एडवांस्ड सर्च

नजरियाः साक्ष्यों पर सवाल

जहां मुसलमानों को तीन सदियों के प्रमाण देने को कहा गया, वहीं हिंदुओं की 'आस्था' और 'स्वाग्रह' को दर्शाने वाले मामूली साक्ष्यों को ही उनके हक में फैसले के लिए पर्याप्त मान लिया गया.

Advertisement
aajtak.in
फैजान मुस्तफा/ ऐमन मोहम्मदनई दिल्ली, 19 November 2019
नजरियाः साक्ष्यों पर सवाल इलस्ट्रेशनः तन्मय चक्रवर्ती

वादियों और प्रतिवादियों को किसी विवादित दावे में अपना अधिकार साबित करने के लिए दावे के समर्थन में कुछ ठोस साक्ष्य पेश करने की आवश्यकता होती है. अयोध्या मामले में आया फैसला (2019) कानून के इस सामान्य सिद्धांत से भटकाव की ओर इशारा करता है. विवादित संपत्ति पर मालिकाना हक तय करने के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि रामलला विराजमान का अधिकार न केवल मंदिर के बाहरी हिस्से (बाबरी मस्जिद के साथ ध्वस्त राम चबूतरा) पर होगा बल्कि भीतरी प्रांगण पर भी होगा जहां तीन गुंबद वाली आलीशान मस्जिद कई सदियों तक खड़ी थी.

विवाद की शुरुआत अंग्रेजी राज के दौर में हुई जब महंत रघुबर दास की अगुआई में मस्जिद के बाहरी अहाते में चबूतरे का निर्माण कर दिया गया. 1886-87 में, तीन अलग-अलग न्यायिक फोरम ने उस भूमि पर महंत के कानूनी दावों को खारिज कर दिया और यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया. 188 6 और 1949 के बीच, हिंदू बाहरी प्रांगण (राम चबूतरा) पर और मुस्लिम मस्जिद के अंदर प्रार्थना करते रहे. 22-23 दिसंबर, 1949 की रात, मूर्तियों को बहुत गोपनीय तरीके से मस्जिद के भीतरी हिस्से में रख दिया गया जिसे 6 दिसंबर, 1992 को ध्वस्त कर दिया गया. 

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में माना है-और दृढ़तापूर्वक दोहराया है—1949 में रामलला की मूर्तियों की स्थापना और मस्जिद विध्वंस, दोनों ही अवैध थे और यह शीर्ष अदालत के आदेशों का उल्लंघन है. इसमें यह भी कहा गया है कि एएसआइ की रिपोर्ट यह साबित नहीं करती कि बाबरी मस्जिद के निर्माण के लिए राम मंदिर को ध्वस्त किया गया था—मस्जिद के काले पत्थर के खंभे खुदाई में मिले स्तंभों के नहीं थे. फिर भी इसने जमीन के मालिकाना हक का फैसला उस रामलला के पक्ष में दिया, जो बहुत हाल में (1989) एक पक्षकार बना था. 

ऐसा ही कुछ कब्जे के साक्ष्य के सवाल को लेकर दिखा. सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि मुस्लिम पक्ष इस बात के पर्याप्त सबूत नहीं पेश कर सका कि मस्जिद मुसलमानों के ही 'एक्सक्लूसिव' कब्जे में रही थी. फैसले के मुताबिक, मुस्लिम इस बात के पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत करने में भी असमर्थ रहे कि मस्जिद निर्माण (1528 में) से लेकर 1857 तक 'निरंतर' उनके कब्जे में ही रही. जहां फैसले में यह बात लिखी गई है उसी समय, यह भी स्वीकार किया गया है कि बैरागियों के हाथों उत्पीडऩ के बावजूद, मस्जिद में चुपके से मूर्ति को लाकर रखने की घटना के एक हफ्ते बाद यानी 29 दिसंबर, 1949 को जब इसमें ताला जड़ा गया, मुसलमानों ने नमाज जारी रखी. इसके बाद कोर्ट से यथास्थिति बनाए रखने के आदेश के साथ रिसीवर की नियुक्ति हुई.

1528 और 1857 के बीच मस्जिद के निरंतर उपयोग को प्रदर्शित करने के लिए जो प्रमाण चाहिए थे वे भी एक मानक के अनुरूप होने की मांग करते हैं. साथ ही, इसके विपरीत कोई स्पष्ट सबूत नहीं हैं जो दर्शाते हों कि मस्जिद में इबादत कभी बाधित हुई थी. इसके विपरीत, हिंदू दावे का प्रमाण बस इतना था कि ''हिंदू केंद्रीय गुंबद के नीचे प्रार्थना करने के अपने अधिकार की मांग लगातार करते रहे हैं.'' 

ऐसी स्थिति की कल्पना मुश्किल है, जहां अतिक्रमण और कब्जे के गैरकानूनी कृत्यों की व्याख्या एक कानूनी अधिकार के प्रमाण के रूप में की जाती है. फैसला बाबरी मस्जिद की संपत्ति पर चबूतरे के निर्माण का उल्लेख करता है; 23 दिसंबर, 1949 को मस्जिद पर ताला लगाए जाने; और मंदिर के रूप में इसका रूपांतरण करके मुसलमानों के अधिकार के हनन का भी हवाला देता है. हालांकि, इनमें से प्रत्येक कार्य अवैध था और एक अवैधता आस्था या मालिकाना हक का सबूत नहीं हो सकती.

बाबर के 60 रुपए के अनुदान और उसके सेनानायक मीर बाकी, जिसे मस्जिद के निर्माण का श्रेय दिया जाता है, की मस्जिद के मुतवल्ली (ट्रस्टी) के रूप में नियुक्ति को दर्ज किया गया है, अविश्वसनीय बात यह कि स्थानीय पुलिस ने हिंदुओं को मुगलों के शासनकाल में मस्जिद के अंदर पूजा करने की अनुमति दी होगी. 

बाद के मुगल शासकों के दौर में शक्तिशाली मुस्लिम नवाबों ने अवध पर शासन किया और अयोध्या से महज 8 किमी दूर स्थित फैजाबाद 1722 से उनकी राजधानी रहा. यह बात गले नहीं उतरती कि उस दौर में भी मुसलमानों के पास एक ऐतिहासिक और प्रमुख मस्जिद में इबादत का एकाधिकार नहीं रहा होगा. इसके अलावा, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी इसे कोई मुद्दा नहीं बनाया था और न ही किसी पक्ष के पास इस बात का कोई प्रमाण मौजूद है जो साबित करता हो कि इन तीन शताब्दियों के दौरान मुसलमान इस मस्जिद का निरंतर उपयोग नहीं कर रहे थे.

जहां कहीं भी मस्जिद होती है, वहां यही अनुमान लगाया जाता है कि मुसलमान इसका उपयोग इबादत के लिए करते हैं. ऐसे फैसले की कल्पना भी मुश्किल है जहां 'मालिकाना हक' के केस में 'आस्था के सबूत' की जीत हो. किसी भी तरह अगर सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि मस्जिद का विध्वंस अवैध था और मुस्लिमों को वास्तव में मस्जिद से खदेड़ा और वंचित किया गया था, तो फिर से उन्हें कैसे एक बार वंचित किया जा सकता है? सर्वोच्च न्यायालय पौराणिक कथाओं या आस्था या इतिहास पर निर्णय नहीं दे सकता. यहां तक कि अदालत अपने फैसले में इस बात को स्वीकार भी करती है लेकिन फिर भी ठीक यही काम भी करती है.

(लेखक फैजान मुस्तफा हैदराबाद की एनएएलएसएआर यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ, के कुलपति और आयमान मोहम्मद एनएएलएसएआर के शोधार्थी हैं)

***

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay