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भारत का कमजोर रक्षा कौशल

एक अपवाद 13 दिसंबर, 2001 को भारत की संसद पर हुए हमले का जवाब था. उस समय ऑपरेशन पराक्रम किया गया जिसमें दूसरे कई मोटे तौर पर प्रतीकात्मक उपायों के अलावा सरहद पर भारी सैन्य लामबंदी की गई.

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अजय साहनीनई दिल्ली, 27 February 2019
भारत का कमजोर रक्षा कौशल अजय साहनी

कश्मीर के पुलवामा में आत्मघाती धमाके के 'अभूतपूर्व' होने के बारे में बहुत कुछ कहा गया है. कुछ ने तो इसे 'दशकों का सबसे भयानक आतंकी हमला' करार दिया है. मगर इससे हमारे भुलक्कड़पन की ही झलक मिलती है. यह हमला त्रासद और स्तब्धकारी जरूर है, पर इसे अब तक का सबसे भयानक हमला नहीं कहा जा सकता, न ही इसमें अपनाई गई रणनीति कोई अनोखी थी. यह वेहिकल बोर्न इंप्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (वीबीआइईडी) के जरिए जम्मू-कश्मीर में सातवां आत्मघाती हमला था. ऐसा पहला हमला 19 अप्रैल, 2000 को सेना के बादामी बाग मुख्यालय पर हुआ था.

जहां तक 'सबसे भयानक' की बात है, तो हैरानी वाली बात कि 1993 में मुंबई में 257 लोगों की जान लेने वाले सिलसिलेवार बम धमाकों को नजरअंदाज किया जा सका, या मुंबई में ही 2006 में 201 लोगों की जान लेने वाले धमाकों को, या 2008 में 175 लोगों की जान लेने वाले 26/11 के मुंबई हमले को, या थोड़ा हटकर देखें, तो 2010 में माओवादियों के हाथों ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस को पटरी से उतार दिए जाने से 148 लोगों की मौत को, या फिर 2008 के गुवाहाटी बम धमाकों को जिनमें 87 लोग मारे गए थे, या 2010 में चिंतलनाड में माओवादियों के हाथों 76 सुरक्षाकर्मियों के जनसंहार को.

फेहरिस्त लंबी है, पर मुद्दे की बात यह है कि लगता है कि हमारी कोई ऐतिहासिक स्मृति ही नहीं है. यही वजह है कि हरे बड़े हादसे के बाद शोर-शराबे से भरा समूचा बहस-मुबाहिसा बिल्कुल बेमानी होता है. अगर कोई पिछले रिकॉर्ड को देखे, तो पता चलेगा कि हर आतंकी घटना के बाद निंदा, भर्त्सना, धमकी और लानत-मलामत के वही लफ्ज, अक्सर हू-ब-हू, दोहरा दिए जाते हैं. इसलिए अगर हमें अपने मौजूदा 'विकल्पों' की पड़ताल करनी है, तो अच्छा होगा कि हम पीछे मुड़कर पहले के गैर-मामूली आतंकी हमलों को देखें और पता लगाएं कि उस वक्त क्या किया गया था.

ज्यादातर मामलों में जवाब यह है कि बहुत कम या कुछ नहीं. कुछ लोगों ने 'कूटनीतिक सहयोग' बंद करने, कुछेक प्रतीकात्मक कदम उठाने, बातचीत टाल देने (अगर चल रही हो तो), और 'फिर कभी' ऐसी गुस्ताखी नहीं होने देने के कमजोर वादे भर किए.

एक अपवाद 13 दिसंबर, 2001 को भारत की संसद पर हुए हमले का जवाब था. उस समय ऑपरेशन पराक्रम किया गया जिसमें दूसरे कई मोटे तौर पर प्रतीकात्मक उपायों के अलावा सरहद पर भारी सैन्य लामबंदी की गई.

इससे तनातनी और परमाणु जंग का बेबुनियाद डर बढ़ गया, पर आखिरकार कुछ हासिल नहीं हुआ—सिवा इसके कि करीब 800 (कुछ अनुमानों के मुताबिक, और भी ज्यादा) भारतीय सैनिकों की मौत हो गई, जो बारूदी सुरंगों और उन्हें बेअसर करने की कार्रवाइयों के दौरान हुए धमाकों सहित कई किस्म के हादसों में मारे गए.

दूसरा अपवाद उडी हमले के नतीजतन की गई 2016 की 'सर्जिकल स्ट्राइक' थी. ऐसी स्ट्राइक पहले भी की गई थीं, वैसे उनकी मारकता को लेकर विवाद हैं. हालांकि मौजूदा हुकूमत ने इन स्ट्राइक को राजनैतिक और अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां बनाना पसंद किया. लेकिन इसका प्रतिकूल असर ही हुआ क्योंकि दहशतगर्दी और सीमापार गोलीबारी में हैरानी भरा इजाफा हो गया. ऐसी ही किसी कार्रवाई को फिर आजमाया जा सकता है, पर इसका कोई खास असर नहीं होगा.

बिना सोचे-समझे फौरी प्रतिक्रिया से अलग हटकर रणनीतिक जवाब राज्यसत्ता की टिकाऊ क्षमताओं पर आधारित होता है और उसके लिए लंबे वक्त की तैयारी की जरूरत होती है. दशकों तक बहुत कम निवेश और उपेक्षा के चलते हमने अपने रक्षा तंत्र को खोखला कर लिया है और मौजूदा हुकूमत ने भी इसी रुझान को बढ़ाया है. रक्षा से जुड़ी संसद की स्थायी समिति ने पिछले साल एक रिपोर्ट में, दूसरी बातों के अलावा, यह भी कहा था कि हमारे रक्षाबलों के 69 फीसदी साजो-सामान 'विंटेज श्रेणी के' हैं, और सेना के पास गोला-बारूद का इतना भी सुरक्षित भंडार नहीं है कि पाकिस्तान के साथ लड़ाई में 10 दिन भी टिक सकें.

हमारे पास 'दो मोर्चों पर जंग' के लिए तैयार रहने का 'सैन्य सिद्धांत' भले हो, पर महज कागजी है. इतना ही नहीं, गुप्त कार्रवाई की हमारी क्षमताओं को—खासकर मोरारजी देसाई और इंद्र कुमार गुजराल के जमाने में—बकायदा तहस-नहस कर दिया गया था, पर बीच की या बाद की सरकारों ने सेना की उस क्षमता को दोबारा स्थापित करने का कोई जतन नहीं किया. पाकिस्तान में घुसकर मारक हमला करने के लिए जिस किस्म की बारीक इंटेलीजेंस और गूढ़ क्षमताओं की दरकार होती है, वे हैं ही नहीं.

इसीलिए मसूद अजहर को 'निकाल लाने' या अमेरिका के एबटाबाद हमले की नकल करने की बातें हताश फंतासियों के अलावा कुछ नहीं हैं. भारत के पास ऐसी पारंपरिक या उप-पारंपरिक ताकत है ही नहीं, जिससे वह दहशतगर्दी को पनाह देने के लिए पाकिस्तान को असरदार ढंग से सजा दे सके और भविष्य में उसे ऐसे खिलवाड़ करने से रोक सके.

लेखक इंस्टीट्यूट फॉर कंफ्लिक्ट मैनेजमेंट और साउथ एशिया टेररिज्म पोर्टल के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर और साउथ एशिया इंटेलिजेंस रिव्यू के एडिटर हैं.

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