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ताहिरुल कादरी: इमाम को सियासत का चस्का

ताहिरुल कादरी की वापसी से इन अटकलों को बल मिल रहा है कि आंदोलन में पाकिस्तानी फौज उनके पीछे है.

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साजिद खान 15 September 2014
ताहिरुल कादरी: इमाम को सियासत का चस्का

कई दशक पहले लाहौर के मॉडल टाउन में शरीफ के परिवार की बनवाई मस्जिद में वे इमाम थे. आज इमरान खान के साथ मिलकर ताहिरुल कादरी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का तख्ता पलट करने की मुहिम चला रहे हैं.

एक इमाम और इस्लामी स्कॉलर से हाशिए में पड़े राजनैतिक और अब अपने राजनैतिक एजेंडे को लोगों के सामने रखने के लिए हजारों लोगों को जुटाने की क्षमता रखने वाले करिश्माई नेता बनने में उनकी हाजिरजवाबी और धर्मोपदेश देने में महारत हासिल होने की भूमिका महत्वपूर्ण रही है. पाकिस्तानी मूल के कनाडावासी मौलवी अपनी चिर-परिचित पोशाक, सफेद पगड़ी और लंबे लहराते चोगे में इस्लाम की सूफी शाखा के प्रचार के लिए दुनियाभर में घूमते हैं.

प्रचार वे 1981 में स्थापित अपनी संस्था, मिनहाज-उल-कुरान इंटरनेशनल के झंडे तले करते हैं. यह एक शैक्षिक और चैरिटी नेटवर्क है, जिसकी 80 देशों में शाखाएं हैं. बाद में कादरी ने राजनीति में उतरने का फैसला किया और पाकिस्तान अवामी तहरीक या पीपल्स मूवमेंट की स्थापना की. 2002 में परवेज मुशर्रफ के शासन के दौरान उन्होंने पहली बार चुनाव जीता लेकिन जल्द ही इस्तीफा दे दिया.

अब वे एक जेहादी नेता के रूप में उभरे हैं जो पाकिस्तान की वर्तमान व्यवस्था को उखाड़ फेंकना चाहता है. पाकिस्तान में ‘‘क्रांति लाने के आह्वान पर हजारों की संख्या में लोगों को जमा करने वाले कादरी कहते हैं, ‘‘यह कैसी जम्हूरियत है, जिसमें अमीर और अमीर तथा गरीब और गरीब होता जा रहा है?’’

इमरान खान के साथ 63 वर्षीय मौलवी का नवाज शरीफ सरकार गिराने का यह पहला प्रयास नहीं है. कनाडा में सात साल तक रहने के बाद वर्ष 2012 में वे अचानक पाकिस्तान आए और अपने समर्थकों के साथ इस्लामाबाद के व्यावसायिक इलाके का कई दिन तक घेराव किया. उनके समर्थकों में अधिकतर निम्न मध्यम वर्ग से थे. ये घेरा डालने वाले चुनावी सुधार की मांग कर रहे थे. कादरी इस आंदोलन के दौरान भी अपने आक्रामक तेवरों और भीड़ को उत्साहित करने की अदा के कारण सुर्खियों में आ गए थे.

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