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आपदा पर विजय

आपदा प्रबंधन में देश ने जो प्रगति की है, उसी के फलस्वरूप फणि जैसे भीषण चक्रवात में भी नुक्सान कम से कम किया जा सका

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aajtak.in
संध्या द्विवेदी/ मंजीत ठाकुर नई दिल्ली, 14 May 2019
आपदा पर विजय रॉयटर

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आइएमडी) ने सुपर-साइक्लोन फणि के 3 मई को ओडिशा के तट पर पहुंचने की चेतावनी जारी की तो 1999 के सुपर-साइक्लोन (साइक्लोन 05बी) की दर्दनाक यादें ताजा हो उठीं. उस दौरान दस हजार से अधिक लोग मारे गए और 1800 करोड़ रुपए से अधिक की संपत्ति नष्ट हुई थी. लेकिन पिछले दो दशक में बहुत पानी बह चुका है. 2019 में इस चेतावनी को उसी गंभीरता से लिया गया जितनी होनी चाहिए थी.

 

हालांकि ओडिशा सरकार ने 2013 में एक और सुपर-साइक्लोन—फेलिन के भयावह असर को कम करने में सफलता हासिल की थी और केवल 36 लोगों की जान गई थी. फणि फेलिन से कहीं ज्यादा विनाशकारी था लेकिन इस दौरान केवल 41 जानें ही गईं. 

इन पंद्रह वर्षों (1999-2013) के दौरान क्या हुआ? ओडिशा की तटरेखा चक्रवातों की चपेट में है, लेकिन 1999 के सुपर साइक्लोन के बाद हुए विनाश ने ऐसा जनाक्रोश पैदा किया कि मुख्यमंत्री को अपनी कुर्सी से हाथ धोना पड़ा और कुछ ही महीनों बाद हुए चुनावों में सत्ताधारी दल का भी सफाया हो गया. इससे राष्ट्रीय और राज्य, दोनों स्तरों पर राजनैतिक वर्ग ने सबक सीखा कि ऐसी कठिन घड़ी में भी सामान्य रूप से कामकाज चलाने और ढुलमुल प्रशासनिक रवैये से काम नहीं चलेगा. इसका सबसे अच्छा उदाहरण राज्य सरकार है जिसने बिना कोई समय गंवाए और बिना केंद्र सरकार की ओर से किसी भी पहल का इंतजार किए, अक्सर आने वाली चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए आवश्यक अल्पावधि और दीर्घावधि तैयारियों के लिए सरकार के आने के कुछ ही महीनों के भीतर ओडिशा राज्य आपदा न्यूनीकरण प्राधिकरण (ओएसडीएमए) का गठन किया.

पंद्रह वर्षों के दौरान राज्य सरकार के प्रयासों के समानांतर, केंद्र सरकार ने भी 2005 में नया कानून आपदा प्रबंधन अधिनियम बनाया जिसके तहत अखिल भारतीय नीति और कार्यक्रम संबंधी समन्वय के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन एजेंसी (एनडीएमए) की स्थापना की गई. एनडीएमए ने कई अपूर्व प्रयास किए हैं. आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत सभी राज्यों के लिए राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों की स्थापना के निर्देश दिए गए. केंद्र सरकार ने भवन कानूनों में भी संशोधन किया है और राज्य सरकारों को भी ऐसा करने की सिफारिश की है. इससे तटों की रक्षा और बचाव उपायों के लिए तटीय क्षेत्र नियम-कानूनों में भी संशोधन किया गया.

इसने देशभर में डॉप्लर रडार प्रणाली का नेटवर्क स्थापित करने के साथ-साथ मौसम की चेतावनी देने/सूचनाओं के प्रसार के लिए सुपर कंप्यूटर कैलुकेलशन का आधुनिकीकरण भी किया. 1999 में ओडिशा सुपर-साइक्लोन के दौरान, मौसम विभाग से राज्य सरकार और जिला मजिस्ट्रेटों को नियमित रूप से प्रारंभिक चेतावनी दी गई थी. मौसम विभाग ने माना था कि राज्य और जिला प्रशासन इन चेतावनियों को स्थानीय समुदायों तक पहुंचाएंगे  लेकिन ऐसा नहीं हुआ और नतीजा विनाशकारी परिणामों के रूप में सामने आया.

उसके बाद केंद्र सरकार ने मंत्रालयों, कैबिनेट सचिवालय और पीएमओ स्तरों पर विभिन्न समितियों की स्थापना करके अपनी समन्वय प्रणाली में भी सुधार किया. इसमें सेना, अर्धसैनिक बल, वायु सेना और अन्य एजेंसियां जरूरत के मुताबिक योगदान करती हैं. दरअसल सूनामी के दौरान चेतावनी समय पर राज्य सरकार की मशीनरी तक नहीं पहुंच सकी थी. केंद्र ने गृह मंत्रालय में राष्ट्रीय केंद्र स्थापित किया, जो चेतावनी को स्थानीय स्तर पर पहुंचाने का काम करता है.

एनडीएमए ने चक्रवात हुदहुद के प्रभाव का अध्ययन करने के बाद विभिन्न क्षेत्रों में नीति और कार्यक्रम संबंधी एक सूची तैयार की थी. सिफारिशों पर एक नजर डालें तो पता चलता है कि तटीय राज्यों को अभी भी इस दिशा में बहुत कुछ करना शेष है.

फेलिन और फणि के दौरान हताहतों की संख्या को कम से कम करने की वजह से भारत के आपदा प्रबंधन के उपायों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना हुई है. हालांकि, मरने वालों की संख्या में कमी लाने में सफलता और लोगों तक तत्काल राहत पहुंचाने की क्षमता का विस्तार कहानी का केवल एक हिस्सा है. पुनर्निर्माण और पुनर्वास के प्रयास आने वाले हफ्तों में क्षति के आकलन के बाद शुरू होंगे. संसाधन की कमी वास्तव में लोगों और राज्य सरकार, दोनों को बहुत पीड़ा देगी. आपदा जोखिम बीमा अभी लोगों के बीच अपनी जड़ें जमा ही रहा है और वित्तीय संसाधन हमेशा ही संसाधनों की कमी वाले राज्यों और राष्ट्रीय सरकार, दोनों के लिए सीमित होते हैं. इसलिए जोखिम सिद्धांत रूप में और व्यवहार रूप में बदस्तूर बने रहेंगे. फिर भी लगातार सुधार जारी है, यही संतोष है.

लेखक वरिष्ठ आइएएस अधिकारी हैं और यूएनडीपी और डब्ल्यूएचओ में भी काम कर चुके हैं. ये उनके निजी विचार हैं

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