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'कमजोर समुदायों की महिलाएं सिर्फ जाति प्रथा ही नहीं शासन तंत्र की भी शिकार हैं'

कमजोर समुदायों की पीड़ित महिलाएं सिर्फ जाति प्रथा की नहीं बल्कि शासन तंत्र की भी शिकार हैं. हिंदू पुरुष के हाथ में बलात्कार एक घातक और घिनौना हथियार हो गया है.

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मीना कंडासामीउत्तर प्रदेश, 16 June 2014
'कमजोर समुदायों की महिलाएं सिर्फ जाति प्रथा ही नहीं शासन तंत्र की भी शिकार हैं'

बदायूं और भगाना में नाबालिग दलित लड़कियों के साथ बलात्कार हमें न सिर्फ यह याद दिलाता है कि यौन हिंसा और जातीय अत्याचार का मेल कितना भयावह हो सकता है, बल्कि आरोपियों को संरक्षण देने वाले शासन तंत्र का असली चेहरा भी बेनकाब कर देता है. यदि जाति प्रथा आज हमारे बीच फुफकारते दैत्य की तरह मौजूद है, तो हमें यह समझना होगा कि इस दैत्य को जितनी खुराक सामंती सोच, हिंसक आक्रामकता, ताकतवर जातियों की दबंगई और पुरुष प्रधान व्यवस्था से मिली है, उतना ही संबल पुलिस, राजनैतिक व्यवस्था और नजरें फेर लेने वाले मुख्य धारा के मीडिया से मिला है.
 
बदायूं सामूहिक बलात्कार की जो पहली खबर मैंने पढ़ी, उससे लगा कि  ‘‘लड़कियों ने खुद फांसी लगा ली.’’ उसमें बदायूं के पुलिस अधीक्षक अतुल सक्सेना का बयान था, ‘‘रिपोर्ट से लगता है कि मरने से पहले पेड़ से लटकाया गया यानी लड़कियों ने शायद आत्महत्या की है.’’ हमारे तमाशबीन समाज में पुलिस प्रमुख ने इस नृशंस अपराध का जो दृश्य खींचा था वह सचाई के एकदम विपरीत था. लड़कियों की गर्दनों में जब फंदे कसे गए, तब वे जिंदा थीं. हां, अब हम यह भी जानते हैं कि पुलिस ने गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखने से मना कर दिया, पीड़ित लड़कियों के माता-पिता को न्याय पाने के अधिकार से वंचित कर दिया और आरोपियों को पनाह देने की पूरी कोशिश की.

लेकिन मैं इस शुरुआती रिपोर्ट का हवाला देकर इस बात की तरफ इशारा करना चाहती हूं कि पुलिस, खासकर दलितों के साथ, कमजोरों के साथ हिंसा के मामलों में कैसी बेरुखी से पेश आती है. जब किसी दलित की हत्या होती है, तो पुलिस हमेशा प्राथमिकी दर्ज करने से इनकार करती है, फिर जब किसी जमीनी संगठन का दबाव पड़ता है, तो भारतीय दंड संहिता की हत्या संबंधी धारा 302 लगाने की बजाए संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु संबंधी धारा 174 के अंतर्गत केस दर्ज करती है. उत्तर भारत से ऐसी खबरें भले ही अभी कुछ दिन पहले से मिलने लगी हों, लेकिन 15 साल पहले भी तमिलनाडु में विदुथलाई चिरुथइगल से भीषण चीत्कार सुनाई दी थी. 1999-2000 में चिदंबरम-वृद्धाचलम क्षेत्र में 19 दलितों की हत्या हुई थी. इनमें 7 महिलाएं थीं और उन सब के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ था. फिर भी सिर्फ 7 मामलों में हत्या की धारा 302 लगाई गई थी.

यौन हिंसा की कड़ी से कड़ी निंदा करना आसान है, लेकिन हमें समझना चाहिए कि जब तक हम दमनकारी जाति प्रथा को जड़ से नहीं उखाड़ेंगे और जाति तथा सांप्रदायिक शक्तियों के साथ ताकतवर परजीवी संबंध बना चुके शासन के  ढांचे को चुनौती नहीं देंगे तब तक बलात्कार से लड़ाई में कोई कामयाबी हासिल नहीं कर पाएंगे.

बदायूं की ताजा घटना में एआइडीडब्ल्यूए की जांच रिपोर्ट से जाहिर हो जाता है कि सारे आरोपी यादव हैं और मुलायम सिंह यादव के इन ताजा बयानों से उनके आक्रामक हौसले और बुलंद हो गए कि, ‘‘लड़कों से गलतियां हो जाती हैं.’’ महिलाओं के साथ हिंसा पर जाति प्रथा के प्रभाव को अलग कर पाना नामुमकिन है. जिन लोगों को इस सहज गठजोड़ पर भरोसा नहीं है, उन्हें याद रखना चाहिए कि जातिप्रथा का यही दानव इज्जत के नाम पर हिंदू लड़कियों को निगल जाता है. हिंदू जातियों के मर्द अपनी जाति की महिलाओं की देह को अपनी मिल्कियत समझते हैं (ये महिलाएं सिर्फ अपनी जाति के मर्दों से शादी कर सकती हैं और जो अपनी जाति से बाहर या उससे नीचे का साथी ढूंढ़कर नियम तोड़ती हैं तो उन्हें हमेशा सजा /मौत मिलती है). हिंदू जाति के मर्द दलित पुरुषों (देश में आज सबसे बेरहमी से शोषित मजदूर वर्ग) और दलित महिलाओं की देह (जिनका न सिर्फ वर्ग के रूप में शोषण होता है बल्कि जो यौन हिंसा की शिकार भी होती हैं) पर भी अपना हक समझते हैं.

बलात्कार, एक मर्दाना हक है और इसीलिए यह हिंदू जाति के मर्दों के हाथ में युद्ध का खतरनाक हथियार हो गया है. वे उस व्यवस्था को जारी रखने के लिए यौन उत्पीडऩ और हिंसा का सहारा लेते हैं, जो उनका दबदबा बनाए रखती है.

जो लोग जाति प्रथा और बलात्कार की संस्कृति के इन दोनों कारणों से सहमत हैं, उन्हें भी इस आतंक को जारी रखने में भारत के शासन तंत्र की भूमिका का यकीन दिलाने के लिए बड़ी मेहनत करनी पड़ती है. एक और मुद्दा शौचालयों के अभाव का है, जिस पर कम से कम पश्चिमी मीडिया में अंतहीन चर्चा हुई है. इस मांग के बारे में कोई दो राय नहीं हो सकती. लेकिन हमें यह भी समझ लेना चाहिए कि भारत में स्वच्छता सुविधाओं की स्थिति चाहे कितनी ही बुरी क्यों न हो और उसे तत्काल सुधारना कितना भी जरूरी क्यों न हो, यह नहीं कहा जा सकता कि शौचालय बन जाने से जाति प्रथा के कट्टर समर्थक और नफ रत के लायक बलात्कारी अपनी हरकतों से बाज आ जाएंगे. जब तक उन्हें यकीन रहेगा कि उन्हें अपनी हरकतों का कोई खामियाजा नहीं भुगतना पड़ेगा, तब तक वे वार करते रहेंगे. शौचालय की सुविधा न होने से सिर्फ शासन की बेरुखी और भारत में सबसे गरीब लोगों का सोच-समझकर संहार किए जाने की चाल की पोल खुलती है.

हरियाणा में भगाना से आए 100 परिवार पिछले दो महीने से दिल्ली में जंतर-मंतर पर उस घटना का विरोध कर रहे थे, जिसमें जाटों ने चार नाबालिग दलित लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार किया था. दिल्ली पुलिस ने चार जून को इन्हें जंतर-मंतर से भगा दिया. इससे न सिर्फ वे न्याय पाने से वंचित हुए, बल्कि विरोध दर्ज करने का उनका नैतिक अधिकार भी छिन गया. यह बलात्कार की घटनाओं का अकेला ऐसा उदाहरण नहीं है, जिसमें दलितों को न्याय से वंचित किया गया है. 1968 में किलवेनमनी में 44 दलितों की हत्या हुई थी पर मद्रास हाइकोर्ट ने सभी आरोपियों को सबूत के अभाव में छोड़ दिया. पटना हाइकोर्ट ने बथानी टोला हत्याकांड में (1996 में 21 दलितों की हत्या) और लक्ष्मणपुर बाथे हत्याकांड (1997 में 58 दलितों की हत्या) के सभी आरोपियों को छोड़ दिया. इन शर्मनाक फैसलों की कड़ी में ताजा मिसाल 1991 का सुंदर हत्याकांड है, जिसमें दो माह पहले आंध्र प्रदेश हाइकोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया. जब दलितों का सोच-समझकर बलात्कार हो रहा है, उनकी हत्याएं हो रही हैं, तब भी अदालतें न्याय देने की बजाए अपराधियों को उनके जातीय दबदबे और राजनैतिक संपर्कों के कारण संरक्षण दे रही हैं. इससे पता चलता है कि जाति प्रथा शासन तंत्र की नस-नस में समाई है.

न्यायपालिका का रुख भी बदायूं के अक्खड़ पुलिस वाले जैसा है. जो आरोपी को सलाह देता है, ‘‘जेल में बलात्कारियों के साथ बुरा सलूक होता है लेकिन हत्यारों को दिक्कत नहीं आती. इन लड़कियों को खत्म कर दो.’’ ये सब, समाज में जड़ें जमाई बैठी उस व्यवस्था के अंग हैं, जो जातीय दबदबे और दबंग जातियों के आतंक फैलाने के अधिकार को मान्यता देती है. इस मामले में एक बार फिर यही प्रवृत्तियां सिर उठाकर सामने आई हैं.

हमें याद रखना होगा कि बदायूं और भगाना की लड़कियां सिर्फ  जाति प्रथा और बलात्कार की संस्कृति की ही नहीं, बल्कि इस शर्मनाक हरकत को शह देने वाले शासन तंत्र की भी शिकार हैं. हमें यह भी याद रखना होगा कि अगर हम बलात्कारी राष्ट्र नहीं कहलाना चाहते, तो इस कलंक को जिंदा रखने वाली इन तमाम ताकतों से लोहा लेना होगा.

मीना कंडासामीमीना कंडासामी कवयित्री, सामाजिक कार्यकर्ता और द जिप्सी गॉडेस उपन्यास की लेखिका हैं

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