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ट्रंप के कहे का आशय समझना होगा

अमेरिका-पाकिस्तान के बीच पुन: पनप रहे रिश्ते से जुड़ा है जिसकी बुनियाद अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी ने गढ़ी है. अमेरिका और तालिबान के बीच पाकिस्तान की मदद से कराई गई बातचीत में तालिबान की मुख्य मांग विदेशी सेना की वापसी पर केंद्रित थी.

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मंजीत ठाकुरनई दिल्ली, 07 August 2019
ट्रंप के कहे का आशय समझना होगा शरत सभरवाल

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस बयान से भारत के राजनैतिक गलियारे में तूफान खड़ा हो गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें कश्मीर मसले पर मध्यस्थता करने की पेशकश की थी. कथित पेशकश भारत की स्थिति के मद्देनजर इतनी अटपटी है कि कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि भारत के प्रधानमंत्री ऐसा कह सकते हैं. सरकार ने इसका जोरदार खंडन करते हुए भारत और पाकिस्तान के बीच सभी मुद्दों को संबोधित करने के लिए द्विपक्षीय संवाद की बात दोहराई है. मामला यहीं शांत हो जाना चाहिए. सरकार ने ट्रंप के शब्दों को सिरे से खारिज कर दिया है.

पहली बात, ट्रंप सोच-समझ कर बयान नहीं देते, फिर भी उनमें कोई न कोई संदर्भ छिपा होता है. विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि ट्रंप का मध्यस्थता संबंधी बयान पाकिस्तान को संतोष दिलाने का एक अंदाज भर है जो हाल के वर्षों में कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मंच तक खींचने की पुरजोर कोशिश में लगा है. यहां संदर्भ अमेरिका-पाकिस्तान के बीच पुन: पनप रहे रिश्ते से जुड़ा है जिसकी बुनियाद अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी ने गढ़ी है.

अमेरिका और तालिबान के बीच पाकिस्तान की मदद से कराई गई बातचीत में तालिबान की मुख्य मांग विदेशी सेना की वापसी पर केंद्रित थी और उसमें युद्ध विराम या भविष्य में अफगानिस्तान की सरकार (जिसे अमेरिका के हाथ की कठपुतली माना जाता है) के साथ सत्ता में साझेदारी संबंधी मुद्दे शामिल नहीं थे. सैन्य और खुफिया विभाग के प्रमुखों के साथ अपने अमेरिकी दौरे में इमरान खान ने वादा किया कि वे तालिबान से अफगान सरकार से बात करने का अनुरोध करेंगे. तालिबान अमेरिकी सेना वहां मौजूद रहने तक अपने कदम वापस लेने को तैयार नहीं.

उसकी मंशा सत्ता पर एकाधिकार हासिल करने की है जैसा कि 90 के दशक में था. लिहाजा अमेरिकी सेना के वापस होते ही नए सिरे से शक्ति संघर्ष उभरने की संभावना बन रही है. आशंका है कि अपनी अगली पारी की तैयारी में जुटे ट्रंप के अधीन समय सीमा में बंधा युद्ध से त्रस्त अमेरिका शायद अपना मान बचाने के लिए अफगानिस्तान को तालिबान और पाकिस्तान के भरोसे छोड़ दे, जो भारत और आसपास के क्षेत्र के लिए नुक्सानदेह हो सकता है. अफगानिस्तान के साथ हमारे गहरे और मजबूत रिश्तों के बावजूद हम पाकिस्तान की मध्यस्थता में किए जा रहे शांति प्रयासों के दर्शक मात्र बने रहेंगे.

दूसरी बात, अमेरिका और पाकिस्तान के बीच पनपता नया रिश्ता पाकिस्तान को अलग करने की हमारी नीति और हमारी इन उम्मीदों के विपरीत जाएगा कि अन्य देश भी उसका साथ नहीं देंगे. हम यह भूल जाते हैं कि दूसरे प्रभावशाली देश अपने हितों के लिए जीते हैं और अक्सर अपने एजेंडे को बढ़ावा देने के लिए भारत-पाकिस्तान विवाद का इस्तेमाल करते हैं. अमेरिका ने वित्तीय तौर पर कमजोर पाकिस्तान पर 2018 में सुरक्षा सहयोग से इनकार करके और फाइनेंशियल ऐक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) पर कड़ा रुख अख्तियार कर भारी दबाव बनाए रखा.

उसने पाकिस्तान के सभी आतंकवादी समूहों पर कड़ी कार्रवाई करने का रुख तो दिखाया, पर अपना मुख्य ध्यान अफगानिस्तान पर केंद्रित रखा. पाकिस्तान की खराब छवि के मद्देनजर आतंकी समूहों के खिलाफ  उसके हालिया कदम भी कोई खास विश्वास नहीं जगाते. हालांकि, जब हम उम्मीद कर रहे थे कि पाकिस्तान एफएटीएफ  की काली सूची में दर्ज किया जाएगा और उसकी आर्थिक स्थिति और बदतर हो जाएगी, तभी अमेरिका उसका भाग्यविधाता बन कर खड़ा हो गया. पाकिस्तान ऐसे ही जीवनदाताओं की मदद से हमारे खिलाफ अपने पंजे पैने करता आया है.

तीसरा, पाकिस्तान के साथ विवाद पर द्विपक्षीय हल की बात करने के बावजूद हम अक्सर किसी प्रभावशाली तीसरे पक्ष से मदद मांग बैठते हैं, जिसका सबसे हाल का उदाहरण बालाकोट के बाद दिखा. दुनिया में हमारी छवि पाकिस्तान से अलग बनी है, लेकिन हमने अनजाने में बहुपक्षीय मंचों पर पाकिस्तान के उग्र अल्फाज पर प्रतिक्रिया जताने, उसे करारा जवाब देने, आतंक के खिलाफ  बड़ा अभियान चलाने और उस पर लगाम कसने के लिए विश्व के प्रमुख देशों का समर्थन प्राप्त करने की दिशा में तेज प्रयास न करके गलती की है. विश्व के प्रभावशाली देश अपने सरोकारों से ऊपर उठकर किसी अन्य देश की समस्या का समाधान करने के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभाएं, यह एक जटिल प्रक्रिया है.  

अंत में, द्विपक्षीय समाधान का अर्थ है कि पाकिस्तान के साथ का विवाद हमें खुद सुलझाना होगा. हम जोर-जबरदस्ती से हल निकाल तो सकते हैं, लेकिन सबसे उलझे रिश्तों में भी कूटनीति की अपनी खास जगह होती है, बस उसे सही तरीके से इस्तेमाल करना आना चाहिए. कूटनीति में आवश्यकता पडऩे पर जोर-आजमाइश और दंडात्मक कार्रवाई की गुंजाइश भी होती है. जेल में बंद कुलभूषण जाधव जैसे मसले दबाव डालकर या अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में मामला दर्ज कराके हल नहीं किए जा सकते. अपनी नीति में द्विपक्षीय कूटनीति से परहेज कर हम खुद तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को न्योता देते हैं.

शरत सभरवाल पाकिस्तान में राजदूत रहे हैं. यहां व्यक्त विचार उनके अपने हैं.

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