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गनी: किसके लिए गनीमत?

अफगानिस्तान के अगले संभावित राष्ट्रपति के अशरफ गनी प्रति भारत को अपने चलताऊ रवैए से बचना होगा.
गनी: किसके लिए गनीमत?
प्रणब ढल सामंतनई दिल्ली, 21 July 2014

यह बात है दिसंबर, 2001 की, जब तालिबान के सफाए के बाद अफगानिस्तान के भविष्य पर विचार करने के लिए बॉन में एक बैठक संपन्न हुई थी. फ्रैंकफर्ट हवाई अड्डे से लौट रहे भारतीय प्रतिनिधि मंडल के पास तेज कदमों से चलता हुआ एक शख्स पहुंचा. यह अफगानिस्तान के नृशास्त्री अशरफ गनी थे, जिन्हें संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत का सहयोग करने के लिए वहां भेजा गया था.

दानदाताओं के सम्मेलन में भले ही अफगानिस्तान को करोड़ों डॉलर के सहयोग का वादा किया गया था, लेकिन गनी इस बात को लेकर घबराए हुए थे. उनकी चिंता बहुत बुनियादी थी. अभी तो सिर्फ वादे किए गए हैं, नकदी नदारद है, जबकि अफगानिस्तान की संक्रमणकालीन सरकार को तत्काल पैसों की जरूरत थी. उन्होंने पूछा, ''क्या भारत शुरुआती तौर पर 1 करोड़ डॉलर की मदद दे सकता है?” उस दिन गनी अपनी बात समझ पाने में कामयाब रहे थे. भारत ने उनकी बात मानी और यह राशि काबुल पहुंच गई.

गनी आज अफगानिस्तान में राष्ट्रपति चुनाव जीतने के मुहाने पर खड़े हैं. वे दस लाख वोटों से आगे चल रहे हैं. इस बढ़त पर विवाद है. हालांकि भारत चुनाव के नतीजों को लेकर अब भी आशंकित है. राष्ट्रपति चुनाव की दौड़ में एक बात बिल्कुल साफ थी कि भारत गनी पर नहीं, अब्दुल्ला अब्दुल्ला पर अपना दांव खेल रहा था.

ऐसा नहीं कि गनी के साथ भारतीय मध्यस्थों के संबंध अच्छे नहीं, लेकिन भारत के साथ अब्दुल्ला के रिश्ते उस पर भारी पड़ते हैं. अब्दुल्ला का परिवार बरसों भारत में रहा है. उनके बच्चों की पढ़ाई-लिखाई यहीं हुई है और अहमद शाह मसूद के नेतृत्व वाले पुराने नॉर्दर्न अलायंस का वे अनिवार्य हिस्सा रहे हैं.

दूसरी ओर गनी पश्चिम की पैदाइश हैं. उन्होंने बेरूत में अमेरिकन यूनिवर्सिटी और कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की और बाद में विश्व बैंक में नौकरी करने से पहले बर्कले और जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी में पढ़ाया. विश्व बैंक की परियोजनाओं की निगरानी करने के सिलसिले में उन्होंने कुछ वक्त कर्नाटक में बिताया था. कहा जाता है कि उस दौरान भारत के कृषि संबंधी इतिहास और भूमि सुधारों में उनकी गंभीर दिलचस्पी थी.

बाद में वे अफगानिस्तान के वित्त मंत्री बने और काबुल यूनिवर्सिटी के चांसलर भी. अब्दुल्ला की तरह उन्होंने भी 2009 का चुनाव लड़ा था और चौथे स्थान पर रहे. हाल ही में संक्रमणकालीन अफगानिस्तान में वे प्रमुख मध्यस्थ के रूप में चर्चा में आए, जिसके बाद वहां से नैटो बलों की वापसी का रास्ता खुला.

उनके संदर्भ में भारत की चिंताएं दोतरफा हैं. पहली चिंता जनादेश के खंडित होने की है, जहां पख्तून और ताजिक के बीच खतरनाक ध्रुवीकरण हो रहा है. यह परिदृश्य धार्मिक कट्टरवाद और तालिबान समर्थक ताकतों के उभार के लिए बिल्कुल अनुकूल है. दूसरे, पाकिस्तान को लेकर गनी का नजरिया पश्चिमी उदारवाद से प्रेरित है. वे मानते हैं कि भारत और पाकिस्तान को अफगानिस्तान के हित में अपने आपसी मसलों को सुलझा लेना चाहिए.

यह अपने आप में एक अच्छा विचार हो सकता है, लेकिन काबुल के लिए नीतिगत तौर पर यह दोनों देशों से समान दूरी बनाए रखने का नुस्खा भी है. भारतीय अधिकारियों के साथ बंद दरवाजों में हुई बैठकों में वे अपने ये विचार रख चुके हैं.

भारत को डर है कि पाकिस्तान के संदर्भ में गनी अफगानिस्तान की नीति को और लचीला बनाएंगे ताकि तालिबान को नियंत्रण में रखने के लिए उन्हें पाकिस्तान का सहयोग मिल सके. तालिबान पाकिस्तानी संरक्षण के तले ही वहां अब तक आतंक फैला रहे हैं. इसके बदले पाकिस्तान चाहेगा कि अफगानिस्तान अपने यहां भारत की मौजूदगी और असर को कम करे.

चूंकि गनी वैसे किसी भारत विरोधी मानसिकता से ग्रस्त नहीं हैं, लिहाजा उन्हें इस मोर्चे पर कड़े फैसले लेने होंगे. वास्तव में निवर्तमान राष्ट्रपति हामिद करजई का रुख पाकिस्तान के साथ कुछ समय तक समझौतावादी था. लेकिन जब उन्हें एहसास हुआ कि अफगान नीति इस्लामाबाद के हाथों में नहीं है तो उन्होंने अपना रुख बदल लिया.

अभी हाल ही में जब पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने आतंकियों से लडऩे के लिए करजई से सहयोग मांगा तो उन्होंने सहयोग के लिए कुछ शर्तें रखकर पाकिस्तान को चौंका दिया. शर्तें कुछ इस प्रकार थीं: सभी आतंकियों को बिना किसी भेदभाव के निशाना बनाया जाएगा; अफगानिस्तान में अमन के समर्थक अफगानी तालिबान नेताओं को रिहा किया जाएगा.

और अफगानिस्तान और पाकिस्तान को भारत व चीन के साथ मिलकर अपने आतंकवाद विरोधी प्रयासों को समन्वित करना होगा. गनी राष्ट्रपति चुने गए तो बेशक पाकिस्तान को इतने कड़े शब्दों में लिखे गए पत्र की उम्मीद तो नहीं होगी. लेकिन भारत को इस तरह की किसी भी स्थिति के लिए तैयार रहना होगा.

फिलहाल सबसे बड़ी कूटनीतिक चुनौती यह है कि इतनी गहरी सियासी खाई को पाटने के लिए प्रयास किए जाएं. चुनावी प्रक्रिया को लेकर कुछ सवाल जरूर हैं, जो आने वाले एकाध हफ्ते में निपट जाएंगे. लेकिन उसके बाद शांति होनी चाहिए.

गनी के लिए यह बात खास इसलिए होगी क्योंकि वे खुद पख्तून हैं और उन्हें ताजिकों को सत्ता में हिस्सेदारी देने की दिशा में पहल करनी है. चूंकि अफगान नेशनल आर्मी में ज्यादातर ताजिक हैं, लिहाजा किसी ताजिक को रक्षा मंत्री का पद देने का एक विकल्प तो बनता है. जानकारों की राय में, अच्छी बात यह है कि गनी फ्रैंकफर्ट हवाई अड्डे वाली घटना अब तक भूले नहीं हैं.              

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