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शब्दशः: स्टैंड पर साइकिलों का गिरना

ममता सियासी जिंदगी का बुनियादी नियम जानती हैं. वे मितभाषी नहीं हैं लेकिन उनके हाव-भाव उनके वाक्यों से ज्यादा बोलते हैं. वे केंद्र में यूपीए सरकार से अपना समर्थन वापस लेकर सरकार तो नहीं गिरा पाई लेकिन उसके विश्वास की हवा जरूर निकाल दी और राजनीति को चुनाव के रास्ते पर ला दिया.

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एम.जे. अकबरनई दिल्‍ली, 07 October 2012
शब्दशः: स्टैंड पर साइकिलों का गिरना

इसकी शुरुआत ममता बनर्जी से हुई. एक ही झटके में उन्होंने बहुत-सी चीजों को हरकत में ला दिया और घटनाओं का एक सिलसिला चल निकला जिसने विरोधाभास, खौफ, शक और आकांक्षाओं का ऐसा द्वार खोल दिया जिसे सिर्फ एक आम चुनाव से हल किया जा सकता है. उनके निर्णायक किरदार को बहुत कम सराहा गया है क्योंकि मध्यवर्ग और उसके खेल के मैदान मीडिया ने उन्हें बेलगाम कहकर नकार दिया जबकि उनकी बुनियादी खूबी उनकी आजादी है, जिसका इस्तेमाल करने में वे कभी नहीं हिचकतीं.

वे राजनीति का एक बुनियादी नियम जानती हैं. राजनीति के फैसले समाचारों से तय नहीं होते. कोई भी समझदार नेता खबरों में किरदार की तरह तो आता है लेकिन उसके असर को लेकर सतर्क रहता है. घटनाओं के सिलसिले के बीच वह अपनी राय बनाता है. आम चुनाव के होने या न होने का फैसला किसी दिन की ब्रेकिंग न्यूज नहीं बल्कि बन गई धारणा का परिणाम होगा.

ममता बनर्जी को जब लगा कि बदरंग हो चुकी कांग्रेस के साथ अब और बने रहना नुकसानदेह होगा तो उन्होंने विपक्ष के कमांडर की भूमिका संभाल ली. उन्होंने खुले आम वह बात कह दी जिसे कांग्रेस के दूसरे सहयोगी अकेले में मानने लगे हैं. ममता मितभाषी नहीं हैं लेकिन उनके हाव-भाव उनके वाक्यों से ज्यादा बोलते हैं. वे अपना समर्थन वापस लेकर सरकार तो नहीं गिरा पाईं लेकिन उसके विश्वास की हवा जरूर निकाल दी और राजनीति को चुनाव के रास्ते पर ला दिया.

ममता के औपचारिक तौर पर सरकार से अलग होने के चार दिन बाद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा कि यूपीए सरकार स्थिर है. कुछ ही घंटों बाद यूपीए के सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी दल एनसीपी के प्रमुख शरद पवार ने महाराष्ट्र में सरकार को हिलाना शुरू कर दिया. कांग्रेस और एनसीपी के बीच का स्थानीय झगड़ा अचानक उबल पड़ा. जिन लोगों ने अपनी महत्वाकांक्षाओं को दबाए रखा था, वे अब सक्रिय हो गए है.

उसी दिन तमिलनाडु में कांग्रेस के पक्के दोस्त डीएमके ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को उनके दूत के जरिए कहलवा भेजा कि वह मंत्रिमंडल के प्रस्तावित बदलाव के लिए कोई नया नाम नहीं देना चाहते हैं. डीएमके का संदेश सीधा-सा था कि हमें क्या करना चाहिए, कहने के दिन लद गए और अगर आप हमारी बात नहीं सुनेंगे तो हमारे पास दूसरे विकल्प हैं.

ममता की इस चाल के बाद एक ही हफ्ते में कांग्रेस का गठबंधन ही अस्त-व्यस्त हो गया. इसके लिए एक मुहावरा है: शिराजा बिखरना. यूपीए उस शहतीर से अलग हो रही है जिसने उसे जोड़ रखा था. एक व्यक्ति जो कांग्रेस के साथ वफादारी के साथ खड़े हैं वह लालू प्रसाद यादव हैं जिन्हें 2009 में मंत्रिमंडल में भी शामिल नहीं किया गया था.

कांग्रेस समेत हर कोई टीवी स्क्रीन की इबारत पढ़ सकता है. जब युद्ध आसन्न हो तो उससे पहले नगाड़े बजते हैं. चुनावी जंग सबसे पहले विज्ञापन में नजर आती है. वह 2009 से एक ही गीत को बार-बार गाए जा रही है. अब कांग्रेस को समर्थन देने वाली आबादी मुस्लिम, महिला और गरीब वाली सामान्य सुर्खियों में जान डालने की जरूरत है.

समानांतर स्तर पर रुकी हुई अर्थव्यवस्था को हरकत देने और कोयला घोटाले जैसे नाश पीटने वाले मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने के लिए कांग्रेस आर्थिक सुधार और फैसलों के जरिए शहरी मध्य वर्ग यानी 'एटमी डील वाले निर्वाचन क्षेत्र' को फिर से जिंदा करना चाहती है. ये सुर कांग्रेस के लिए है न कि यूपीए के लिए. यूपीए की पतवार टूट चुकी है और कांग्रेस अपने चुनावी कंपास को फिर से सेट करने की कोशिश में है.

औपचारिक विपक्ष के लिए अब यह मुद्दा नहीं है कि सरकार कब तक टिकती है क्योंकि जो सरकार हुकूमत न कर सके, वह जितनी ज्यादा देर टिकेगी, उसके लिए उतना ही बुरा होगा. कांग्रेस को बहस के मुद्दे को बदलने के लिए वक्त की दरकार है और वह आखिरी वक्त तक इंतजार करेगी. लेकिन यह पार्टी इतनी पुरानी तो है ही जो यह न समझे कि अनिश्चित बहुमत वाली सरकार काम नहीं कर सकती या यह कि अजीत पवार जैसी हर बगावत का संकट उसकी भ्रष्टाचार वाली छवि को बढ़ाएगा.

हालात बदलने के साथ ही गठबंधन में कांग्रेस की स्थिति बदल गई है. जो जगह पहले कांग्रेस के पास थी उसे सहयोगियों ने घेर लिया है. ममता बनर्जी की यूपीए से विदाई के साथ ऐसे एक अंतर्विरोध का अंत हो गया है. हालांकि अभी उनका जाना कांग्रेस को महंगा पड़ा है लेकिन पार्टी उन अच्छे दिनों की कल्पना कर सकती है जब ममता अपना समर्थन खो देंगी. वहीं एनसीपी के साथ रिश्ते दरक गए हैं और डीएमके अब तंज करने लगी है.

यह आम राय है कि बीजेपी 2004 में चुनाव इसलिए हार गई क्योंकि उसके 'इंडिया शाइनिंग' प्रचार ने गरीबों की दुर्दशा को सामने ला दिया और गरीबों ने बीजेपी को बता दिया कि वे अब भी चुनाव के दिन के मालिक हैं. लेकिन वोट डालने के दिन से पहले ही बीजेपी महत्वपूर्ण जंग हार चुकी थी जब उन्होंने अपनी हेकड़ी में हरियाणा में ओमप्रकाश चौटाला, झारखंड में शिबू सोरेन, और असम में एजीपी जैसे अपने पारंपरिक सहयोगियों को नाराज कर दिया था. जब राजनीति इतनी विखंडित हो तो कतरा-कतरा दरिया बनाता है.

कांग्रेस ने अपना एक मुख्य सहयोगी खो दिया है और अन्य दो को नाराज कर दिया है. जो लोग अभी सरकार का सहयोग कर रहे हैं वही मुलायम सिंह यादव और मायावती चुनाव में उनके विरुद्ध काफी सख्त होंगे. अगर कांग्रेस या बीजेपी अगले आम चुनाव में विजयी होना चाहती हैं तो उन्हें आज अपनी हेकड़ी छोड़नी होगी.

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