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नजरियाः गुस्से में होश न खोएं

हैदराबाद की जिंदगी से भरपूर लड़की हत्यारे के हैवानों को कड़ी सजा दिलाना तो जायज मगर गुस्से में उन्हीं के स्तर पर उतर आने से तो अनजाने में ऐसी प्रवृत्तियों को ही मदद मिलती है

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aajtak.in
aajtak.in नई दिल्ली, 09 December 2019
नजरियाः गुस्से में होश न खोएं सुर्खियां: सुहैला अब्दुलअली

एक और घिनौनी घटना, लेकिन निरीह महिलाओं पर बर्बर हमला करने वाले हैवानों पर गुस्सा जताने भर से हमारी जिम्मेदारी पूरी नहीं होगी. आज समय आ गया है कि हम अपनी ऊर्जा एक सार्थक बदलाव, उपयुक्त न्याय और सच्ची करुणा पर केंद्रित करें.

जिंदगी से भरपूर एक लड़की, एक वेटरनरी डॉक्टर—बचपन में मैं भी वही बनना चाहती थी, वह प्यारी लड़की आज मर चुकी है, हैवानों ने उसका रेप किया और जलाकर मार डाला, और उसके अधजले मृत शरीर को नेशनल हाइवे 44 पर एक पुलिया के नीचे छोड़ गए.

केंद्रीय रक्षा मंत्री टीवी पर शोक जता रहे हैं; लोकसभा में काबिल सांसद हो-हल्ला मचा रहे हैं. जया बच्चन कह रही हैं, ''मुझे लगता है कि ऐसे लोगों को सरेआम खड़ा कर पत्थरों से मारकर खत्म कर देना चाहिए.'' ऐसी बातों से क्या होगा? मुझे लगता है कि इन शोर-शराबों में दरिंदगी की शिकार लड़की की कराह कहीं अंधे कुएं में दफन हो जाती है और कहीं न कहीं बलात्कारियों को ही फायदा पहुंचता है.

मेरे एक अच्छे दोस्त ने जैसे ही सुना कि मेरे साथ बलात्कार हुआ है और मैं घायल हूं, तो उसने कहा, ''मैं उन्हें ढूंढ निकालूंगा और जान से मार दूंगा.'' मुझे मालूम था कि वह मेरे दुख से बेचैन था, लेकिन एक और मर्दाना आवेग जो खूनखराबे की ओर बढऩा चाह रहा था, मेरी चोट को और सिहरा गया. दूसरी तरफ मेरे क्लास की लड़कियां मुझे डोसा खिलाने के नाम पर बाहर लेकर आईं और मुझसे पूरी घटना सुनी और मुझ पर भरोसा किया. उस समय मेरी भावनात्मक जरूरत इतनी ही थी. उन बलात्कारियों को जान से मार देने वाला मर्दाना आवेश मुझे आश्वस्त नहीं कर सकता था.

क्या हमें एक युवती की जिंदगी खत्म कर देने वाली हैवानियत पर गुस्सा होना चाहिए? बिल्कुल हां. क्या हमारा दिल उसके ख्याल से बोझिल नहीं हो रहा कि आखिरी बार अपने स्कूटर पर सवार हो रही उस लड़की के मन में क्या चल रहा होगा, उसकी क्या योजनाएं रही होंगी, क्या उसे भूख लगी थी, या वह खुश थी, या किसी से बात करना चाह रही होगी; और इन सबके बीच अचानक उसकी सांसों को किसी ने कुचल दिया? क्या हमारा दायित्व नहीं कि उन अपराधियों को पकड़कर उन्हें सजा दिलाएं? बेशक हां.

मैं बता दूं कि मैं कोई शांति की मसीहा नहीं. मैं इनसानी न्याय की पक्षधर हूं. अगर किसी ने आपके किसी अपने को चोट पहुंचाई है और आपको बदला लेना है तो मेरे पास आइए, मैं आपकी मदद करूंगी. मुझे आप पर भरोसा हो सकता है, लेकिन मुझे सरकार पर भरोसा नहीं. आखिर हम कैसे विश्वास करें कि आज हमने उन्हें यह शक्ति दे दी और कल वे इसे आपके खिलाफ इस्तेमाल नहीं करेंगे?

***

हमें गुस्सा होना चाहिए. हमें जुलूस निकालना चाहिए, बेहतर कानून बनाने पर जोर देना चाहिए, न्याय की गुहार लगानी चाहिए. लेकिन हमारा गुस्सा हमें अंधा करने के बजाए हमें वास्तविकता का एहसास भी कराए कि बलात्कारी किसी राक्षसी दुनिया से आया जीव नहीं, जिसे पत्थरों से मार कर या फांसी के जरिए मौत दी जाए या नपुंसक बना दिया जाए. विडंबना यह है कि बलात्कारी हमारे आसपास ही हैं—हमारे मित्रों, रिश्तेदारों और सहकर्मियों में से ही एक.

दरअसल हम सभी इस घिनौनी प्रवृत्ति को पोषित करने में जाने-अनजाने कुछ न कुछ भूमिका निभा रहे हैं—जब हम हर चीज में अपने लड़कों को लड़कियों से ऊपर के दर्जे का एहसास कराते हैं; हर बार जब हम हैदराबाद पीडि़ता को 'लेडी डॉक्टर' कहते हैं, मानो वह 'आम' डॉक्टर से अलग कोई वजूद है; हर बार जब हम कुछ भी ऐसा कहते या करते हैं जिससे मर्दों को किसी के शरीर का अपमान करने की छूट मिलती है. हम हैवानियत का पोषण करने वाली इस संस्कृति के भागीदारों को पत्थरों से मारकर या फांसी देकर खत्म नहीं कर सकते—क्योंकि फिर कोई नहीं बचेगा.

मुझे उम्मीद है कि हैदराबाद के हत्यारों पर उचित कार्रवाई होगी और उन्हें कड़ी सजा मिलेगी. साथ ही, मुझे यह भी उम्मीद है कि हम उनके स्तर तक नीचे नहीं गिरेंगे और जैसे को तैसा का रास्ता नहीं चुनेंगे.

बाइबिल में दुख और शर्मिंदगी के संबंध में कहा गया है, ''मेरे दुख, कष्ट, जक्चम को याद रखो.'' हमें वेटरनरी डॉक्टर की तकलीफ याद रखनी होगी और सार्थक बदलाव, उचित न्याय और सच्ची करुणा पर ध्यान केंद्रित करना होगा.

वे अब भी संसद में हल्ला मचा रहे हैं. मुझे उम्मीद है कि वे घर जाकर अपने बच्चों को इज्जत करना सिखाएंगे. मुझे उम्मीद है कि वे और हम सब अपने गुस्से को उन घातक साधनों की ओर केंद्रित करने की कोशिश करेंगे जिन्हें हमने बड़ी उदारता से बलात्कारियों को सौंप दिया है—एक आपराधिक न्याय प्रणाली जो स्त्री विरोध और जातिवाद को बढ़ावा देती नजर आती है. हम एक झूठे सुरक्षा कवच में जीते हैं कि बलात्कारी और बलात्कार पीडि़त, दोनों कोई और हैं, हम जैसे नहीं.

सुहैला अब्दुलअली व्हाट वी टॉक एबाउट व्हेन वी टॉक एबाउट रेप की लेखिका हैं

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