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कश्मीरः भय और आक्रोश का आलम

आम धारणा है कि जम्मू और कश्मीर एक पिछड़ा इलाका है और अनुच्छेद 370 इस पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार है. लेकिन इस धारणा का हकीकत से कोई सरोकार नहीं.

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aajtak.in
मंजीत ठाकुर/ संध्या द्विवेदी 26 August 2019
कश्मीरः भय और आक्रोश का आलम बेबसी और अंदेशा

पिछले तीन हफ्तों में भारतीय मीडिया में कश्मीर को लेकर खबरों और विचारों की बाढ़ तो आ गई लेकिन उसमें कश्मीरियों के सोच और भावनाओं को बहुत कम स्थान मिला है. वास्तव में, उनके मुंह पर बहुत कसकर जाब बांध दिया गया है. 5 अगस्त, 2019 को, जब भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त किया गया तो कश्मीर में संचार के सभी साधन ठप्प कर दिए गए. पूरी घाटी में कर्फ्यू जैसे हालात पैदा कर दिए गए, लोगों का घरों से बाहर निकलना मुश्किल बना दिया गया. कई दिनों के लिए कश्मीर काल-कोठरी जैसा हो गया.

 वहां के हालात को खुद देखने-समझने और लोगों के विचारों को सुनने के लिए हम चार लोग (कविता कृष्णन, मैमूना मुल्ला, विमलभाई और मैं) 9 अगस्त को कश्मीर के लिए रवाना हुए. हम पांच दिन वहां रहे. हमने पहले दो दिन श्रीनगर में  बिताए. हम शहर में हर तरफ घूमते रहे, वहां के बाशिंदों से बात करते रहे. फिर हमने एक कार किराए पर ली और सोपोर, बांदीपोरा, पंपोर, पुलवामा, अनंतनाग, बिजबेहारा और रास्ते में पडऩे वाले कई गांवों की यात्रा की. अक्सर हम चेकपोस्ट जैसे-तैसे पार कर गए. हालांकि, एक या दो बार हमें चक्कर लगाना पड़ा या वापस ही मुड़ जाना पड़ा.

यह मेरी कश्मीर की चौथी यात्रा थी. पहले की तरह, लोगों ने हमारा गर्मजोशी से स्वागत किया. कठिनाई और दुख की इस घड़ी में भी, लोगों ने हमें अपने घरों में आमंत्रित किया. काश! दिल्ली या अहमदाबाद में भी कश्मीरियों का अनुभव ऐसा ही होता.

 ग्रामीण अर्थव्यवस्था की ऐसी समृद्धि देखकर मैं एक बार फिर हैरान रह गया. ग्रामीण कश्मीर के अधिकांश लोगों के पास बड़े और सुंदर घर हैं और वे बेहतर पोषित भी हैं. उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में पाई जाने वाली भयावह गरीबी यहां शायद ही कहीं दिखती है. आधिकारिक आंकड़ों से इस बात की पुष्टि भी होती है. जम्मू और कश्मीर के सामाजिक संकेतक निश्चित रूप से गुजरात से बेहतर स्थिति में हैं, जिसे प्रधानमंत्री आदर्श समझते हैं. यह विकास के कई प्रमुख संकेतकों में उजागर है—उदाहरण के लिए जीवन प्रत्याशा (गुजरात के 69 वर्ष की तुलना में जम्मू-कश्मीर में 74 वर्ष), बच्चों का पूर्ण-टीकाकरण कवरेज (गुजरात के 50 प्रतिशत के मुकाबले जम्मू-कश्मीर में 75 प्रतिशत) और ग्रामीण गरीबों की संख्या का अनुपात (जम्मू-कश्मीर में 12 प्रतिशत और गुजरात में 22 प्रतिशत).* और जो लोग ''जनसंख्या विस्फोट'' से डर रहे हैं, उन्हें यह जानने में दिलचस्पी हो सकती है कि जम्मू और कश्मीर भारत के सबसे कम प्रजनन दर वाले राज्यों में है—प्रति महिला सिर्फ 1.7 बच्चे जो कि प्रतिस्थापन स्तर से नीचे है.

संयोग से, जम्मू-कश्मीर की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के अपेक्षाकृत समृद्ध और समतावादी होने का एक प्रमुख कारण यह है कि यहां 1950 और 1970 के दशक में व्यापक भूमि सुधार हुए थे. अनुच्छेद 370 के जरिए भूमि पुनर्वितरण संभव हो सका था—उस समय, संपत्ति का अधिकार भारतीय संविधान के तहत मौलिक अधिकार था, लेकिन जम्मू-कश्मीर में यह कानून लागू नहीं था क्योंकि उसका अपना संविधान था. आम धारणा है कि जम्मू और कश्मीर ''पिछड़ा'' इलाका है और अनुच्छेद 370 इस पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार है लेकिन इस बात का हकीकत से कोई वास्ता नहीं.

चूंकि हम कश्मीर में हर तरफ गए, और हर जगह हमने महसूस किया कि लोगों के मन में क्रोध और भय घर कर गया है. श्रीनगर में कश्मीर के भाजपा प्रवक्ताओं के अलावा, हमें ऐसा कोई भी शख्स नहीं मिला जो अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के फैसले का समर्थन करता हो. इसके विपरीत, उनके राज्य की स्वायत्तता छीनने के इस प्रयास को लेकर लोगों के मन में बहुत आक्रोश था.

ऐसा नहीं है कि कश्मीर के लोग स्वायत्तता से संतुष्ट थे. स्वायत्तता की गारंटी, जैसा कि सर्वविदित है और जैसा कि पूर्व रॉ प्रमुख ए.एस. दुलत ने खुलकर कहा भी है, ''नाममात्र'' की रह गई थी. फिर भी उस स्वायत्तता को अचानक खत्म कर देने से कश्मीर के लोगों को चोट पहुंची; एक ही झटके में उनकी सारी आकांक्षाओं को हमेशा के लिए कुचल देने की कोशिश की गई और यह काम जिस तरह से किया गया, उससे वे सहम से गए हैं. बटमालू में एक बुजुर्ग ने कहा, ''पूरे कश्मीर को जेल बना दिया... हमें बांध कर अनुच्छेद 370 को हटाया.'' कई अन्य लोगों ने भी ऐसी ही बातें कहीं. क्रोध की तरह, भय भी गहरा गया है. कोई भी कैमरे पर बोलने को राजी नहीं हुआ. हम जब भी लोगों की बातें रिकॉर्ड कर रहे थे, हमें इसका ध्यान रखना पड़ता था कि उनके चेहरे कैमरे में कैद न होने पाएं. हमने लोगों के नाम भी नहीं लिखे, ताकि उनके मन में कोई आशंका न रहे.

लोगों के डरने की वजह है—5 अगस्त को भारत के कदम के बाद लोगों की खूब गिरक्रतारियां हुई हैं. कोई नहीं जानता कि कितने लोग गिरफ्तार किए गए हैं, वे कहां हैं, या उन्हें कब तक बंद रखा जाएगा. अनुमान यह है कि सभी महत्वपूर्ण नेताओं, आयोजकों और विरोधियों को या तो गिरफ्तार कर लिया गया या फिर हवालात में डाल दिया गया. उनमें से 'उदारवादी' राजनैतिक दलों के नेता भी हैं जिन्होंने भारत के साथ बातचीत की वकालत की थी. जैसा कि किसी कश्मीरी शख्स ने कहा, ''जो इंडिया के गीत गाते थे, उनको भी जेल भेजा गया.'' कश्मीर में भारत समर्थक नेताओं की स्थिति शर्मनाक हो गई है, उनकी विश्वसनीयता का संकट पैदा हुआ है और इससे कट्टरपंथी तत्वों को बढ़ावा मिल सकता है.

एक या दो स्थानों पर जहां हम थोड़ी देर से सुरक्षा बलों की नजर से बाहर थे, और जहां हमारे आसपास एक छोटी-सी भीड़ जमा हो गई थी, लोगों ने कुछ नारे लगाने का जोखिम उठाया, ''हम क्या चाहते हैं?'' 'आज़ादी', 'अनुच्छेद 370 वापस लाओ!', इत्यादि. लेकिन वे जल्दी ही तितर-बितर हो गए. ये विरोध हालांकि बहुत छोटे लग रहे थे, लेकिन स्वत: स्फूर्त ये छोटे-छोटे विरोध कश्मीर की उस प्रतिरोध की संस्कृति का प्रतीक हैं जिसकी जड़ें गहरी हैं. जैसा कि सोपोर में किसी ने कहा था, ''जितना जुल्म करेंगे, उतना उभरेंगे.''

10 अगस्त को हमने श्रीनगर के एसएमएचएस अस्पताल का दौरा किया. हम पेलेट गन के दो युवा पीडि़तों से मिले, जिनमें से एक की आंखों की रोशनी शायद न लौटे. किसी युवा को गोलियों से छलनी देखना दर्दनाक अनुभव होता है. बुरहान वानी की मौत के बाद मैं अक्तूबर, 2016 में कुछ ऐसे युवाओं से मिला, जब यही वार्ड पेलेट गन के पीडि़तों से भरा हुआ था. इस बार 'सिर्फ' दो (कई पीडि़त खुफिया एजेंटों से बचने के लिए निजी अस्पतालों में इलाज पसंद करते हैं) लेकिन अस्पताल के कर्मचारियों ने तो अगले कुछ महीनों तक ऐसे पीडि़तों की संभावित लहर के लिए खुद को तैयार रखा है.

ईद का दिन, 12 अगस्त, सबसे दुखद दिन था. हम कई कस्बों और गांवों में गए लेकिन हम जहां भी गए सड़कें सुनसान मिलीं और बाजार बंद.

इक्का-दुक्का, लोग नए कपड़े पहने या फिर अपने पड़ोसियों के साथ कुर्बानी के भेड़ के मांस को बांटते दिख रहे थे. लेकिन अन्यत्र केवल निराशा और सूनापन था.  शाम को हमने जफर (बदला हुआ नाम) के घर पर कुछ समय बिताया. 19 वर्षीय जफर को 5 अगस्त की रात को सुरक्षाबलों ने घर से उठा लिया था और वह अब तक घर नहीं लौटा था. उसकी मां का रो-रोकर बुरा हाल हो गया था, और उसके पिता को सबसे बड़ी अनहोनी का डर सता रहा था. उनके खौफ की भावना को समझने के लिए, हमें याद रखना चाहिए कि कश्मीर में गायब हो जाना और प्रताडऩा आम बात है. जफर की एक तस्वीर दीवार पर लटकी हुई थी, मानो उस पर एक माला डाल दिए जाने को तैयार हो.

13 अगस्त को हम वापस लौट रहे थे लेकिन घाटी में वैसा ही अंधेरा, वैसी ही निराशा छाई थी. तब तक विरोध जताने की चंद घटनाएं ही हुई थीं, लेकिन ऐसा इसलिए था क्योंकि कर्फ्यू जैसी स्थिति बनी हुई थी और संचार के सभी साधन बंद कर दिए गए थे. कई लोगों को अपेक्षा थी कि पाबंदियां हटने पर विरोध प्रदर्शन की बाढ़ आ जाएगी. विरोध चाहे कितने भी शांतिपूर्ण हों, कश्मीर में उसकी अनुमति नहीं है, और वहां भीड़ को नियंत्रित करने के जो नृशंस तरीके आजमाए जाते हैं, उन्हें देखते हुए सामूहिक प्रदर्शन जल्द ही सुरक्षा बलों के साथ बदसूरत टकरावों में बदल जाते हैं. आगे की परेशानियों से बचने के लिए प्रतिबंधों को फिर से लागू किए जाने की संभावना है. हमारी यात्रा के एक सप्ताह बाद, संकेत मिल रहे हैं कि आंख-मिचौनी का यही सिलसिला फिर शुरू हो चुका है. यह असंभाव्य है कि कश्मीरी जल्द ही घुटने टेक देंगे और स्वायत्तता के नुक्सान को एक बीती बात मान कर स्वीकार कर लेंगे.

(* क्रमशः सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम, नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे और नेशनल सैंपल सर्वे के नवीनतम आकलन)

(ज्यां द्रेज रांची स्थित विकास अर्थशास्त्री हैं)

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