजाद बनें हमारे कारोबारी

बुजुर्ग हेनरी फोर्ड 1938 में ही वह जान गए थे, जिसका अंदाजा प्रतापी ब्रिटिश राज को भी नहीं हो पाया था, कि सत्ता एक आधार से दूसरे की तरफ  जा रही है और साम्राज्‍य का युग समतावादी राष्ट्रवाद के आगेसमर्पण करने वाला है.
शब्दशः: ऐसे आजाद बनें हमारे कारोबारी
एम.जे. अकबरनई दिल्‍ली, 18 August 2012

हम आम नागरिकों को लंबे समय से यह सीख मिली है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों से निबटने का सबसे सुरक्षित रास्ता यही है कि उनके सत्कार में झुकें और उनके रास्ते से हट जाएं. भारत की आजादी के महानतम शिल्पकारों में से एक सुभाष चंद्र बोस पर कुछ रिसर्च करने के दौरान जब से मैंने यह जाना है कि फोर्ड मोटर कंपनी ने 1938 के हरिपुरा सत्र के दौरान कांग्रेस के मंत्रियों के इस्तेमाल के लिए मुफ्त में अपनी नई वी-8 कार दी थी, तब से यह आदर पूरी तरह से विस्मय में बदल गया है.

अमेरिकी ऑटो कंपनी के संस्थापक हेनरी फोर्ड अपनी एसेंबली लाइन के लिए प्रसिद्ध थे; लेकिन सद्भावना के निवेश के रूप में यह उनकी प्रतिभा की पहचान थी. उन्होंने अपनी इस पहल से भारत के भविष्य में काफी पहले सहूलियत सुनिश्चित करा ली.

यह अंश सुभाष चंद्र बोस की मिहिर बोस द्वारा लिखित जीवनी से है. सुभाष चंद्र बोस पर लियोनार्ड गॉर्डन की ब्रदर्स अगेंस्ट द राज में फोर्ड के इस कल्पनाशील प्रलोभन की पुष्टि के लिए खोज के दौरान मुझे पता चला कि बोस को वास्तव में कांग्रेस के शिविर नगर में एक स्थानीय सम्मानित व्यक्ति द्वारा दान किए गए रथ पर बैठाकर ले जाया गया था जिसमें '51 तगड़े बैल' जुते हुए थे. उन दिनों कांग्रेस का विशिष्ट वाहन किसानों की बैलगाड़ी ही थी, इसे 1952 के बाद कांग्रेस का चुनाव चिन्ह भी बनाया जाना था.

लेकिन इस प्रतीकवाद को, तगड़े बैलों सहित, अंतिम दौर के लिए सुरक्षित कर लिया गया. हरिपुरा गुजरात में ताप्ती नदी के किनारे एक छोटा-सा गांव था. सरदार पटेल की मेजबानी वाले इस सत्र में शामिल होने के लिए बोस हरिपुरा कार से पहुंचे थे. गॉर्डन इसका उल्लेख नहीं करते कि यह कार फोर्ड वी-8 थी या नहीं.

बुजुर्ग हेनरी फोर्ड या उनके एक्जीक्यूटिव 1938 में ही यह जान गए थे, जिसका अंदाजा प्रतापी ब्रिटिश राज को भी नहीं हो पाया था, कि सत्ता एक आधार से दूसरी ओर जा रही है और साम्राज्‍य का युग समतावादी राष्ट्रवाद के आगे समर्पण करने वाला है. फोर्ड कांग्रेस के मंत्रियों के साथ रिश्ते बनाने में निवेश कर रहे थे.

वर्ष 1938 तक कांग्रेस सत्ता का स्वाद चख चुकी थी. 1937 के चुनावों के बाद कांग्रेस आधा दर्जन से ज्‍यादा ब्रिटिश प्रांतों में चुनकर आई थी, लेकिन उसे लखनऊ के नगर निगम पर आधिपत्य से दिल्ली में एक स्वतंत्र सरकार बनाने तक लंबी दूरी तय करनी थी. जिस किसी ने फरवरी, 1938 में हरिपुरा में यह माना होगा कि नौ साल में भारत आजाद हो जाएगा, वह दिल से ही सोच रहा होगा, दिमाग से नहीं.

विनाशकारी विश्व युद्ध ने अंग्रेजों के इरादे को पस्त कर दिया; और हिटलर के खिलाफ यह युद्ध भी 18 माह के बाद हुआ था. अगर हिटलर पूरी तरह से नरसंहारक सनकी नहीं बनता, तो ब्रिटेन की ताकतवर तुष्टीकरण लॉबी देश को इस युद्ध से दूर ही रखती. हिटलर को इससे कोई गुरेज नहीं था कि अंग्रेज भारत पर शासन करें; उसने इसका समर्थन लगभग उतनी सरगर्मी के साथ किया जितनी हसरत से वह ब्रिटेन पर जर्मनी के शासन के सपने देखता था. लंबे अरसे में कोई भी ताकत भारत को आजादी हासिल करने से नहीं रोक सकती थी, लेकिन अगर हिटलर ने ब्रिटेन को थका नहीं दिया होता तो भारत के लिए आजादी की लड़ाई हिंसक और लंबी प्रक्रिया हो सकती थी. इतिहास की सबसे महान विडंबनाओं में से एक बात यह है कि 1945 की हार से जर्मनी तो उबर गया, लेकिन ब्रिटिश साम्राज्‍य जीत के बाद भी कभी उबर नहीं पाया.

इस तथ्य में भी कुछ हद तक विडंबना थी कि उग्र सुधारवादी और लड़ाकू बोस ने हरिपुरा के अपने अध्यक्षीय संबोधन में पूंजीवाद पर चोट कीः ''ग्रेट ब्रिटेन के पूंजीवादी शासक वर्ग और विदेशों में स्थित उपनिवेशों में एक अटूट रिश्ता है.'' निश्चित रूप से बोस ने यह नहीं सोचा होगा कि अमेरिकी पूंजीवादियों को बख्शा जा सकता है. एक और आकर्षक परोक्ष टिप्पणी में बोस ने कहा कि वे आजाद भारत में जापानी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को संचालन की इजाजत नहीं देंगे, जबकि वे उस समय जापानी सैनिकों के साथ अपनी मातृभूमि को आजाद कराने के लिए आगे बढ़ रहे थे.

आदर्श और व्यावहारिकता के बीच टकराव कम-से-कम उतना पुराना तो है ही जितना इन विचारों का अंकुरण कि आधुनिक भारत किस तरह का होना चाहिए. छह दशक के बाद हम सुभाष चंद्र बोस को भी पूजते हैं और बढ़िया जापानी कारों की सवारी भी करते हैं, एक भारतीय छद्म नाम मारुति के झीने आवरण में. हम आदर्श को फ्रेम में मढ़कर दीवारों पर टांगने और व्यावहारिक अवसरों का फायदा उठाने में माहिर हैं.

बहुराष्ट्रीय कंपनियां शांत और निर्दयी होती हैं और उनका ध्यान मुनाफे पर रहता है. नेता उबल पड़ते हैं, टिप्पणीकार उपदेश देते हैं. हर व्यक्ति के पास हरियाणा में मारुति के कारखाने में फट पड़ने वाली हिंसा पर कहने के लिए कुछ न कुछ था, लेकिन इसके जापानी मालिक बहुत कम बोले और जब ऐसा करना हुआ तो उन्होंने एक भारतीय के माध्यम से ही अपनी बात पहुंचाई. उन्होंने कारखाने के रूल बुक के अध्याय और पदों को पढ़ा, मौत के लिए जवाबदेही की मांग की और जीवन ढर्रे पर आ गया.

मेरी यह दलील नहीं है कि हर गांव में चारपाई की जगह आइकिया का विदेशी फर्नीचर आ जाए. स्वतंत्रता दिवस पर सिर्फ यही चाह है कि एक दिन ऐसा आएगा जब मंद-मंद मुस्कुराते भारतीय कारोबारी दूसरों के लिए वही करेंगे जो दूसरों ने हमारे साथ किया है.

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