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आतंकवाद का खात्मा करो लेकिन धार्मिक भेदभाव के खिलाफ लड़ाई भी जारी रहनी चाहिए

आतंकवाद का खात्मा करो लेकिन धार्मिक भेदभाव के खिलाफ लड़ाई भी जारी रहनी चाहिए.

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जावेद आनंदनई दिल्ली, 18 August 2014
आतंकवाद का खात्मा करो लेकिन धार्मिक भेदभाव के खिलाफ लड़ाई भी जारी रहनी चाहिए

हममें से अधिकतर यह भूल चुके हैं कि यूपीए सरकार में वित्त मंत्री रहते हुए पी. चिदंबरम को 2008 के मुंबई हमले के बाद केंद्रीय गृह मंत्री का कार्यभार भी दिया गया था. आंतरिक सुरक्षा का प्रभारी होने के नाते उन्होंने कुछ ऐसा नहीं किया जिसे याद रखा जाए लेकिन यह भी जरूरी है कि गृह मंत्रालय संभालने के तुरंत बाद पी. चिदंबरम ने जो कहा था वह हम न भूलें: हम आतंक का मुकाबला तब तक नहीं कर सकते जब तक उतनी ही शिद्दत से सांप्रदायिकता से नहीं लड़ते.

शायद हमें उनका एक काम याद रखना चाहिए: उनके मंत्रालय में मुस्लिम अफसर बड़े पदों पर थे. ऐसा कर वे दिखाना चाहते थे कि मुसलमानों पर भरोसा करो.

अगर आज हम यह भूल रहे हैं तो इसकी कई वजह हैं. एक ओर संघ परिवार समर्थित बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार सत्तारूढ़ है तो 'एक हिंदू राष्ट्रवादी’ सर्वोच्च पद पर आसीन है. शायद इसीलिए हिंदुत्ववाद के प्रस्फुटन के संकेत नजर आने लगे हैं. भारतीय मुसलमानों और ईसाइयों के लिए तो इसे शुभ संकेत नहीं कहा जा सकता.

दूसरी ओर लगता है कि अब हमें सिर्फ पाकिस्तान की आइएसआइ और इसके समर्थन से चलने वाले दूसरे आतंकी गुटों से ही नहीं बल्कि आइएसआइएस (इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक ऐंड सीरिया) से भी डर है जिसने हाल ही में इराक और सीरिया के काफी हिस्से पर कब्जा कर लिया है. आइएसआइएस का नया नाम आइएस (इस्लामिक स्टेट) रखा गया है, इस गुट का नेतृत्व अबू बकर अल-बगदादी नाम का शख्स कर रहा है. इसने महीनेभर पहले खुद को दुनिया भर के मुसलमानों का खलीफा घोषित कर दिया है.

बीजेपी शासित गुजरात में स्कूलों में बच्चों को पढ़ाया जाता है कि आज का भारत पहले के अखंड भारत का संक्षिप्त रूप है, जिसकी सीमा में पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल, भूटान, तिब्बत, बांग्लादेश, श्रीलंका और बर्मा जैसे पड़ोसी देश शामिल थे. अल-बगदादी ने भी अपना नक्शा तैयार रखा है; भारत के कई हिस्से उसकी 'खिलाफत’ का हिस्सा हैं.

दुनियाभर के मुसलमानों ने अल-बगदादी के दावे को खारिज कर दिया है. यहां तक कि बगदादी का 'इस्लाम’ अल-कायदा के भी गले नहीं उतर पा रहा. लेकिन महाराष्ट्र से चार युवा मुस्लिम प्रोफेशनल और तमिलनाडु तथा केरल से भी कई मुस्लिम युवा खिलाफत का सपना पूरा करने के लिए जेहादियों से हाथ मिलाने इराक जा चुके हैं.

उत्तर प्रदेश के 'अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त इस्लामिक विद्वान’ मौलाना सलमान-अल-हुसैनी नदवी ने अल-बगदादी से निकटता की बात मान ली है.

यह कोई नई बात नहीं है. 1990 के दशक से ही सिमी (स्टुडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया) घोषित करता रहा है कि भारतीय मुसलमानों के सामने हथियारबंद जेहाद और शहादत के अलावा नई खिलाफत (इस्लामी राज्य और शरीयत कानून) के लिए कोई रास्ता नहीं है.

अब तक यह तर्क दिया जा सकता था कि मुस्लिम उग्रवाद को हालांकि आइएसआइ की मदद हासिल है लेकिन इसकी वजह और जड़ भारत में ही हैं, यह इस समुदाय की उपेक्षा और प्रताडऩा, जिसमें कई बार प्रशासन की भी मिली-भगत रहती है, एक वजह है, 1992 का बाबरी मस्जिद प्रकरण, मुंबई में मुसलमानों की सुनियोजित हत्या, 2002 में गुजरात का नरसंहार... लेकिन इराक जाना क्या किसी पवित्र युद्ध का हिस्सा है?

30 जुलाई को दिल्ली हाइकोर्ट के एक जज के नेतृत्व में गैर-कानूनी गतिविधियां (निरोधक) पंचाट ने यूपीए-2 सरकार के पिछली फरवरी में सिमी पर और पांच साल तक प्रतिबंध लगाने के फैसले को सही ठहराया. प्रतिबंध पर विस्तार के पंचाट के फैसले का स्वागत तो एनडीए सरकार ने किया लेकिन वह इसके एक महत्वपूर्ण सुझाव की जरूर उपेक्षा करेगी—वह है, ऐसे पंचाट का गठन जो ''सिर्फ संदेह के आधार पर दर्ज मामलों की समीक्षा कर तुरंत यह आश्वस्ति करे कि सिर्फ दोषियों को ही सजा मिले और बेकसूरों को रिहा कर दिया जाए.”

16 मई को सुप्रीम कोर्ट की एक खंडपीठ ने सभी छह अभियुक्तों को बरी कर दिया. इनमें से तीन को गुजरात के अक्षरधाम मंदिर में 2002 में आतंकी हमले के लिए मौत की सजा सुनाई गई थी. यही नहीं, फैसले में जांच एजेंसी को गैर-जिम्मेदाराना तरीके से जांच करने और गुजरात सरकार को पोटा (अब निरस्त हो चुका) लागू करने से पहले अपने विवेक का इस्तेमाल न करने के लिए भी फटकारा. बेकसूर मुसलमानों को फंसाने और जांच एजेंसियों की पक्षपातपूर्ण जांच के बाद सजा देने और अंतत: अदालत से बरी होने के कई उदाहरण हैं.

सितंबर, 2001 में एनडीए सरकार ने सिमी पर जो प्रतिबंध लगाया था, उसे यूपीए सरकार भी अपने 10 साल के शासनकाल में बढ़ाती रही. जबकि महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान सरकार ने बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाने की जो सिफारिशें कीं, उनकी सरकार उपेक्षा करती रही. इस तरह की कार्रवाई पक्षपात का भाव लाती है. जरूरी है कि सरकारें कार्रवाई में संतुलन बनाए रखें.

किसी भी तरह बेकसूरों पर निशाना साधने के औचित्य को साबित नहीं किया जा सकता. लेकिन पक्षपाती न्याय व्यवस्था, हिंदू और मुसलमान सांप्रदायिकता से निबटने के लिए दोहरे मापदंड, 'हमारे आतंकी’ और 'उनके आतंकियों’ में अंतर, पश्चिमी एशिया की घटनाओं के फलस्वरूप देश में बढ़ती शिया-सुन्नी दरार को भुनाने का प्रयास क्या आतंकवाद के दैत्य पर नियंत्रण के सही तरीके कहे जा सकते हैं? ऐसे प्रश्नों की उपेक्षा नेताओं और पुलिस के लिए तो ठीक हो सकती है, लेकिन देश के लिए निश्चित रूप से नहीं.

(लेखक कम्युनलिज्म कॉम्बेट के को-एडिटर और मुस्लिम फॉर सेक्युलर डेमोक्रेसी के जनरल सेक्रेटरी हैं)

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