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सुप्रीम कोर्ट को इस तरह नहीं चलने दिया जा सकताः आर.एम.लोढ़ा

चार जजों का आरोप है कि उनका यह तरीका सहज नहीं है. किसी को यह जिज्ञासा हो सकती है कि वे इसे कैसे साबित कर सकते हैं. लेकिन वास्तव में सार्वजनिक संस्थानों में किसी भी रूप में मनमानेपन की कोई जगह नहीं हो सकती.

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आर.एम. लोढ़ानई दिल्ली, 24 January 2018
सुप्रीम कोर्ट को इस तरह नहीं चलने दिया जा सकताः आर.एम.लोढ़ा आर.एम. लोढ़ा

मौजूदा विवाद ने सर्वोच्च अदालत, चीफ जस्टिस (सीजेआइ) और कॉलेजियम की छवि को धूमिल किया है. इनमें भरोसा लौटने में अब काफी वक्त लगेगा.

हमारी राजनीतिक जमात तो कभी भी कॉलेजियम के विचार के साथ सहज नहीं रही है. लेकिन काफी लंबे समय बाद केंद्र में एक पूर्ण बहुमत वाली सरकार आई है. गठबंधन सरकारें तो कानून बनाने की इच्छा के बावजूद ऐसा करने का साहस नहीं कर पातीं.

इस बार सरकार ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) लाने और संवैधानिक सुधार करने की कोशिश की है, लेकिन वे अटके पड़े हैं. मुझे संदेह है कि यह सरकार इस मामले में कुछ खास कर सकती है. वे नया कानून लाते हैं, तो इसे संविधान की कसौटी पर परखना होगा.

राजनीतिक रूप से संवेदनशील मसले हमेशा सुप्रीम कोर्ट के सामने जाते रहे हैं. हर चीफ जस्टिस के कार्यकाल में संवेदनशील मामले आते ही रहे हैं. मैंने तो मुकदमों को बेंचों को सौंपने के मामले में बहुत ही समानता की नीति अपनाई थीः इसे वरिष्ठता के आधार पर देने की. यह सबसे सुरक्षित और श्रेष्ठ तरीका होता है.  

ऐसा लगता है कि मौजूदा चीफ जस्टिस का लगातार एक तरीका रहा है. चार जजों का आरोप है कि उनका यह तरीका सहज नहीं है. किसी को यह जिज्ञासा हो सकती है कि वे इसे कैसे साबित कर सकते हैं. लेकिन वास्तव में सार्वजनिक संस्थानों में किसी भी रूप में मनमानेपन की कोई जगह नहीं हो सकती.

ऐसा नहीं कि आपके जो मर्जी में आए, करते रहें, आप वही कर सकते हैं जिसकी संविधान इजाजत देता है. जजों को लगता है कि कुछ निर्णयों में मनमानापन दिख रहा है, कुछ अनुचित लग रहे हैं, तो चीफ जस्टिस को इस कानूनी सिद्धांत को याद करना होगा कि धारणा न्याय के लिए सबसे महत्वपूर्ण होती है.

कोई भी संस्थान लोगों से बड़ा होता है. सुप्रीम कोर्ट को इस तरह नहीं चलने दिया जा सकता. न्याय के बारे में शिकायतें की जानी चाहिए और समाधान होना चाहिए, जब तक कि सभी पक्ष संतुष्ट न हो जाएं.

जो कुछ हुआ उसे अब भूल जाना होगा. मैं नहीं समझता कि यह कोई कठिन बात है. जब इस पर सार्वजनिक रूप से इतनी बहस हो रही है तो चीफ जस्टिस तक भी संदेश तो पहुंच ही गया होगा. इसका समाधान निकालना होगा और यह समाधान भीतर से ही आना चाहिए. इसमें देश कुछ नहीं कर सकता. यह सुप्रीम कोर्ट के दायरे की भीतर की बात है तो सुप्रीम कोर्ट में ही इसका समाधान निकलना चाहिए.

अब कोर्ट पहले की तरह काम करता रहेगा, क्योंकि न्यायिक पक्ष में कुछ नहीं हुआ है. लेकिन प्रशासनिक पक्ष में चोट गहरी है और इसे ठीक करना होगा. इसके लिए पहल चीफ जस्टिस की तरफ से ही होनी चाहिए. चीफ जस्टिस को समाधान के लिए बाकी जजों को बुलाना चाहिए.

विरोध करने वाले जजों ने अपने लेटर में किसी खास मसले का उल्लेख नहीं किया है, जबकि उन्हें चीफ जस्टिस को यह बताना चाहिए कि वे किन खास मसलों की बात कर रहे हैं. वे सभी बुद्धिमान लोग हैं, उन्होंने न्यायपालिका में 20 से 21 साल तक काम किया है. एक जज होने के नाते यह भी नहीं कहा जा सकता कि वे लचीले नहीं हैं. उनके अंदर निष्पक्षता भी है. उन्हें यह सोचना होगा कि सुप्रीम कोर्ट एक संस्थान है, व्यक्तिगत लड़ाई का अखाड़ा नहीं.

मुझे पूरी उम्मीद है कि सभी जज कुछ परस्पर सम्मानजनक समाधान लेकर आएंगे.

जस्टिस आर.एम.लोढ़ा पूर्व प्रधान न्यायाधीश हैं.

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