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ममता की उलटी गिनती शुरू

सांसद तापस पॉल का मामला महिलाओं की गरिमा के लिए एक नजीर बनना चाहिए. ममता बनर्जी की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है.
ममता की उलटी गिनती शुरू
बृंदा करातनई दिल्ली, 14 July 2014

आप क्या चाहते हैं? मैं उन्हें मार डालूं?” तापस पॉल के मामले में ममता के इस आडंबरपूर्ण सवाल से यह पता चलता है कि एक प्रमुख सांसद के बलात्कार की संस्कृति को बढ़ावा देने के मामले में पार्टी के लिए किस तरह से अपना बचाव कर पाना मुश्किल हो रहा है. उनसे किसी ने नहीं कहा था कि वे पॉल को मार डालें. मांग इतनी-सी की जा रही थी कि वे पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और गृह मंत्री होने के नाते यह सुनिश्चित करें कि पॉल के खिलाफ एफआइआर दर्ज की जाए और उन्हें गिरफ्तार किया जाए.

पॉल के इस चौंकाने वाले, घटिया और अस्वीकार्य बयान के बाद उनका एक और बयान सामने आया है जिसमें उन्होंने एक बार फिर उन सीपीएम कार्यकर्ताओं के टुकड़े-टुकड़े कर देने का आह्वान किया है जो तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के विरोध का साहस करते हैं. जैसा कि अंदेशा था, एक बार फिर टीएमसी और उसके नेता कार्रवाई में आनाकानी कर रहे हैं. ये वही मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने जाधवपुर विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर पर सिर्फ  इसलिए मुकदमा ठोक दिया और गिरफ्तार करवाया क्योंकि उन्होंने ममता का मजाक उड़ाने वाला कार्टून प्रकाशित किया था.

इंडोनेशिया में साठ के दशक के मध्य में कम्युनिस्टों और उनके समर्थकों की बेरहमी से गई हत्या के बारे में एक स्तब्ध कर देने वाली डॉक्युमेंट्री द किलिंग फील्ड्स में महिला कम्युनिस्टों या महिला कम्युनिस्ट समर्थकों को जिस तरह से निशाना बनते दिखाया गया है, उससे पता चलता है कि कैसे बलात्कार या बलात्कार का डर सत्ता स्थापित करने का साधन बन गया है. यह फिल्म सिहरन के साथ इस बात की याद दिलाती है कि अपने लोगों को ‘सीपीएम की महिलाओं के साथ बलात्कार करते’ देखना चाहने वाला तापस पॉल का बयान सिर्फ शब्द नहीं, कार्रवाई का एक पूर्व संकेत हो सकता है. पश्चिम बंगाल में बलात्कार पीड़िता सीपीएम समर्थक महिलाओं के बयानों पर गौर करें तो अब तक ऐसे एक दर्जन से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं.

बहुत-सी महिलाओं ने ऐसे बयान भी दिए हैं कि चुनाव अभियान के दौरान टीएमसी से जुड़े मर्द सफेद साड़ी, विधवा का प्रतीक, लेकर उनके घर आए और उनसे कहा कि अपने पति को सीपीएम के लिए काम करने से रोको, नहीं तो यही साड़ी पहननी पड़ेगी. अस्पताल में मैं एक पीड़िता से मिली थी जिसने टीएमसी के निर्देशों के खिलाफ जाकर अपने गांव वालों को सीपीएम के समर्थन में एकजुट किया था. इस बात का पता चलने पर टीएमसी के मर्द उसे खींचकर एक अज्ञात जगह पर ले गए, जहां उन्होंने उसका स्तन काटने का प्रयास किया. मैंने कटने के बड़े निशान देखे थे जिस पर डॉक्टरों ने टांका लगा दिया था.

यह बेहद घिनौना है कि किसी महिला को सिर्फ  इस वजह से बलात्कार या हिंसा का निशाना बनाया जाए क्योंकि उसने लाल झ्ंडा छोडऩे से मना कर दिया हो. मेरा मानना है कि यह सिर्फ  टीएमसी बनाम सीपीएम का मामला नहीं है, जैसा कि टीएमसी के अपने पक्ष में दिए जाने वाले तर्कों से लगता है. यह टीएमसी बनाम लोकतंत्र का मामला है. इसके सभी महिलाओं के लिए व्यापक निहितार्थ हैं. कभी महिलाओं के लिए सबसे सुरक्षित स्थानों में शामिल पश्चिम बंगाल पिछले तीन वर्ष में महिला सुरक्षा के मामले में सबसे खराब रिकॉर्ड वाला राज्य हो गया है तो यह निश्चित रूप से उन अपराधियों की वजह से है, जिन्हें कम्युनिस्टों को मारने या बलात्कार करने के लिए राजनैतिक संरह्नण हासिल है और वे इस लाइसेंस का इस्तेमाल आम जनता के खिलाफ  भी कर रहे हैं.

कौन-सी महिला सीपीएम समर्थक है और कौन-सी नहीं, एक बलात्कारी सिर्फ इसकी पहचान कर ही चुप नहीं बैठेगा, बल्कि वह इस लाइसेंस का इस्तेमाल उन सभी से यौन तृप्ति हासिल करने के लिए करेगा, जिनको वह पसंद करता है. राज्य में बिल्कुल ऐसा ही हो रहा है.

पॉल संसद के चुने गए सदस्य भी हैं. ऐसी बलात्कारी संस्कृति को बढ़ावा देने वाले को यदि सदन में बैठने दिया गया तो इससे भारतीय संसद हमारी जनता की और वास्तव में पूरी दुनिया की नजरों में गिर जाएगी. कम-से-कम इतना तो किया जा सकता है कि उन्हें आगामी सत्र के लिए निलंबित कर दिया जाए. हो सकता है कि पहले ऐसा कभी न हुआ हो, पर एक मिसाल तो कायम करनी होगी. संसदीय लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए यह जरूरी है कि निर्वाचित प्रतिनिधि एक न्यूनतम आचार संहिता का पालन करें या सजा के लिए तैयार रहें. आखिरकार देश की राजनीति में तापस पॉल जैसे लोग अगर महिलाओं की गरिमा को कुचलते रहे और संसद खामोश बैठी रही, तो वह अपने ही पारित किए कानूनों को लागू करवाने में कड़ा रुख अपनाने का नैतिक अधिकार खो देगी.

टीएमसी ने सार्वजनिक रूप से माफी मांगने का जो नाटक किया, वह असल में पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र के लगातार जारी चीरहरण से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए ही है. ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें टीएमसी नेताओं और जनप्रतिनिधियों ने सरेआम राजनैतिक विरोधियों की हत्या के लिए उकसाया है. बीरभूमि के विधायक का एक टेप सामने आया जिसमें वे सीपीएम के तीन कार्यकर्ताओं को कत्ल कर देने की बात कर रहे हैं. इसके कुछ दिनों बाद ही कार्यकर्ताओं की हत्या हो गई थी. हालांकि, अपराधी अब भी आजाद घूम रहे हैं. सभी लोग जानते हैं कि पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री की इजाजत के बिना एक पत्ता तक नहीं हिल सकता. राज्य को अगर गुंडे-मवाली चला रहे हैं तो सिर्फ इसीलिए क्योंकि उन्हें एक ऐसे व्यक्ति का संरक्षण हासिल है जिसके आदेश को ही कानून की इबारत मान लिया जाता है.
बृंदा करात सीपीएम की नेता हैं

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