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करुणानिधि का जाना द्रविड़ राजनीति के एक युग अंत

द्रमुक के दिग्गज नेता मुतुवेल करुणानिधि के अवसान के साथ द्रविड़ राजनीति का एक युग बीता, अब देखना यह होगा कि उनकी समृद्ध विरासत को उनकी पार्टी उनके बिना कहां तक ले जा पाएगी?
करुणानिधि का जाना द्रविड़ राजनीति के एक युग अंत अंतिम विदाईः चेन्नै के राजाजी हॉल में करुणानिधि के पार्थिव शरीर के पास एम.के. स्टालिन
अमरनाथ के. मेननचेन्नै, 13 August 2018

मुतुवेल करुणानिधि अपनी जिंदगी की अंतिम यात्रा में भी द्रविड़ मुनेत्र कडगम (द्रमुक) के कार्यकर्ताओं और ओहदेदारों को यह सबक देकर गए कि अच्छी लड़ाई लडऩा ही सबसे महत्वपूर्ण है. उनके कट्टर समर्थक अस्पताल के बाहर जमा थे और तलैवा से एक बार फिर से उठ खड़े होने की मिन्नतें करते नारे लगा रहे थे—तलैवा ईजुनथू वा! ('तलैवा उठिए, यहां आइए!') पूरे तमिलनाडु में उनका कैडर द्रमुक का लाल-काला झंडा लहरा रहा था—संपत्ति कर को दोगुना करने के अखिल भारतीय अन्ना द्रमुक कडगम (अन्नाद्रमुक) सरकार के फैसले के खिलाफ प्रदर्शन कर रहा था.

इसी बीच एक और नाटकीय मोड़ तब आया जब अन्नाद्रमुक सरकार ने चेन्नै के मरीना बीच पर तलैवा के पार्थिव शरीर को उनके गुरु और पार्टी के संस्थापक सी.एन. अन्नादुरै (अन्ना) की समाधि के समीप दफनाने की इजाजत देने से इनकार कर दिया और द्रमुक को मद्रास हाइकोर्ट में फरियाद करनी पड़ी.

बतौर राजनैतिक कार्यकर्ता, करुणानिधि ने बड़े करीने से अपने करिश्माई व्यक्तित्व को गढ़ा था. महज 14 साल की उम्र में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में दिए अपने ओजस्वी भाषण के साथ ही राजनीति में उनके कदम पड़ गए थे और जल्द ही उन्होंने द्रविड़ आंदोलन की पहली छात्र शाखा तमिल मानवर मंडरम का गठन किया. उनकी अथक यात्रा और जमीनी स्तर पर किए काम के साथ-साथ उनकी वाक्पटुता और लेखन कौशल ने द्रमुक को एक बड़े संगठन के रूप में अपनी जड़ें जमाने में मदद की.

जैसा कि उनके गुरु और दिग्गज अन्ना ने लिखा था, ''जब वह सो रहा हो तो किसी को उसके दिमाग की जांच करनी चाहिए कि उसने कैसे इतनी बहु-आयामी क्षमताएं हासिल कीं. लेकिन कड़ी मेहनत के बिना प्रतिभा रंग नहीं लाती. बिना कड़ी मेहनत के कोई प्रतिभा न तो अर्जित की जा सकती है और न ही उसे हमेशा के लिए अपना बनाकर रखा जा सकता है.''

करुणानिधि के निधन के साथ ही तमिलनाडु की राजनीति से आजादी के बाद के नेतृत्व की पहली पीढ़ी और द्रविड़ राजनीति की सबसे प्रमुख आवाज, खासकर राज्य में 1956-67 के दौर का सबसे मुखर स्वर विदा हो गया. लगातार चुनाव जीतने वाले नेता की उनकी छवि ने उन्हें द्रमुक के निर्विवाद नेता के रूप में स्थापित किया. वे ऐसे दुर्लभ नेताओं में हैं (उनके अलावा केरल कांग्रेस (एम) के के.एम. मणि ही हैं) जिन्होंने 1957 से लेकर 2016 तक, लगातार 13 बार राज्य विधानसभा का चुनाव जीता.

विधायक के रूप में इस असाधारण लंबे कार्यकाल के दौरान वे पांच बार राज्य के मुख्यमंत्री बने. मुख्यमंत्री के रूप में उनका पहला कार्यकाल 1969 में शुरू हुआ और 2011 में मुख्यमंत्री के रूप में उनका आखिरी कार्यकाल पूरा हुआ था. विलक्षण स्मरण शक्ति—उन्हें किसी बैठक की हर छोटी-बड़ी बात याद रहती थी—और प्रभावशाली प्रशासनिक कौशल से युक्त वे ऐसे शख्स थे जो राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर नेताओं, मतदाताओं और नौकरशाही की विभिन्न पीढिय़ों के साथ सरलता से जुड़ जाते थे.

उनके एक पूर्व सहयोगी और तमिलनाडु राज्य योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष प्रोफेसर एम. नागनाथन कहते हैं, ''यह लोकतांत्रिक राजनीति में उनके निर्विवाद व्यक्तित्व का एक सुखद बिंदु है. तमिलनाडु आज मानव विकास सूचकांक के मामले में देश के सबसे प्रमुख राज्यों में एक है, तो यह काफी हद तक अभिनव सामाजिक उत्थान और कल्याण कार्यक्रमों में उनके योगदान के कारण संभव हुआ है.

इसमें सभी बीपीएल परिवार कार्डधारकों को एक रुपए में एक किलो चावल, सभी स्कूली छात्रों के लिए दोपहर भोजन योजना में अंडे को शामिल करना और गरीबों की चिकित्सा और सर्जरी खर्च को पूरा करने के लिए कलैनार स्वास्थ्य बीमा योजना शामिल है.''

हाल ही में द द्रविडिय़न ईयर्सः पॉलिटिक्स ऐंड वेलफेयर इन तमिलनाडु के लेखक, सेवानिवृत्त केंद्रीय वित्त सचिव तथा इंस्टीट्यूट ऑफ साउथ एशियन स्टडीज, एनयूएस, सिंगापुर में सीनियर रिसर्च फेलो एस. नारायणन याद करते हैं, ''करुणानिधि द्रविड़ कडगम के संस्थापक ई.वी. रामास्वामी (ईवीआर) के आत्म-सम्मान आंदोलन के केंद्र में थे और तमिलनाडु की सभी जातियों के लिए समान अवसरों में दृढ़ता से विश्वास करते थे.

द्रमुक शासन के पहले चरण के दौरान, 1967 और 1976 के बीच, ईवीआर के अधिकांश विचारों को लागू किया गया जिससे विभिन्न सामाजिक परिवर्तन दिखे. सामाजिक न्याय के उनके नारे ने एक बड़ा असर डाला. एमजी रामचंद्रन (एमजीआर) और जे. जयललिता जैसे बाद के द्रविड़ मुख्यमंत्रियों से कहीं ज्यादा करुणानिधि ने, शोषित वर्गों के लिए अवसर निर्माण किया.''

मुख्यमंत्री के रूप में अपने पांचों कार्यकाल के दौरान, उन्होंने ऐसे महत्वपूर्ण कार्यक्रमों की शुरुआत की जिन्हें बाद में कई अन्य राज्यों और केंद्र सरकार ने भी अपनाया. उन्होंने 'मनु निधि तित्तम' की शुरुआत की जिसके तहत जिले के अधिकारियों के लिए सप्ताह में एक दिन सार्वजनिक रूप से लोगों की शिकायतें सुनने और उनके तत्काल निवारण करने की परंपरा स्थापित हुई.

शिक्षा में सुधार—सामाजिक इंजीनियरिंग कार्यक्रमों के सफल कार्यान्वयन सहित समाज के सबसे वंचित वर्ग को शिक्षा और रोजगार में आरक्षण प्रदान करने—तथा राज्य में आधारभूत ढांचा तैयार करने के उनके प्रयासों की बदौलत तमिलनाडु ने द्रुत गति से विकास किया. तमिलनाडु अब व्यावहारिक आधारभूत सुविधाओं और संपर्क साधनों से लैस सर्वाधिक शहरीकृत राज्यों में एक है और यह देश के राज्यों के बीच सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं वाले प्रदेशों में से एक के रूप में उभरा है.

राज्यों के अधिकारों के हिमायती होने के नाते करुणानिधि राज्य की स्वायत्तता के हक में तनकर खड़े हुए और 1969 में उन्होंने केंद्र-राज्य रिश्तों की पड़ताल के लिए न्यायमूर्ति पी.वी. राजामन्नार आयोग की नियुक्ति कर दी.

1973 में द्रमुक ने राज्य स्वायत्तता प्रस्ताव पारित किया और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भेज दिया. राजामन्नार आयोग ने रास्ता दिखाया तो उसी तर्ज पर केंद्र-राज्य संबंधों पर 1983 में आर.एस. सरकारिया आयोग और 2007 में पुंछी आयोग बना. करुणानिधि ने राज्यों के लिए ज्यादा अधिकारों की मांग करने वाली संघीय ढांचे की आवाज का उभार पहले ही देख लिया था, जिसकी हिमायत अब पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, पंजाब, केरल और नई दिल्ली के मुख्यमंत्री कर रहे हैं.

राजनैतिक विश्लेषक एन. सातिया मूर्ति कहते हैं, ''द्रमुक के मुख्यमंत्री के तौर पर अन्नादुरै के छोटे-से कार्यकाल (1967-69) के बाद करुणानिधि ने ही राज्य का सियासी एजेंडा तय किया और प्रतिद्वंद्वी अन्नाद्रमुक तो ज्यादातर उसका जवाब भर देती रही.''

वे यह भी कहते हैं, ''राजकाज में उन्हें अब भी फैसले लेने में स्पष्टता और साहसी विचारों के लिए याद किया जाता है, जो अन्नाद्रमुक के उनके प्रतिस्पर्धियों एमजीआर और जयललिता के मुकाबले कहीं ज्यादा थी.''

अपने खास हुनर के लिए कलैनार या कला के पारखी के तौर पर नवाजे गए करुणानिधि कमाल के लेखक और वक्ता थे. अपनी इस कला से उन्होंने बौद्धिकों, शिक्षाविदों और यहां तक कि सियासत और पत्रकारिता में अपने कटु आलोचकों को भी अपने साथ जोड़ा. लफ्जों में नया अर्थ पैदा कर देने वाला उनका अंदाज और हाजिरजवाबी गजब की थी. वे हर मंच पर विरोधियों को लाजवाब कर दिया  करते थे, चाहे वह विधानसभा हो या प्रेस कॉन्फ्रेंस या जन सभा.

द्रविड़ आंदोलन प्रगतिशील सामाजिक बदलाव के हक में खड़ा था. उसने जाति से जुड़े पूर्वाग्रहों, महिलाओं के शोषण और समाज में गहरी जड़ें जमाए बैठे अंधविश्वासों को खत्म करने में अहम भूमिका निभाई.

करुणानिधि ने गीतकार और पटकथा लेखक के तौर पर बहुत बड़ा योगदान दिया. अन्ना ने सियासत में दाखिल होने के बाद सिनेमा से उनके रिश्ते भले ही खत्म करवा दिए, पर करुणानिधि ने अपनी सबसे खुशगवार और कामयाब पारी तमिल सिनेमा में ही खेली.

बढ़ती उम्र, गिरती सेहत और चुनावी हालात के चलते वे धीरे-धीरे निर्लिप्त होते चले गए. ऐसे में यह लाजिमी ही था कि उनके बेटे एम.के. स्टालिन ने कार्यकारी अध्यक्ष के तौर पर पार्टी की अगुआई की. इस साल 27 जुलाई को द्रमुक ने जब अपने स्वर्ण जयंती साल में प्रवेश किया, तब भी करुणानिधि ही उसके अध्यक्ष थे. करुणानिधि और जयललिता के बाद के दौर में स्टालिन किसी भी प्रमुख द्रविड़ पार्टी के सबसे वरिष्ठ सियासी नेता हैं. मगर उन्हें अपने पिता की विराट विरासत पर खुद को साबित करना है.

बेशक करुणानिधि की आलोचना भी होती थी और इसमें पार्टी और परिवार का फर्क मिटा देने को लेकर आलोचना सबसे प्रमुख है. मद्रास यूनिवर्सिटी में राजनीति और लोक प्रशासन विभाग के प्रमुख प्रो. रामू मणिवन्नान कहते हैं, ''परिवार पार्टी की सियासत और भविष्य की धुरी बना रहेगा. नए गठजोड़ सत्ता हासिल करने और बनाए रखने के लिए किए जाएंगे.

स्टालिन दांव लगाने के लिए सबसे अच्छे घोड़े हैं. उन्हें पार्टी के अस्तबल में ही तैयार किया गया है. वे ज्यादा शालीन और कम दुस्साहसी हैं. उन्हें प्रशासन का भी अच्छा तजुर्बा हासिल है. उनके लिए बड़ा खतरा परिवार के भीतर से आएगा. अगर वे परिवार के भीतर की हलचलों को साध लेते हैं, तभी वे द्रमुक को भी साध पाएंगे.'' कुछ विश्लेषक सौतेली बहन एम. कनिमोई और भाई एम.के अलगिरी को संभावित चैलेंजर के तौर पर देख रहे हैं.

करुणानिधि अपने पीछे ऐसी पार्टी छोड़कर गए हैं जिसने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं. 1972 में एमजीआर के हाथों पार्टी टूटी और कई सिलसिलेवार चुनावी पराजयों का सामना किया. यह राज्य में सात साल से सत्ता से बाहर है, मगर आम धारणा यह है कि जयललिता और करुणानिधि के बाद अन्नाद्रमुक के मुकाबले द्रमुक कहीं ज्यादा मजबूत है.

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