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भारतीय क्लबों को साहब और मेमसाहब वाले अपने माहौल से उबरना होगा

भारतीय क्लब संस्कृतियों के वाहक रहे हैं और उन्हें राष्ट्रीय कानूनों के दायरे में अपने नियम लागू करने का अधिकार होना चाहिए. लेकिन अब उन्हें साहब और मेमसाहब वाले अपने माहौल से उबरना होगा

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शिव विश्वनाथन 04 August 2014
भारतीय क्लबों को साहब और मेमसाहब वाले अपने माहौल से उबरना होगा

राजनीति अकसर स्मृतियों का खेल होती है और स्मृतियां अमूमन मोहावृत्त होती हैं. मैं जब कभी धोती के बारे में सोचता हूं, तो मेरे जेहन में एक बेदाग कपड़े की ऐसी छवि उभरती है जो रोजाना वैसा ही झक-सफेद बना रहता हो, जो अपने सादेपन में भी भव्य हो. फिर अचानक मेरा दिमाग धोती के बेजोड़ सादेपन और साडिय़ों की विशाल विविध किस्मों के बीच तुलना करने लगता है. दोनों ही कला के ऐसे नमूने हैं जिनमें रोजमर्रा की जिंदगी का अक्स दिखता है. दोनों में ही बुनावट एक कविता की तरह समाई हुई है जो किसी किस्सागो का ध्यान खींचने के लिए काफी है.
मुझे याद है कि मेरे चाचा चंद्रशेखर जो एक खगोलभौतिकीविद थे, कैसे चेन्नै में बैठे-बैठे अपने पुराने प्रेसिडेंसी कॉलेज में होकर आने को बेताब रहते थे. उन्हें वहां किसी विशिष्ट मेहमाननवाजी की चाहत नहीं थी. वे तो बस इतना चाहते थे कि प्रेसिडेंसी की पुरानी इमारत में खुद को डुबो लें और पुराने जमाने की यादों में खुद को भिगो लें. वे तो बस अनजान रहकर इसका सुख लेना चाहते थे. उन्होंने इसके लिए बिल्कुल साफ-सुथरा नुस्खा अपनाया. वे अपनी एक पसंदीदा धोती पहनते, एक उजली कमीज डालते और चमड़े की सैंडिल में प्रेसिडेंसी के इर्द-गिर्द चक्कर मारते रहते थे. अपने पुराने कॉलेज के पतन पर उन्हें जितना दुख होता था, वहां मौजूद रहकर वे उतने ही खुश भी होते थे. किसी को पता तक नहीं चलता कि वेष्टि में टहल रहा यह शख्स महान वैज्ञानिक है. मुझे याद है कि भारत लौटने के बाद उन्होंने सूट छोड़कर वेष्टि पहनना शुरू कर दिया था. धोती से उन्हें घर में होने जैसा एहसास होता था, लगता था कि वे वास्तव में घर लौट आए हैं. उनके लिए धोती का मतलब जीवन जीने का एक तरीका था, अपने होने की वह अवस्था जहां उन्हें बार-बार लौटकर आना था.
गांधी भी एक किस्म की धोती पहनते थे. रोजमर्रा की वह सामान्य धोती समय के साथ उनकी राजनीति का प्रतीक ही बन गई. गांधी के सादेपन ने अंग्रेजी साम्राज्यवाद को अतिशय परिधानों की सत्ता का पर्याय बना डाला. कपड़ों में लदे-फंदे महाराजाओं और अंग्रेज अफसरों की बगल में खड़े शिष्टता और सादेपन से लबरेज गांधी के बीच का राजनैतिक फर्क साफ नजर आता था. यह गांधी का ही व्यक्तित्व था जिसने धोती और देह को एकाकार कर दिया था जिसके बरअक्स साम्राज्यवाद, अपनी भड़कीली अश्लील पोशाक में अतिशयोक्ति लगता था. इस मुहावरे से इतर यह बात भी साफ थी कि धोती की शिष्टता अपने आप में बेदाग थी, जिसका एक-एक रेशा कपास के गुणों का उत्कर्ष बखान करता था.
मुझे याद है जब गांधी की मुलाकात ब्रिटेन की महारानी से हुई, तो उन्होंने चुहल में टिप्पणी की थी कि “महारानी ने इतना पहन रखा है कि वह हम दोनों के लिए काफी है.” धोती का इससे बेहतर बचाव और क्या हो सकता था!
अपने इस तमाम राष्ट्रवाद और संस्कृति प्रेम के बावजूद मुझे क्लब संस्कृति से कोई परहेज नहीं है. मेरी स्मृति में क्लब एक अंग्रेजियत की तरह आता है, जो हम सब के भीतर होती थी. क्लब जासूसी कहानियों की किताब जैसी कोई रहस्यमय किस्म की जगह होती थी, जहां शर्लाक होम्स जैसे लोगों से मिलने का सुख मिलता था. क्लब विशिष्ट जगह थी, लेकिन मेरे बाल मस्तिष्क में इसे लेकर एक अजीबो-गरीब छवि है, जहां अलग-अलग दुनियाओं का संगम था. क्लबों में प्रौढ़ लोग अजीबो-गरीब तरीके से बरताव करते थे, जहां आदमी ब्रिज खेलते और औरतें धूम्रपान करती थीं. ऐसा लगता था गोया वहां रोजमर्रा की जिंदगी से अतिक्रमण की रियायत हो. मैं बचपन में चिप्स खाते हुए और जिंजर बियर गटकते हुए यह सब देखा करता था. क्लब ऐसी जगह थी जहां आप अंग्रेज हो सकते थे. मुझे याद है कि अपनी किशोरावस्था में हम क्लबों के बाहर लगे पुराने जमाने के निर्देश “कुत्ते और भारतीय का प्रवेश वर्जित” पर ठिठोली करते और साम्राज्यवाद की हार पर हंसते थे. मैं यह मानता हूं कि क्लब को लेकर मेरे विचार आर.के. नारायण के महान पात्र स्वामी के करीब थे, जिन्होंने मद्रास क्रिकेट क्लब की स्थापना की थी और सभी से उसमें प्रवेश के लिए चार आना शुल्क लेते थे जो उस वक्त बड़ी रकम थी.
बाद में जब हम बड़े हुए तो हमने जाना कि क्लब का एक मतलब राजनीति और सत्ता भी है, क्लब विशिष्ट व्यक्तियों के लिए होते हैं और इनमें प्रवेश का मामला मंदिरों में प्रवेश जितना विवादित रूप भी ले सकता है. मुझे याद है कि महान इंजीनियर विश्वेश्वरैया ने बंगलुरू में सेंटेनरी क्लब इसलिए स्थापित किया था क्योंकि उन्हें दूसरे क्लब में घुसने से रोक दिया गया था. कुछ दिनों पहले मैं सेंटेनरी क्लब गया था, तो मैंने देखा कि कैसे वहां एक लड़के को द्वारपाल इसलिए रोक रहा है क्योंकि वह कच्छे में आ गया था. अब भी वहां ‘सम्भ्रांत परिधान’ प्रवेश की कसौटी हैं.
क्लब कई मामलों में वॉर्सेस्टरशायर सॉस, अंग्रेजी नाश्ते या स्कूल की टाइ जैसे अंग्रेजी दिनों के हैंगओवर हैं. लेकिन हम भारतीयों के पास अंग्रेजी चीजों का देसीकरण करने की अपनी मौलिक तकनीक थी. हम अब भी अंग्रेजी नाश्ते को बचाए हुए हैं, लेकिन इंग्लैंड में सालभर बिताने के बाद मुझे एहसास हुआ कि हमारे ऑमलेट उनसे ज्यादा स्वादिष्ट होते हैं. शेक्सपियर और वुडहाउस के प्रेमियों के लिए साम्राज्य का पतन गहरी चिंता का विषय था. क्लब न होते तो हमारे पास बर्टी वूस्टर नाम का पात्र नहीं होता.
अंग्रेजियत के मुरीद विद्वान नीरद सी. चौधरी का किस्सा मुझे याद है कि जब वे अपने सपनों के स्वर्ग ब्रिटेन पहुंचे तो कैसे उन्होंने इस बात की शिकायत की कि बरतानी अंग्रेजी का स्तर गिर गया है. अंग्रेजी के चलते वे बहुत आहत हुए थे. क्लब भले ही अंग्रेजी साम्राज्य का हिस्सा रहे हों, लेकिन वे हमेशा से औपनिवेशिक खुमारी का शिकार नहीं थे. उनमें बदलाव होते रहे थे. मसलन, क्लब की चौखट पार करने को हमने अपनी नैतिकता का पैमाना भी बनाया था. क्लबों के उपयोग का एक सशक्त उदाहरण भारतीय सेना है. अफसरों के क्लब में आप आचार-व्यवहार, खाने की मेज के तौर-तरीके, शैली, परिधान, सम्मान और शाही अंदाज के नुस्खे सीखते थे. वहां प्रवेश करने और बरताव को लेकर एक रूढ़ि थी, खासकर कपड़ों को लेकर. ऐसे क्लब जब आचार संहिता पर जोर देते तो किसी को कोई आपत्ति नहीं होती. मैं अकसर सोचता हूं कि भारत एक ऐसा आतिथ्य प्रेमी देश रहा है जहां आखिरी अंग्रेज, या कहें कि विक्टोरियाई युग का कोई आखिरी शख्स या कोई आखिरी माक्र्सवादी भी भारतीय क्लबों में अपनी जगह पाता रहा है. मुझे तो खुमारी पसंद है, खासकर जब उसमें अंग्रेजियत हो. मेरा मानना है कि हमने अंग्रेजी संस्कारों को संवर्धित ही किया है, एक ऐसी अंग्रेजियत बनाई है जिसकी वे कल्पना तक नहीं कर सकते थे.

आज हमारे कई क्लबों को आधुनिक बनाए जाने और पुराने ‘साहब-मेमसाहब’ वाले रवैयों से पार जाने की जरूरत है. लोकतंत्र के पास क्लबों की संस्कृति से निपटने का तरीका मौजूद है, हालांकि इसमें एक सहज समझदारी और सतर्कता बरतनी होगी. कई क्लब प्रवेश के नियमों के मामले में कठोर रहे हैं और उन्होंने इनका इस्तेमाल लोगों को बाहर रखने में किया है. एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था में क्लब के नियम भले अप्रासंगिक पड़ चुके हों लेकिन क्लबों को वैसे नियम जारी रखने देने चाहिए जो राष्ट्रीय कानून के दायरे में आते हों. क्लब सत्ता का अक्स हैं और पोशाक सत्ता की भाषा. यह सत्ता अलगाव पैदा कर सकती है और जब कभी ऐसा मानवीय गरिमा के खिलाफ किया जाए, तो उसे चुनौती देनी होती है. दूसरे, बदलते हुए भारत में क्लब छोटी-छोटी उपसंस्कृतियों के वाहक बन जाते हैं, ऐसी लघु जीवनशैलियां जिनमें लोगों को रहने की छूट दी जानी चाहिए. जिंदगी जीने के पुराने तरीकों के प्रति एक मोह तो होता ही है. उस मोह को खत्म करने की कोई जल्दबाजी नहीं होनी चाहिए.
अब हम मद्रास क्लब के मामले पर आते हैं. हाइकोर्ट के एक जज को क्लब में आने से इसलिए रोक दिया गया क्योंकि वे धोती पहने हुए थे. इसने बेमतलब का एक बवाल खड़ा कर दिया, लेकिन इससे हम बदलाव के संकेतों को जरूर पकड़ सकते हैं. राजनैतिक दल तुरंत हरकत में आ गए और डीएमके ने कहा कि धोती उसका सांस्कृतिक और राजनैतिक प्रतीक है. औपनिवेशिक काले चोगे में वकीलों ने एमसीसी के सामने प्रदर्शन कर डाला. मुख्यमंत्री जयललिता हरकत में आईं और उन्होंने कह दिया कि पोशाक के मामले में अनावश्यक नियमों वाले क्लबों का लाइसेंस रोक दिया जाएगा. अब यहां एक स्तर पर लोकरंजक राजनीति हो रही है, हालांकि दूसरे स्तर पर यह क्लब के कालबाह्य नियमों की ओर भी एक संकेत है. यह संभ्रांत कपड़ों और बंदिशों के बीच के फर्क  को दिखाता है.
लोकतंत्र ने जीवनशैलियों को बदला है और समाज को नए लोगों और नई ताकतों के सामने ला खड़ा किया है. इन बदलावों के प्रति क्लबों को सचेत रहना होगा और वाजिब प्रतिक्रिया देनी होगी. मसलन, ‘सिर्फ पश्चिमी’ पोशाक तय करने की बजाए क्लब इसकी परिभाषा को देसी भी बना सकते हैं. धोती और दूसरी किस्म की पुरानी पोशाकों को छूट देकर क्लब अपनी शिष्टता में इजाफा कर सकते हैं. क्लब हमारे यहां आधुनिकता के साथ आए थे और उन्हें आधुनिकता का हिस्सा बने रह कर ही खुद को बचाना होगा. फिर भी, यह उम्मीद तो रहेगी कि ये बदलाव जरूरत से ज्यादा न होने पाएं. विविधता उतनी ही अहम है जितनी समानता लेकिन दोनों एक समान ढांचे में मौजूद रह सकते हैं. क्लब बदलाव की इस लहर के वाहक बन सकते हैं और साथ ही उस शानदार सनक को भी कुछ हद तक बचाए रख सकते हैं जिसकी इस लोकतंत्र को जबरदस्त जरूरत है.

(शिव विश्वनाथन सामाजिक विज्ञान के अध्येता हैं)

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