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मेहमान का पन्नाः झलकता धोखा

एफएटीएफ कोई न्यायिक निकाय नहीं है जो ठोस साक्ष्यों और पारदर्शी प्रक्रिया पर निर्भर हो. यह एक राजनैतिक इकाई है जो अतिसंवेदनशील विषयों पर भी लेन-देन को प्राथमिकता देती है.

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aajtak.in
अजय साहनीनई दिल्ली, 25 February 2020
मेहमान का पन्नाः झलकता धोखा अजय साहनी

अजय साहनी

पाकिस्तान ने प्रपंच कला में महारत हासिल कर ली है. दशकों से, जब भी पाकिस्तान पर असाधारण बाहरी दबाव आता है, दंडात्मक कार्रवाई से बचने के लिए वह तुरंत आतंकवाद-निरोध के मापदंडों का औपचारिक अनुपालन करने का स्वांग करने लगता है. पर इन सबके बीच उसने यह सुनिश्चित किया है कि अपने पड़ोस में और उससे परे क्षेत्रों में भी, आतंकवाद को शह देने की उसकी मूल क्षमता यथावत बनी रहे. 

यह इस तथ्य के बावजूद दशकों से जारी है कि प्रमुख शक्तियों के बीच सबसे अनिच्छुक राष्ट्रों ने भी पाकिस्तान को आतंकवाद की उद्भव भूमि और राज्य प्रायोजित आतंकवाद की जड़ के रूप में माना है. इस तथ्य के बावजूद कि इसके ही छद्म आतंकी संगठनों, जिनमें तालिबान और हक्कानी नेटवर्क प्रमुख हैं, ने अफगानिस्तान में अमेरिकी नेतृत्व वाली गठबंधन सेना के हजारों सैनिकों (साथ ही साथ दसियों हजार अफगानों) को निशाना बनाया और मार डाला.इस तथ्य के बावजूद कि अमेरिकी ड्रोन ने पाकिस्तानी धरती पर दर्जनों शीर्ष आतंकवादी नेताओं को ठिकाने लगाया है; इस तथ्य के बावजूद कि अमेरिका ने सैन्य छावनी वाले शहर एबटाबाद में पाकिस्तान के सबसे प्रतिष्ठित सैन्य संस्थानों में से एक से महज चंद फर्लांग की दूरी पर छुपकर रह रहे ओसामा बिन लादेन को खोजा और मार डाला; और इस तथ्य के बावजूद कि 9/11 के हमलों के षड्यंत्र में पाकिस्तानियों के शामिल होने के कई सबूत मिले थे. 

लेकिन पाकिस्तान के ये स्पष्ट धोखे, सबसे उल्लेखनीय पहलू नहीं हैं. असल में वह यह है कि उसके झूठ और गुमराह करने की हरकतों को उन्हीं संस्थानों और राष्ट्रों ने गले लगाया है जो उसे इन सबका जिम्मेदार बताते आए हैं. 

हाफिज मोहम्मद सईद को मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों में दोषी ठहराने और अजहर मसूद के 'लापता' होने की खबरों को इसी संदर्भ में देखने की जरूरत है. सईद के मामले पर हाइकोर्ट में अपील होगी और पहले की तरह ही कई तरह के प्रपंच के बाद उसे दोषमुक्त करार दिया जाएगा. वे हास्यास्पद बहाने होंगे जो केवल उन्हें समझाने के लिए गढ़े जाएंगे जो पाकिस्तान के फर्जीवाड़ों से आश्वस्त होने को बेताब बैठे हैं.

आतंकवाद-निरोधी अदालत ने सईद की सजा संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस की पाकिस्तान की यात्रा से कुछ दिन पहले और पेरिस में फाइनेंशियल ऐक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की बैठक से पहले सुनाई जहां 'ग्रे लिस्ट' में पाकिस्तान की स्थिति की समीक्षा होनी थी. इस्लामाबाद में गुटेरेस ने 'अफगान शरणार्थियों की मेजबानी' और उनके साथ 'एकजुटता और करुणा' दर्शाने के लिए पाकिस्तान की तारीफ की, पर पाकिस्तानी आतंकवादी शिविरों में इन शरणार्थियों को हथियार थमाने, या फिर तालिबान और हक्कानी नेटवर्क को पाकिस्तान का समर्थन जारी रखने का कोई जिक्र नहीं किया. कश्मीर पर अनावश्यक रूप से मध्यस्थता की पेशकश करते हुए, उन्होंने पाकिस्तान की ओर से भारत में आतंकवाद को शह देने जैसे मुद्दे का उल्लेख करना तक जरूरी नहीं समझा.एक मामूली शर्त को छोड़कर सभी प्रमुख शर्तों का पालन करने में नाकाम रहने के बावजूद एफएटीएफ पाकिस्तान को ब्लैक लिस्ट में डालने से हिचकता रहा है. अक्तूबर, 2019 में, एशिया पैसिफिक ग्रुप (एपीजी) ने पाकिस्तान पर अपनी 'म्युचुअल इवैल्यूएशन रिपोर्ट' में कहा था कि पाकिस्तान ने एफएटीएफ की सिफारिशों में से सिर्फ एक (वित्तीय संस्थान गोपनीयता कानून) का पालन किया; नौ पर 'काफी हद तक अनुपालन'; 26 पर आंशिक 'अनुपालन'; और चार का 'कोई अनुपालन नहीं' किया.

एफएटीएफ की ब्लैक लिस्ट में जाना उसके लिए विनाशकारी होता. पर उसने मुख्य रूप से शर्तों के अनुपालन का दिखावा किया; बस यह सुनिश्चित करता रहा कि कैसे एफएटीएफ में मतदान अधिकार प्राप्त सदस्यों का समर्थन पाकर ब्लैक लिस्ट से बाहर रहना है.

एफएटीएफ कोई न्यायिक निकाय नहीं है जो ठोस साक्ष्यों और पारदर्शी प्रक्रिया पर निर्भर हो. यह एक राजनैतिक इकाई है जो अतिसंवेदनशील विषयों पर भी लेन-देन को प्राथमिकता देती है. छत्तीस सदस्य देश मतदान के अधिकार का उपयोग करते हैं, और सिर्फ तीन वोट पाकिस्तान को ब्लैकलिस्ट होने से बचा सकते हैं; चीन, मलेशिया और तुर्की पहले से ही सीना ठोककर उसका समर्थन करते आ रहे हैं. अगर वह आधे वोटिंग सदस्यों (या उससे भी कम, अगर यह पिछले दरवाजे से वोटिंग करने वाले सदस्यों को वोटिंग से अनुपस्थित रहने को राजी कर ले) का समर्थन पाने में सफल रहता है, तो वह ग्रे लिस्ट से भी बाहर जा सकता है. ऐसी अटकलें हैं कि चीन के पूर्ण समर्थन, कुछ पश्चिमी राष्ट्रों से सुनियोजित समर्थन, और कुछ शर्तों का प्रतीकात्मक अनुपालन करके पाकिस्तान ग्रे सूची से भी बाहर हो सकता है.

सईद के खिलाफ दिखावे की कार्रवाई या अजहर के 'गायब हो जाने' में जश्न मनाने जैसा कुछ भी नहीं है. ये दोनों भले ही पाकिस्तान में भारत-विरोधी आतंकवाद का सबसे स्पष्ट चेहरे हों, पर उनके पीछे नेताओं और आतंकी कैडर का एक मजबूत आधार है. लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों पर लगातार जोर दिया जा रहा है, पर असल में इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (आइएसआइ) ही ऐसी सभी सगंठनों को नियंत्रित करती है. ये संगठन उसके निर्देशों पर उठते, गिरते या एक नई पहचान के साथ उभरते हैं. जब तक कि पाकिस्तान की हुकूमत चलाने वाली संस्थाएं अपने पड़ोसी देशों के खिलाफ आतंकी उद्यमों को नहीं छोड़तीं, उस पर बड़े प्रतिबंध नहीं लगते, तब तक पाकिस्तान की ओर से आतंकवाद को शह देना बंद नहीं होगा. 

अजय साहनी इंस्टीट्यूट फॉर कॉन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट के कार्यकारी निदेशक और साउथ एशिया टेररिज्म पोर्टल तथा साउथ एशिया इंटेलिजेंस रिव्यू के संपादक हैं

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