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राष्ट्र हित: BJP के पास दो हाफ गर्लफ्रेंड

राज्यों के चुनाव बताते हैं कि लोकसभा का रुझान कायम है: राष्ट्रीय तौर पर बीजेपी अब नई कांग्रेस है, लेकिन कांग्रेस तो अभी पुरानी बीजेपी भी नहीं है.
 <b><span style="color:red">राष्ट्र हित:</span> BJP के पास दो हाफ गर्लफ्रेंड</b> National Interest By Shekhar Gupta
शेखर गुप्तानई दिल्ली, 27 October 2014

राजनीति पर इंटरनेट लतीफों के इस दौर में मैं भी अपना छोटा-सा विनम्र योगदान करना चाहता हूं. अगर चेतन भगत आज महाराष्ट्र में बीजेपी के उभार पर किताब लिखते तो उसका क्या नाम रखते? जाहिर है, 'दो हाफ गर्लफ्रेंड्स.' चूंकि उन्हें अपने शीर्षकों में गिनती इतनी पसंद है, लिहाजा और भी बेहतर होता अगर वह इस किताब का नाम रखते, '123 और दो हाफ गर्लफ्रेंड्स.'

मुझे नहीं पता, इसमें इंटरनेट बाजार को लुभाने का कितना माद्दा है, लेकिन देश के दूसरे सबसे बड़े राज्य में बीजेपी के लाजवाब गैर-असमंजस को बयान करने का यह निश्चित तौर पर बेहतर तरीका है. मजे की बात यह है कि इससे पराजित और ठुकरा दी गई कांग्रेस पार्टी की हालत का भी पता चलता है.

यह कैसे है और हम इसे बीजेपी का गैर-असमंजस क्यों कहते हैं. 2014 के चुनावों से इतना तो साबित हो गया है कि जहां तक राजनैतिक रंगमंच की बात है, इस पर फिलहाल सिर्फ एक शो कामयाब है और वह है बीजेपी. यह कई लोगों के पाला बदलने से पहले ही जाहिर हो चुका था. लेकिन अब शरद पवार और उनकी एनसीपी के जमावड़े ने जिस चतुराई से बिना शर्त पाला बदला है, वैसा हमारी राजनीति में पहले नहीं हुआ. चूंकि इंटरनेट और गूगल से पहले भी हमारा राजनैतिक इतिहास था और चूंकि हरियाणा में भी अभी चुनाव हुए हैं, इसलिए भजनलाल के ऐतिहासिक दलबदल से इसकी तुलना करने का लोभ होता ही है.

1980 की गर्मियों में इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी के साथ ही हरियाणा में भजनलाल ने अपने तमाम विधायकों के साथ जनता पार्टी छोड़कर कांग्रेस में सामूहिक दलबदल कर लिया था. इस तरह एक जनता मुख्यमंत्री और उसका मंत्रिमंडल रातोरात कांग्रेसी बन गए थे. पवार का पाला-बदल उतना भव्य और शानदार प्रतीत नहीं होता, लेकिन विशुद्ध मोटी चमड़ी की बेशर्मी के मामले में उन्होंने भजनलाल को पीछे छोड़ दिया है. भजनलाल के हाथ में कम-से-कम सौदेबाजी के फायदे तो थे. पवार तो हाथ में भीख का कटोरा लिए बीजेपी का दरवाजा खटखटा रहे हैं. इससे हमारी दो गर्लफ्रेंड्स में से एक की हालत का बखूबी पता चलता है.

दूसरी की हालत तो और भी दयनीय है क्योंकि पवार के विपरीत (जिनकी राजनीति हमेशा 'लचीली’ रही है—याद कीजिए एक बार प्रणब मुखर्जी ने यह कहकर कि पवार हमेशा मिले-जुले संकेत देते हैं, कितनी कुशाग्रता से उनका नख-शिख वर्णन किया था), शिवसेना की राजनीति, और मैं कहूंगा कि अर्थव्यवस्था भी, गीदड़भभकी, दबंगई और गरजदार लफ्फाजी पर आधारित रही है. इस चुनाव नतीजे ने उसके गुब्बारे में छेद कर दिया है.

उस एकमात्र राज्य में जहां उसका महत्व है, वह आखिरकार बीजेपी की बी-टीम बनने की बेचारगी तक सिमट गई है. उसका प्रभाव इतना कमजोर हो गया है कि जितना सत्ता के करीब न होने के बावजूद बाला साहेब के जमाने में कभी नहीं हुआ था. अगर वह बीजेपी से दूर रहती है तो वृहद् मुंबई नगरपालिका (बीएमसी) का आधिपत्य भी गंवा देगी जो उसकी राजनीति का वित्तीय ईंधन है.

आम तौर पर कहा जाता है कि ताजा चुनाव परिणामों की सबसे अहम बात है नरेंद्र मोदी-अमित शाह जोड़ी की दोनों राज्यों में अकेले चुनाव लड़ने की गुस्ताखी. लेकिन यह बात जरा ज्यादा गूढ़ है. यह बीजेपी के फोकस, उसके नेतृत्व की रणनीतिक दूरदृष्टि और अपने कार्यकर्ताओं के लिए प्रतिबद्धता की कहानी है. वह महाराष्ट्र में हाशिये की खिलाड़ी थी और फिर प्रमोद महाजन की हत्या भी उसके लिए एक झटका थी.

तो भी वह अपने रास्ते से डिगी नहीं. अगर आप एक के बाद एक हुए चुनावों के नतीजों का सावधानी से अध्ययन करें तो आप बीजेपी का वोट प्रतिशत और सीटें लगातार बढ़ती हुई देख सकते हैं. 2009 के विधानसभा चुनावों से भी इसी रुझान की तस्दीक हुई. वह शिवसेना के कुर्ते का कोना पकड़कर तब तक लटकी रही जब तक उसे जरूरत थी और अब उसे उसका हक देने से इनकार करने का ढोंग करके तंग कर रही है.

इस पतन के लिए केवल उद्धव ठाकरे को दोषी ठहराने की इच्छा स्वाभाविक है. लेकिन शिवसेना को आगे-पीछे से बेनकाब कर देने वाली रणनीतिक महाभूल खुद बाला साहेब ने की थी, जब उन्होंने महाराष्ट्रवाद की जमीन पर खड़ी पार्टी की आधारभूमि को बदलकर उसे हिंदूवाद की जमीन पर खड़ा कर दिया था. शिवसेना मूल रूप से मुंबई की ट्रेड यूनियनों पर वामपंथियों की पकड़ का मुकाबला करते हुए आगे बढ़ी और उस वक्त कांग्रेस ने भी साझा शत्रु के खिलाफ उसका खुशी-खुशी खूब इस्तेमाल किया.

ऐसी भी खबरें थीं कि सेना ने कभी-कभार चुनावों में भी कांग्रेस के साथ 'मिलकर काम किया’ था. जब तक वह मराठी माणुस के हक में बोलती, दबंगई करती और उत्पात मचाती थी, तब तक उसकी जगह कायम थी. लेकिन जिस दिन बाला साहेब ने हिंदुत्व का दामन थामा, संभवत: 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस से प्रेरित होकर, उसी दिन से शिवसेना बीजेपी की सहायक बन गई. यह उस वक्त तक तो कारगर रहा जब तक लगाम वाजपेयी-आडवाणी की शालीन पीढ़ी के हाथों में थी. उन्होंने एक उदार, सेकुलर, समावेशी मुखौटा कायम रखा और उनके दाहिने बाजू में शिवसेना अपनी हरकतों से सुर्खियां बटोर सकती थी.

लेकिन मोदी के उभार ने वह सब बदल दिया. वे हिंदुत्व के असली, पश्चाताप-विहीन प्रवक्ता थे और शिवसेना राज्य में किसी सूरत में उनसे नहीं लड़ सकती थी. महाराष्ट्रवाद की ओर लौटने के लिए अब बहुत देर हो चुकी थी. उद्धव ने अपने वरिष्ठ पार्टीजनों के सामने माना था कि यह महाभूल थी लेकिन उनके साथ तीन समस्याएं थीं. एक, उनका कद इतना ऊंचा नहीं था कि वे बाला साहेब द्वारा स्थापित रुख को पलट पाते. दो, उनके चचेरे भाई राज पहले ही माणूस की शरण में चले गए थे.

और तीन, उन्होंने इसे बहुत देर से छोड़ा, उनके सामने विकल्प यही था कि या तो वे बीच सफर में रणनीतिक सुधार करते या बीजेपी से नाता तोड़कर एकला चलो रे चुनते. इस बीच बीजेपी उनके इलाके में घुसपैठ और अतिक्रमण करती रही. मोदी अब आराम से बैठकर अल्पमत सरकार बना सकते हैं और शिवसेना को चुनौती दे सकते हैं कि वह कांग्रेस के साथ वोट देकर सरकार को गिराकर दिखाए. अव्वल तो एनसीपी, जिसके लिए यह जीवन-मरण का प्रश्न है, ऐसा होने नहीं देगी. और अगर होने भी देती है तो नए चुनाव में शिवसेना का बचा-खुचा भी नष्ट हो जाएगा. अब आप समझ गए होंगे कि बीजेपी हाफ गर्लफ्रेंड के तौर पर दोनों के साथ खिलौनों की तरह क्यों खेल सकती है.

हरियाणा में बिल्कुल भिन्न रणनीति अपनाई गई. कुलदीप बिश्नोई की पार्टी के साथ कोई निष्ठा नहीं थी और लोकसभा चुनावों से पता चल चुका था कि उसकी कितनी अहमियत थी. बीजेपी का दुस्साहस यह था कि उसने चौटाला और उनके साथ पक्की जीत को भी इनकार कर दिया. उसने अपनी किस्मत और हिम्मत के भरोसे आगे बढऩे का फैसला किया और वह भी उस राज्य में जहां उसने खुद अपने चुनाव चिन्ह पर (जनसंघ के रूप में, 1967 में) कभी 90 में से 13 से ज्यादा सीटें नहीं जीती थीं.

झगड़ालू वंशवादी राजनीति से ऊबे मतदाताओं के सामने बीजेपी एकमात्र नया विकल्प थी. यह मानकर चलना चाहिए कि इस कामयाबी से प्रेरित होकर अब वह आखिरी राजनैतिक साथी अकाली दल से भी अपने को दूर कर लेगी. और क्यों नहीं, आखिर अकाली दल भी एक वंशवादी उद्यम है जिससे मतदाता आजिज आ चुके हैं.

इसकी तुलना उन राज्यों में कांग्रेस के प्रदर्शन से कीजिए जिनकी लगाम या तो सहयोगी दलों के साथ या सीधे उसके हाथ में थी. तमिलनाडु में दशकों से एक द्रविड़ सहयोगी के साथ उसका साझ रहा है. लेकिन राज्य में खुद अपनी मौजूदगी, काडर और साख स्थापित करने में वह इस कदर नाकाम रही कि 2014 में जब उसे किसी पार्टी का साथ नहीं मिला तो वह पूरी 39 सीटें हार गई.

उसके राज्य संगठन का न वजूद है, न नेता. तमिलनाडु महत्वपूर्ण उदाहरण है क्योंकि यहां दशकों से इंदिरा और राजीव गांधी को भरपूर प्यार और आदर मिलता रहा है. लेकिन उनकी पार्टी ने अपनी काहिली और आरामतलबी से यह राज्य स्थानीय सहयोगी के कदमों में डाल दिया. भरोसे की कमी इससे स्पष्ट है कि राहुल गांधी ने युवा कांग्रेस के लाखों सदस्य बनाए, जिसमें  90 फीसदी अलग हो गए. इसकी तुलना बीजेपी की उपलब्धि से कीजिए जो उसने इससे मिलती-जुलती परिस्थिति में महाराष्ट्र में हासिल की है.

सीमांध्र में (एक और बड़ा राज्य जहां कांग्रेस का मई के चुनावों में सफाया हो गया था) और पश्चिम बंगाल में भी पार्टी अपने से टूटकर अलग हो गए नेताओं (क्रमश: वाइ.एस. जगनमोहन रेड्डी और ममता बनर्जी) को अपनी राजनैतिक जमीन हथियाते हुए देखती रही. दोनों राज्यों में अब प्रमुख राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर बीजेपी उसकी जगह ले रही है और क्षत्रपों के सामने उसने केवल यही विकल्प छोड़ा कि उससे लड़ें या उसका वर्चस्व स्वीकार कर लें. चंद्रबाबू नायडु बीजेपी के साझीदार हैं और बेहतर होगा कि वे अपनी पीठ पीछे निगाह रखें. ममता इतनी चतुर हैं कि जानती हैं कि वाम के पतन और कांग्रेस की गुमशुदगी के साथ बीजेपी उनके राज्य में नई उभरती हुई ताकत है.

इन राज्य चुनावों का ज्यादा बड़ा संदेश यही है. राष्ट्रीय तौर पर बीजेपी अब नई कांग्रेस है. और कांग्रेस हमें अभी रत्ती भर भी विश्वास नहीं दिला पाई है कि वह कम-से-कम पुरानी बीजेपी हो सकती है. इस दौर की राजनीति के बाद यह सबसे लुभावना निष्कर्ष है.

पुनश्च: मेरी पहली बड़ी राजनैतिक स्टोरी जनवरी 1985 में इस पत्रिका के लिए लिखी गई कवर स्टोरी थी जिसका शीर्षक था 'द अपोजिशन: इन द वाइल्डरनेस’ (IndiaToday.in/1985opposition). यह राजीव गांधी की लहर के बाद लिखी गई थी. उन्होंने शेखी बघारते हुए कहा था कि उन्होंने तीन प्रमुख विपक्षी दलों के लिए एक 10+2+3 प्रणाली का ऐलान किया है. इसमें सबसे कम 2 बीजेपी के लिए थे. लेकिन बीजेपी हार मानने को तैयार नहीं थी. हालांकि मुझे ज्यादा तजुर्बा नहीं था, लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी, दोनों ने मुझे मिलने के लिए वक्त दिया.

ठीक यही चंद्रशेखर और रामकृष्ण हेगड़े ने भी किया. इसकी तुलना में आज की कांग्रेस को देखिए जिसने अपने बचाव की जिम्मेदारी पराक्रमी मणिशंकर अय्यर को आउटसोर्स कर दी है. लेकिन बीजेपी नेताओं का जवाब सबसे महत्वपूर्ण और भविष्यदर्शी था. उम्मीद के मुताबिक आडवाणी दृढ़संकल्प थे. उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी को ज्यादा स्पष्ट वैचारिक आधार की ओर लौटना होगा और गठबंधन की मानसिकता से उबरना होगा, क्योंकि यह मानसिकता उनकी राजनीति को महज गांधी परिवार के विरोध तक सीमित कर देती है. वाजपेयी ज्यादा उदास लेकिन दार्शनिक की मुद्रा में थे और आगे देख रहे थे.

उन्होंने मुझसे कहा, ''सितारों से आगे जहां और भी हैं” और स्वीकार किया कि एकमात्र इंदिरा-विरोध-वाद के नारे पर निर्भर रहकर विपक्ष ने गलती की. उन्होंने कहा था, ''जब इंदिरा जी नहीं रहीं तो हमारे पास राजीव के खिलाफ कहने को कुछ नहीं था.” लेकिन पुराने पन्ने पलटते हुए उनके एक और बयान पर मेरी निगाह अटक गई. उन्होंने कहा था कि समूची राजनीति को अब ज्यादा युवा होना पड़ेगा.

उन्होंने यह भी कहा था कि उनकी पार्टी के पास ''बंबई में प्रमोद महाजन और दिल्ली में अरुण जेटली” जैसे होनहार युवा नेता हैं. याद रखिए, यह जनवरी 1985 की बात है और इन दोनों नेताओं की उम्र उस वक्त 30 वर्ष से कुछ ऊपर ही थी. बीजेपी में मोदी और शाह ने करीने से वाजपेयी और आडवाणी की जगह ले ली है. कांग्रेस के लिए सवाल यह है: आपके आडवाणी, वाजपेयी और फिर महाजन और जेटली कौन हैं? या आपके पास खिलाड़ी और खेल की कोई योजना है भी?

मोदी अब आराम से बैठकर अल्पमत सरकार बनवा सकते हैं और शिवसेना को चुनौती दे सकते हैं कि वह कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार गिराकर दिखाए. अव्वल तो एनसीपी ऐसा होने नहीं देगी. अगर यह होता भी है तो अगले चुनावों में शिवसेना की बची-खुची जमीन भी खिसक जाएगी.

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