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मेहमान का पन्ना-निजता हनन का आधार फिर से तैयार

नया आधार बिल सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को खत्म कर देता है और निजी खिलाडिय़ों द्वारा आंकड़ों के उपयोग की गुंजाइश बनाकर, निजता के मौलिक अधिकार पर प्रहार करता है

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सुहरिथ पार्थसारथीनई दिल्ली, 07 August 2019
मेहमान का पन्ना-निजता हनन का आधार फिर से तैयार सुहरिथ पार्थसारथी

आधार और अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2019 पर बहस के बाद राज्यसभा में 8 जुलाई को जवाब देते हुए, केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों द्वारा 'कठोर शब्दों' के उपयोग पर अपनी आपत्ति व्यक्त की. वे न्यायमूर्ति के.एस. पुट्टास्वामी (सेवानिवृत्त) बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के फैसले में न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ की असहमति के स्वर पर अपनी राय व्यक्त कर रहे थे. एक ओर जहां सुप्रीम कोर्ट ने आधार अधिनियम, 2016 को सशर्त अनुमति दी थी, वहीं न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने अपनी राय में, इस कानून को पूरी तरह से रद्द करने की बात कही थी. उनकी नजर में, सरकार का आधार विधेयक को धन विधेयक के रूप में और राज्यसभा की मंजूरी के बिना इसे अधिनियमित करना, 'संविधान के साथ धोखाधड़ी' करने सरीखा था.

लेकिन इतनी कठोर टिप्पणी भी सरकार को नए सिरे से आलोचना करने से शायद ही रोक पाई. संशोधन विधेयक के माध्यम से, जिसे अब संसद के दोनों सदनों ने पारित कर दिया है, सरकार ने जोड़-तोड़ की एक नई परंपरा को रास्ता दिखाया है. विधेयक को राष्ट्रपति की सहमति का इंतजार है,  जिस पर वे निश्चित रूप से सहमति दे भी देंगे. यह विधेयक बहुत-सी नई समस्याओं को जन्म देने वाला है. उनमें से मुख्य है कल्याण योजनाओं के दायरे से उन लोगों को बाहर रखे जाने पर चुप्पी जिनके पास आधार नंबर नहीं है. जो आधार आधारित पहचान देने में विफल रहते हैं उनकी पहचान के वैकल्पिक साधन प्रदान करने के लिए कार्यपालिका को शक्ति प्रदान करते हुए यह विधेयक विधायी प्रक्रियाओं को आमंत्रण देता है. ऐसा करते हुए यह जीवन के अधिकार के संविधान के वादे को पूरी तरह से परिवर्तनीय मानता है.

आधार के निजी उपयोग को फिर से मान्य करने के प्रयास से समस्या बढ़ी है. अपने मूल रूप में, धारा 57 के जरिए कानून, राज्य और निजी संस्थाओं को एक व्यक्ति की पहचान स्थापित करने के लिए आधार संरचना का उपयोग करने की अनुमति देता है. पुट्टस्वामी में, सुप्रीम कोर्ट को इस तरह के उपयोग की अनुमति देने के खतरों का आभास था और आधार अधिनियम के अन्य भागों को बरकरार रखते हुए भी उसने सर्वसम्मति से धारा 57 को असंवैधानिक घोषित किया था. न्यायमूर्ति ए.के. सीकरी ने लिखा, ''भले ही हम मानते हैं कि विधायिका का ऐसा इरादा नहीं फिर भी (धारा 57) का प्रभाव ऐसा होगा जिससे निजी संस्थाओं को एक व्यक्ति की बायोमीट्रिक और जनसांख्यिकीय जानकारी के व्यावसायिक इस्तेमाल का मौका मिल जाएगा.'' अदालत ने महसूस किया, इस तरह के उपयोग की अनुमति देने में, यह कानून सीधे इन व्यक्तियों की गोपनीयता का उल्लंघन करेगा.

नया प्रस्तावित संशोधन अदालत के इस निष्कर्ष को मानने से इनकार करता है. यह कहता भले ही इसे 'स्वैच्छिक' है लेकिन व्यावहारिक रूप से नागरिकता पर आधार को थोपने का काम करता है. इसका गहराई से विश्लेषण करने पर सरकारी दावे की सचाई स्पष्ट हो जाती है. नए विधेयक में, जो जल्द ही कानून बन जाएगा, आधार देखने में तो 'स्वैच्छिक' लगता है क्योंकि इसमें निजी कंपनियों को पहचान सत्यापित करने के लिए इसके उपयोग से पहले उपभोक्ता की 'सहमति' लेने की आवश्यकता होती है.

लेकिन इसके साथ, यह विधेयक टेलीग्राफ अधिनियम जो मोबाइल फोन ऑपरेटरों पर लागू होता है और धन शोधन निवारण अधिनियम, जो बैंकों पर लागू होता है, दोनों में संशोधन करके आधार को एक 'केवाईसी' दस्तावेज के रूप में उपयोग करने की अनुमति देता है. पासपोर्ट ही केवल एक अन्य दस्तावेज है जिसका उपयोग अब अपनी पहचान स्थापित करने के लिए किया जा सकता है. इसमें हम उन दस्तावेजों को नहीं गिन रहे हैं जिन्हें भविष्य में सरकार अधिसूचित कर सकती है. इस प्रकार आधार को व्यावहारिक रूप से अनिवार्य बनाने से डेटा की गोपनीयता के उल्लंघन का जोखिम बढ़ता है, एक ऐसा जोखिम जो केवल स्वतंत्र नियामक नियंत्रण की कमी से बढ़ेगा और यह सचाई है कि हमारे पास अभी भी कोई डेटा सुरक्षा कानून नहीं है.

धारा 57 पर सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया को देखते हुए यह वचन दिया गया था कि इस मंच का उपयोग व्यावसायिक शोषण के रास्ते खोलने के लिए नहीं करने दिया जाएगा और सरकार ने यह विश्वास भी दिलाया था कि आधार को अनिवार्य नहीं किया जाएगा, नया संशोधन इसे संवैधानिक रूप से चुनौती दिए जाने के दरवाजे खोल देता है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अवहेलना करने और धारा 57 को व्यवहारिक रूप में नए तरीके से फिर से लागू करने की कोशिश, निजता के उस अधिकार की गारंटी पर प्रहार है जिसे अब मौलिक अधिकार माना गया है. इसके साथ ही आधार नहीं होने के कारण सरकारी योजनाओं के दायरे से बाहर रह जाने वाले लोगों को भी उसके दायरे में लाने से जुड़े व्यवहारिक प्रावधानों का अभाव, इस भावी कानून को फिर से सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दिए जाने के पर्याप्त आधार देता है.

सुहरिथ पार्थसारथी मद्रास हाइकोर्ट में वकालत करते हैं

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