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सचाई से तलाक?

तीन तलाक को दंडात्मक बनाने से यह अवैध तो हो ही गया और यह महिला संरक्षण और घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत आने वाले किसी भी अपराध से बड़ा अपराध भी हो जाएगा

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मालविका राजकोटियानई दिल्ली, 09 January 2018
सचाई से तलाक? मालविका राजकोटिया

शायरा बानो ने विकृत परंपराओं की जकडऩ से पर्सनल लॉ की मुक्ति के लिए सर्वोच्च अदालत में याचिका दायर की थी, ताकि तलाक-ए-बिद्दत (तुरंत तीन तलाक) को अवैध घोषित किया जाए. किसी भी विरोधी ने तीन तलाक पर ऐतराज नहीं किया, बल्कि उन्होंने 'मुस्लिम महिलाओं के हितों' के नाम पर की जा रही राजनीति की मंशा पर ऐतराज किया. उन्होंने तर्क दिया कि उसके आर्थिक अधिकारों की रक्षा उसे वैवाहिक संबंध से अलग होने की तुलना में कहीं अधिक सक्षम बनाएगी, क्योंकि ऐसा संबंध सिर्फ इस बिना पर टिका होगा कि पति ने लगातार तीन बार तलाक नहीं कहा. ऐसे विरोधियों को 'दासता समर्थक' और 'छद्म धर्मनिरपेक्ष' करार दिया गया.

अंततरू सर्वोच्च अदालत ने तलाक-ए-बिद्दत को अवैध करार देते हुए एक संतुलित फैसला दिया, जिसमें धार्मिक स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखा गया और साथ ही रूढिय़ों से जुड़ी विकृतियों को कतर दिया गया.

अब सरकार ने 'दासता समर्थकों' की चिंता को दरकिनार करते हुए संसद में एक विधेयक रखा है, जो न केवल सर्वोच्च अदालत के फैसले को दोहराता है, बल्कि इसमें तीन तलाक को अपराध घोषित किया गया है. विधेयक के उद्देश्य और कारण से संबंधित बयान भ्रमित करने वाला हैः इसमें दावा किया गया है कि फैसले ने सरकार के पक्ष की पुष्टि की है. किसी भी विधेयक को किसी ऐसे दावे की जरूरत नहीं होती, यह सिर्फ दुष्प्रचार है, यह इस विधेयक का उद्देश्य नहीं है.

बयान में दावा किया गया है कि सर्वोच्च अदालत का फैसला तीन तलाक को रोकने में नाकाम साबित हुआ है और यह अब भी चलन में है. इसलिए इसके उल्लंघन को दंडात्मक करने का प्रस्ताव किया गया.

ऐसे कोई आंकड़े या फिर ब्यौरे उपलब्ध नहीं हैं, जिससे पता चले कि इसे अपराध घोषित किए जाने से ऐसा कौन-सा उद्देश्य पूरा होगा जो इस फैसले के बाद कानूनी रूप से संभव नहीं है. यह विधेयक तथाकथित 'छद्म धर्मनिरपेक्षतावादियों' की इस आशंका को ही मजबूत करता है कि यह मुसलमान महिलाओं के बारे में नहीं है; पितृसत्तात्मक प्रारूप में यह विधेयक मुसलमान महिलाओं के मौजूदा अधिकार को ही कम करता है.

सबसे पहले, यह तीन तलाक को अवैध घोषित करता है (जो कि पहले से है), इसके बाद इसमें संबंधित महिला को पति से मामूली गुजारा भत्ता लेने का अधिकार है. इस तरह से यह विधेयक महिला के खर्च से संबंधित आर्थिक अधिकारों को सीमित करता है, जबकि यह अधिकार उसे महिला संरक्षण एवं घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 में प्राप्त है, जिसके जरिए उसे अपने वैवाहिक घर की तरह की जीवनशैली को पूरा करने के लिए उचित भत्ता मांगने का अधिकार प्राप्त है.

दूसरा, विधेयक में तलाक के बाद अवयस्क बच्चों को महिला के संरक्षण में रखने का प्रावधान है. यह प्रावधान धर्मनिरपेक्ष संरक्षण कानून में किए गए अभूतपूर्व परिवर्तन से मेल नहीं खाता. यह बाल संरक्षण सिद्धांत के कल्याण के अनुसार संरक्षण के मामलों पर संरक्षक अदालतों के क्षेत्राधिकारों का उल्लंघन करता है.

तीसरा, किसी व्यक्ति को जेल भेजने के साथ ही उसे मुआवजा देने का निर्देश अतिरिक्त रूप से उत्पीड़त करने जैसा है, क्योंकि यह एक ऐसा अपराध है जो तीन तलाक का उच्चारण करने से पहले हो ही नहीं सकता और उससे पहले उसका कोई कानूनी प्रभाव भी नहीं होता.

तीन बार तलाक कहने के 'अपराध' को उसी तरह माना जा रहा है, मानो यह पत्नी का निरंतर शारीरिक, मानसिक या यौन उत्पीडऩ हो, इसके अलावा इसमें भारतीय दंड विधान की धारा 498 ए के तहत तीन साल की अधिकतम सजा भी हो सकती है. इसके साथ ही, विधेयक में तीन तलाक को महिला संरक्षण और घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत आने वाले किसी भी अपराध की तुलना में बड़ा अपराध बना दिया गया है.

कानून के 'दुरुपयोग' के शोर-शराबे के बीच, मुस्लिम पुरुषों को निशाना बनाया जाना तब अच्छा लग सकता है, जब आप यह विचार करें कि किसी व्यक्ति को उसकी पत्नी के मौखिक बयान के आधार पर दोषी ठहराया जा सकता है कि उसने उसे तीन तलाक दे दिया है. बची खुची कसर केंद्र सरकार की हाल ही में की गई इस घोषणा ने पूरी कर दी कि अब महिलाएं भी बिना किसी पुरुष के हज पर जा सकेंगी. सरकार ने यह बताना जरूरी नहीं समझा कि यह व्यवस्था सऊदी अरब ने की है और भारत का इससे कोई लेना-देना नहीं है. इससे फर्क नहीं पड़ेगा कि यात्रा करने वाली महिलाएं भारत से हैं, और उन्हें किसी पुरुष के बिना सऊदी अरब में प्रवेश की इजाजत नहीं होगी.

मुद्दा यह है कि सरकार मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाना चाहती है और साथ ही यह भी दिखाना चाहती है कि वह समुदाय की महिलाओं की मसीहा है. क्या इस विधेयक का मसौदा तैयार करते समय वाकई मुसलमान महिलाओं से सलाह ली गई?

मालविका राजकोटिया वकील हैं और भारत में विवाह और तलाक कानून पर केंद्रित किताब इनटिमेसी अनडन की लेखिका हैं

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