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मदरसे से मुंबई तक एक जुनून का सफर

शाहिद कबीर रंगमंच के निर्देशक और कबीरा ग्रुप के संस्थापक की बतौर निर्देशक पहली फिल्म उन्माद जल्द रिलीज होने वाली है

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मोहम्मद वक़ास और प्रवीण सिंहनई दिल्ली, 11 July 2018
मदरसे से मुंबई तक एक जुनून का सफर शाहिद कबीर

सहारनपुर में 6 दिसंबर 1992 को जब सारे लोग देशभर में हिंसा और तनाव की खबरें जानने के लिए टीवी या रेडियो से चिपके हुए तब 15 साल का एक लड़का गलियों में नुक्कड़ नाटक के जरिए लोगों को शांति का पैगाम दे रहा था.

उसकी निडरता और रचनात्मकता दुस्साहस से कम नहीं थी. स्थानीय लोगों ने कहा, "यह लड़का यहां रहने लायक नहीं है.'' वही लड़का बाद में दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया में पढऩे गया और पढ़ाई के साथ ही रंगमंच के प्रति अपने जुनून को जिंदा रखा.

वहां विश्वविद्यालय प्रशासन के कुछ लोगों ने कहा, "क्या यहां तुम सबको कम्युनिस्ट बनाओगे?'' पर इन तानों के बावजूद समाज के बदलते हालात के इस छोटे गवाह का कला और रंगमंच के प्रति जुनून कम नहीं हुआ.

उसका जुनून अब पूरे देश में दिखने वाला है. शीघ्र रिलीज होने वाली फीचर फिल्म उन्माद के पोस्टर पर डायरेक्टर की जगह उसी का नाम लिखा हैः शाहिद कबीर.

लेकिन सहारनपुर से मुंबई तक का शाहिद का सफर आसान नहीं है. 1997 में जन्मे शाहिद ने शुरुआती तालीम अपने गांव इस्लामनगर के एक मदरसे में हासिल की और फिर उन पर मौलवी बनने का जुनून सवार हो गया.

आम के बागों के ठेकेदार उनके वालिद मोहम्मद हनीफ ने बेटे में मौलवियत का रुझान देखकर उन्हें सहारनपुर में 1866 में स्थापित मदरसे मजाहिरुल उलूम में दाखिला दिला दिया.

वहां उनके चाचा सरदार अनवर उनके गार्जियन बन गए, जो इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) से जुड़े मशहूर शायर थे. शाहिद अपने चाचा की वामपंथी विचारधारा से प्रभावित हुए और मदरसे में दो साल बिताने के बाद ही उन्हें लगा कि उन्हें आलिम-फाजिल की डिग्री नहीं लेनी.

अनवर ने उनका दाखिला स्कूल में करा दिया. उन्होंने इस्लामिया इंटर कॉलेज के बाद बलदेव दास बजौरिया कॉलेज में दाखिला ले लिया. इसी दौरान उन्हें थिएटर का शौक लगा और उन्होंने एक मंडली बना ली, जो विभिन्न विषयों पर नुक्कड़ नाटक करती थी.

उसी जमाने में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) ने सहारनपुर में वर्कशॉप आयोजित किया, जिसमें उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. फिर तो उन पर रंगमंच का जुनून सवार हो गया.

शाहिद के इसी रुझान को देखते हुए अनवर ने 1993 में एक रोज उनसे कहा, "बेटा, फैसला कर लो कि जिंदगी में तुम्हें क्या करना है.'' शाहिद ने पहले ही फैसला कर लिया था. उन्हें एनएसडी, दिल्ली या फिल्म ऐंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, पुणे में पढऩा था. वहां दाखिला आसान नहीं था.

सो, वे थिएटर के अपने शौक को कायम रखते हुए शादी और विभिन्न आयोजनों के वीडियो बनाने वालों की टीम के साथ जुड़ गए, पर पढ़ाई जारी रखी. बारहवीं की परीक्षा के बाद उन्होंने दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया में उर्दू साहित्य से एमए किया. दिल्ली ने उनके रंगमंच के शौक के फलक को विस्तृत कर दिया. जामिया से लेकर मंडी हाउस तक उन्होंने अपनी रचनात्मकता का प्रदर्शन शुरू कर दिया.

पढ़ाई के दौरान उन्होंने जामिया में इप्टा की शाखा तैयार कर दी और वहां जिन लाहौर नहीं देख्या (असगर वजाहत ), गांधी ने कहा था (राजेश कुमार) जैसे नाटकों का मंचन किया. उर्दू एकेडमी के सालाना फेस्टिवल में कई नाटकों का आयोजन किया, जिनमें बूढ़े शजर की रोशनी (शफी अहमद), 1857 की दिल्ली (दीनदयाल सक्सेना) और पहले आप (इफ्तिखार अहमद) का कई बार मंचन हुआ. इनके निर्देशन, डिजाइन और लाइटिंग तक की व्यस्था वे खुद देखते थे.

फिर 2002 में उन्हें प्रतिष्ठित ए.जे.के. मास कम्युनिकेशन रिसर्च सेंटर में दाखिला मिल गया. वहां उन्हें पढ़ा चुकीं प्रोफेसर शोहिनी घोष कहती हैं, "हमारे यहां मदरसे से कई अच्छे स्टुडेंट्स पढ़ चुके हैं. इसके अलावा, हमारे कोर्स में स्ट्रीट थिएटर भी होता था.''

एमसीआरसी में पढ़ाई के दौरान उन्होंने नाटकों के अलावा, सआदत हसन मंटो की शलवार, खोल दो, टोबा टेक सिंह जैसी कहानियों को भी नाटक में बदल दिया. इसी दौरान मुजफ्फर अली ने उनकी निर्देशन क्षमता को देखा और धारावाहिक जुबान-ए-इश्क में उन्हें चीफ असिस्टेंट आर्ट डायरेक्टर बना दिया. दिल्ली में ही उन्हें मशहूर सिनेमैटोग्राफर जुबी आमिर से काफी कुछ सीखने को मिला.

शाहिद अपनी किस्मत आजमाने के लिए करीब 10 साल पहले मुंबई चले गए. लेकिन रंगमंच के प्रति वहां भी जुनून बरकरार रहाः आखिरी मुशायरा और पृथ्वी थिएटर में गालिब का मंच किया. वहां हमख्याल दोस्तों के साथ कबीरा नामक ग्रुप बनाया, जो बांद्रा, अंधेरी और सांताक्रुज जैसे इलाकों में नाटकों के जरिए बच्चों में सामाजिक मूल्यों को भरने की कोशिश करता है.

साथ ही फिल्मी दुनिया के ग्लैमर से आकर्षित होकर मुंबई पहुंचे और फिर काम न मिलने से मायूस लोगों को सलाह देता है, उनकी मदद करता है.

लेकिन सिर्फ रंगमंच से जीवन नहीं चलता, लिहाजा उन्होंने साड्डा अड्डा, जिंदगी ऑन द रॉक्स, लिटिल गांधी सरीखी कई छोटे बजट की फिल्मों में चीफ असिस्टेंट डायरेक्टर की भूमिका निभाई. उन्हें लगा कि स्वतंत्र रूप से अपना भी कुछ काम करना चाहिए और देश के मौजूदा हालात को परदे पर उतारने से बढिय़ा और क्या हो सकता है.

इस तरह, बतौर निर्देशक उनकी पहली फिल्म उन्माद तैयार हो गई, जो पिछले पखवाड़े सेंसर बोर्ड से प्रमाणपत्र मिलने के बाद जल्द रिलीज होने वाली है.

शाहिद शायर अनवर को अपना बौद्धिक पिता मानते हैं. वे अपने मरहूम पिता हनीफ की दी हुई नसीहत बताते हैः "वे कहते थे कि बेटा, हम तो नहीं होंगे, जिंदगी तो आपको ही देखनी है.'' फिल्म और रंगमंच के क्षेत्र में शाहिद की कामयाबी से उनके वालिद की रूह को जरूर सुकून मिलेगा.

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