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मेहमान का पन्नाः हमें और ज्यादा छोटा मत कीजिए

ताबिश लिखते हैं, ''मुझे लगता है कि अगर हम की वही व्याख्या करें जो इस्लामवादियों ने के बारे में की है तो पता नहीं, क्या होगा?''

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aajtak.in
ताबिश खैर 04 February 2020
मेहमान का पन्नाः हमें और ज्यादा छोटा मत कीजिए ताबिश खैर

ताबिश खैर

मैं 'मुस्लिम' पहचान को खारिज नहीं कर सकता क्योंकि मेरा जन्म इसी मजहब में हुआ था और इसने मुझे कई अर्थों में गढ़ा है. भारतीय होने के मामले में भी ऐसा ही है. मैं भारतीय ही जन्मा था और जब तक बेबस परिस्थितियां (मसलन उतावलेपन में लाया गया राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर या एनआरसी) मुझे मजबूर न कर दें, भारतीय ही मरूंगा. इस बात में मेरा इतना गहरा यकीन है कि 15 साल पहले डैनिश नागरिकता लेने के योग्य होने के बावजूद और भारतीय पासपोर्ट पर पश्चिम के देशों की यात्रा करते हुए होने वाली असुविधाओं तथा वीजा से जुड़े अच्छे-खासे खर्चों के बावजूद मैंने इसके लिए आवेदन नहीं किया.

ऐसा कहना यह दावा करना नहीं है कि इस्लाम श्रेष्ठतर धर्म है. इसी तरह मैं अपना भारतीय पासपोर्ट इसलिए बनाए नहीं रखता क्योंकि मैं मानता हूं कि भारत दुनिया के दूसरे देशों से बेहतर है. मैं 'मुस्लिम' और 'भारतीय' दोनों को इसलिए नहीं नकारता क्योंकि ऐसा करना खुद अपने बड़े हिस्सों को मिटा देना होगा. आखिरकार मैं भारत में जन्मा और पला-बढ़ा मुसलमान हूं और रहूंगा. मेरी दूसरी खूबियां भी हैं—मिसाल के लिए, बिहारी या अब डेनमार्क का निवासी (और इसलिए डैनिस भाषा, संस्कृति और राजनीति से प्रभावित) या पिता वगैरह. मगर ये मेरे वजूद के बेहद अहम और एक-दूसरे में व्याप्त उन हिस्सों को मिटा नहीं सकते जो अमिट रूप से 'भारतीय' और 'मुस्लिम' हैं.

अलबत्ता हाइ स्कूल में दाखिल होने के वक्त के आसपास से ही मुझे एहसास हुआ कि मुस्लिमपन के पुराने और ज्यादा व्यापक जिन रूपों के साथ मैं बड़ा हुआ, उन पर कट्टरपंथी इस्लामी रुझानों के हमले हो रहे थे, जिनमें से ज्यादातर खाड़ी के देशों में भारतीयों के अनुभव (और धन) से प्रभावित थे. मुस्लिम बनना कई अर्थों में ज्यादा से ज्यादा मुश्किल होता जा रहा था, जो उससे पहले तक संभव था. यह केवल मुसलमानों की खामी नहीं थी. इसमें ब्रिटिश उपनिवेशवाद से लेकर शीत युद्ध के वर्षों के दौरान 'मुस्लिम दुनिया' में अमेरिकी मदद और तेल के असर से समाजवादी और सेक्युलर पार्टियों के खात्मे तक विभिन्न दूसरे कारकों का योगदान था.

धीरे-धीरे 'असली मुसलमान' होने की खातिर आपको कुछ निश्चित तरीकों से बर्ताव करना, काम करना, सोचना, खाना, कपड़े पहनना और बोलना पड़ता था. यह संकुचन जारी रही. 1970 का दशक आते-आते अपने मजहब की संकीर्ण व्याख्याओं से सहमत हुए बगैर और खुद अपने अतीत और संस्कृति के कुछ निश्चित पहलुओं को नजरअंदाज किए बगैर 'मुस्लिम' होना मुश्किल हो चुका था, कम से कम कस्बाई भारत में तो हो ही चुका था.

अगर आप इस बात में यकीन नहीं करते थे कि औरतों पर कुछ निश्चित तरीकों से आचरण करने या अलहदा कानूनी अधिकार स्वीकार कर लेने के लिए दबाव नहीं डालना चाहिए या आपके किसी स्वीकृत मौलाना से ज्यादा रूमी और गालिब को पढऩे की संभावना थी, तो आप कइयों के लिए 'असली' मुसलमान नहीं थे. इसी वजह से मैं 'मुस्लिम' पहचान से बचता था, यहां तक कि जब मुझे उस खास दीवार तक धकेल दिया गया, मैंने कभी उससे मुंह नहीं फेरा, केवल इसलिए कि मैं उम्मीद करता हूं कि तिरस्कृत किए जा रहे लोगों को, चाहे वे मुस्लिम हों या न हों, तिलांजलि नहीं देने की शालीनता मुझमें हमेशा रहेगी.

'भारतीय' को गले लगाना आसान था, क्योंकि यह ज्यादा व्यापक था. आप न केवल इस्लाम, हिंदू धर्म, ईसाइयत, सिक्खी वगैरह की कई छटाओं में भारतीय हो सकते थे, बल्कि आप विभिन्न प्रकार के बौद्धिक रुखों के साथ भी भारतीय हो सकते थे. आप गहन-गंभीर ऐतिहासिक और दार्शनिक पाठ के रूप में या दैवीय आविर्भाव के रूप में भगवद् गीता—या कोई भी दूसरा पवित्र ग्रंथ—पढ़ सकते थे. आप तर्क कर सकते थे कि वैदिक युग में गोमांस खाया जाता था या गाय को पवित्र मानकर उसकी पूजा कर सकते थे.

आप जाति-आधारित सोच की तमाम ब्राह्मणवादी धाराओं या जाति-विरोधी बौद्ध ग्रंथों या चार्वाक के नास्तिक दर्शन या इन सभी के हालिया दलित प्रतिवादों का अध्ययन कर सकते थे. आप राष्ट्रवादी या साम्यवादी, दक्षिणपंथी या वामपंथी, और इनके बीच हजार छटाओं में से हो सकते थे. आप लाखों ईश्वर, तीन ईश्वर, एक ईश्वर, या फिर नास्तिकता में विश्वास कर सकते थे.

मुझे लगता है कि अगर हम भारतीय 'भारतीय' की वही व्याख्या करें जो कट्टरपंथियों और इस्लामवादियों ने 'मुस्लिम' के बारे में है, तो क्या होगा? मेरा एक हिस्सा डरता है कि यह होना पहले ही शुरू हो चुका है. मैं उम्मीद ही कर सकता हूं कि 'भारतीय' को इस हद तक संकुचित नहीं किया जाएगा कि लाखों भारतीय इससे बहिष्कृत हो जाएं, क्योंकि मुस्लिम के तौर पर मैंने लंबे समय तक कुछ मुसलमानों के हाथों बहिष्कृत महसूस किया है.

ताबिश खैर का नया उपन्यास नाइट ऑफ हैपीनेस है.

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