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नजरियाः सरकार का रुख तो सौतेला

अदूरदर्शी नीतियों के कारण बच्चों को पोषण संबंधी सुविधाओं पर ग्रहण

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aajtak.in
रीतिका खेड़ानई दिल्ली, 22 January 2020
नजरियाः  सरकार का रुख तो सौतेला इलस्ट्रेशनः सिद्धांत जुमडे

रीतिका खेड़ा/ नजरिया

हर साल वैश्विक भूख सूचकांक (जीएचआइ) रिपोर्ट के जारी होने पर पोषण के मामले में भारत का निराशाजनक प्रदर्शन दो दिनों तक सुर्खियों में रहता ही है. इस साल भी ऐसा ही हुआ. मीडिया के कुछ हलके में भारत के नीचे फिसलने पर स्यापा मचा और सुर्खियां तो ये बनीं कि पाकिस्तान से भी बदतर साबित हुआ!

लेकिन उनका ध्यान दो अहम विषयों की ओर नहीं गया. एक, जीएचआइ की तुलना शायद ही कभी सालाना आधार पर की जाती है और दूसरा, जीएचआइ संबंधी भूख और पोषण के कुल चार संकेतकों में खाद्य और कृषि संगठन की ओर से शामिल 'कैलोरी खपत' पैमाना भी शामिल है, जो सही नहीं, क्योंकि इससे खाद्य आपूर्ति के संकेतक कैलोरी सेवन का संकेत देते हैं. इसी कारण सरकार को भूख सूचकांक के नतीजों को खारिज करने का मौका मिल जाता है. दरअसल, जीएचआइ पर ध्यान केंद्रित करने से पोषण हाशिए पर चला जाता है, जहां सुधार की गति बहुत धीमी है.

यूनिसेफ के व्यापक राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण में प्रमुख संकेतकों में मामूली बदलाव ही दिखता है. 2016-18 के दौरान करीब एक-तिहाई भारतीय बच्चे बेहद कमजोर पाए गए, यही अनुपात कम वजन वाले बच्चों का भी था. यूनिसेफ पोषण परिणामों को मापता है, कैलोरी खपत की तुलना में शारीरिक विकास संबंधी ये संकेतक ज्यादा मायने रखते हैं.

आखिर अच्छी जीडीपी विकास दर के बावजूद इन संकेतकों में सुधार की गति इतनी निधि क्यों है?  वजह है नीतिगत उपेक्षा. बजटीय नीधि कम है, फिर सरकार इस बात को समझने में दिलचस्पी नहीं लेती कि अपर्याप्त पोषण का असर पीढिय़ों तक रहता है और नवजात शिशु के शुरुआती हजार दिनों (मां के गर्भ धारण से लेकर जन्म लेने के बाद) में उसे विशेष देखभाल की जरूरत होती है. इस श्रेणी में आने वाली माता- शिशु को ध्यान में रखकर कई सरकारी योजनाएं बनाई गई हैं जैसे मातृत्व लाभ योजना और छह साल के बच्चों, गर्भवती तथा दुग्धपान कराने वाली माताओं के लिए समेकित बाल विकास सेवा योजना. हाल के वर्षों में इन दोनों योजनाओं की स्थिति बहुत खराब रही.

आंगनवाड़ी भोजन सूची में अंडे को शामिल करने के पीछे विचार यह था कि अंडा पोषक तत्वों से भरपूर एक 'सुपर फूड' है और ग्रामीण इलाकों में जहां कोल्ड स्टोरेज की सुविधा नहीं होती, वहां भी इसे उपलब्ध कराना आसान है. इसके अलावा दूध और दाल की तरह इसे पानी मिलाकर पतला नहीं किया जा सकता. झारखंड की आंगनवाडिय़ों में वर्तमान सरकार ने अंडे भेजना शुरू किया, लेकिन पिछले कुछ महीनों से बिना कोई कारण बताए अंडे की आपूर्ति रोक दी गई है और इसकी कोई गारंटी नहीं कि यह फिर शुरू भी हो पाएगी.

अन्य राज्यों, खास तौर पर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में ऊंची जाति की शाकाहारी जमात आंगनवाडिय़ों में अंडों की आपूर्ति के सख्त खिलाफ रही है. पिछले एक दशक के दौरान जब भी बच्चों, गर्भवती और दुग्धपान कराने वाली महिलाओं को अंडे उपलब्ध कराने का प्रस्ताव आया, इसी गुट के दबाव में आकर राज्य सरकार ने इसे खारिज कर दिया. हाल ही में जब महिला और बाल विकास मंत्री ने पोषण की चिंताजनक स्थिति के मद्देनजर मध्य प्रदेश में बच्चों और गर्भवती और दुग्धपान कराने वाली महिलाओं को अंडे उपलब्ध कराने की मंशा जाहिर की तो एक भाजपा नेता ने यहां तक कह दिया कि अंडे खाकर बड़े होने वाले बच्चे आगे चलकर आदमखोर बन जाएंगे. राहत की बात है कि मौजूदा मुख्यमंत्री की सोच ऐसी नहीं है और उन्होंने घोषणा की है कि 1 अप्रैल, 2020 से सप्ताह में तीन बार अंडे भेजे जाएंगे.

एक और विषय गंभीर उपेक्षा का शिकार है—मातृत्व लाभ. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम ने 2013 में पहली बार सबको मातृत्व लाभ उपलब्ध कराना जरूरी समझा. इस अधिनियम के तहत असंगठित क्षेत्र की महिलाओं को प्रति शिशु 6,000 रुपए दिए जाते हैं, (जैसे संगठित क्षेत्र की महिलाओं को गर्भ धारण पर 26 सप्ताह की छुट्टी मिलती है और उस अवधि में उनकी तनख्वाह से पैसे नहीं कटते.) इस वैधानिक पात्रता को अमल में लाने के लिए वर्ष 2017 में जब प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना शुरू की गई तो लाभ को मनमाने तरीके से घटाकर 5,000 रुपए कर दिया गया और वह भी सिर्फ पहले शिशु के लिए और यह राशि भी तीन किस्तों में दी जाती है. हाल ही में एक आरटीआइ से पता चला कि 2018-19 में इस योजना का लाभ केवल 12 फीसदी गर्भवतियों तक पहुंचा.

शिशु पोषण के नाम पर किए जा रहे उपायों से कोई राहत नहीं मिली है. कई राज्य आज भी आंगनवाडिय़ों में बच्चों के नाम दर्ज कराने के लिए 'आधार' मांगते हैं जो सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का खुला उल्लंघन है. इससे कितने ही जरूरतमंद बच्चों को टीकाकरण और स्कूल जाने से पहले की उम्र में मिलने वाली सुविधाओं का फायदा नहीं मिलता.

असम में राज्य सरकार ने लोकप्रिय मिड-डे मील कार्यक्रम में बेवजह अड़चनें पैदा कर दीं. हाल ही में केंद्र सरकार ने ग्रामीण इलाकों में भी मिल-डे मील की आपूर्ति के लिए केंद्रीकृत रसोई की ही अनुमति दी थी. केंद्रीकृत रसोइयों (गैर-लाभकारी समूहों की चलाई जा रही रसोइयां भी) पर नजर रखना शिक्षकों और अभिभावकों के लिए मुश्किल है और इससे कोई जिम्मेदारी उठाना नहीं चाहता. हालांकि ग्रामीण इलाकों में केंद्रीकृत रसोई की कोई जरूरत नहीं, क्योंकि इससे लागत भी बढ़ेगी और भोजन भी खराब हो सकता है. फिर भी, असम सरकार ने शैक्षणिक सत्र के बीच में ही एक एनजीओ की केंद्रीय रसोई से स्कूलों को खाने की आपूर्ति की व्यवस्था कर दी. फिर वही हुआ जिसका डर था. चंद दिनों के अंदर ही 500 से अधिक बच्चों की भोजन के बाद तबीयत खराब होने से अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा.

हम अक्सर यह सुनते हैं, ''बच्चे तो साझे होते हैं.'' अफसोस कि हमारे नीति निर्माता इस बात को नहीं समझते.

लेखिका विकास अर्थशास्त्री हैं और अहमदाबाद आइआइएम में पढ़ाती हैं

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