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विपक्षः सामूहिक अपराध-बोध और प्रतिशोध

मैं समझता हूं कि इससे हमें झूठे सामूहिक नियंत्रण का अनुभव होता है कि हम अपने इर्द-गिर्द हो रही बेरोकटोक हिंसा का जवाब दे सकते हैं. हम असंयत यौन हिंसा से भरे समाज में रहने के सामूहिक अपराध-बोध को छिपाने के लिए उतावले हैं.

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aajtak.in
अनूप सुरेंद्रनाथनई दिल्ली, 04 February 2020
विपक्षः सामूहिक अपराध-बोध और प्रतिशोध अनूप सुरेंद्रनाथ

अनूप सुरेंद्रनाथ

इस स्तंभ को पढऩे वालों में एक बड़े हिस्से का नजरिया शायद यह होगा कि मुकेश कुमार सिंह, पवन गुप्ता, विनय शर्मा और अक्षय कुमार सिंह को 2012 के दिल्ली सामूहिक बलात्कार कांड के लिए शर्तिया फांसी दी जानी चाहिए. उन्हें लग सकता है कि मृत्युदंड के लिए इससे उपयुक्त मामला भला और क्या हो सकता है. अखबारों या टीवी के परदे पर जब भी वे इन चार नामों को देखते-सुनते होंगे तो उनका मन वितृष्णा, क्षोभ और क्रोध से भर जाता होगा. यही नहीं, वे जब आशा देवी और बद्रीनाथ सिंह को अपनी बेटी की मृत्यु के बारे में न्याय पाने की कोशिश में तकलीफें उठाते देखते होंगे तो वे सच्ची और गहरी पीड़ा के भाव से भर जाते होंगे. 

चरमराते अपराध न्याय तंत्र के मद्देनजर फांसी और 2019 में हैदराबाद बलात्कार-हत्या मामले के आरोपियों को ताबड़तोड़ ठिकाने लगाने की गैर-कानूनी वारदात लोगों में राहत और आत्मविश्वास का भाव जगाती हैं. मैं समझता हूं कि इससे हमें झूठे सामूहिक नियंत्रण का अनुभव होता है कि हम अपने इर्द-गिर्द हो रही बेरोकटोक हिंसा का जवाब दे सकते हैं. हम असंयत यौन हिंसा से भरे समाज में रहने के सामूहिक अपराध-बोध को छिपाने के लिए उतावले हैं.

अपने मन की गहराइयों में हम जान रहे होते हैं कि मुकेश, पवन, विनय और अक्षय को फांसी देने से हमारे समाज में यौन हिंसा घटने वाली नहीं है. हम यह भी जानते हैं कि सामान्यत: जिन कारणों से यौन हिंसा होती है, वे हमारे घरों में, हमारे कार्यस्थलों पर, हमारे निजी और सामाजिक संबंधों में और हमारे मनोरंजन में भी मौजूद होते हैं. फिर भी, हम अपने आप को समझाते हैं कि यौन हिंसा के सभी अपराधियों को कैद कर लेने या मार देने से ही रक्षा हो सकती है. 

मुकेश, पवन, विनय, और अक्षय को फांसी पर लटकाने की लोगों की मांग का संबंध सामूहिक बदले से है. उस रात हुए अपराध हमारी अपनी सामाजिक असफलताओं को आईना दिखाते हैं, वे डरावनी असफलताएं जिन्हें हम स्वीकारना भी नहीं चाहते. इसलिए हम चारों आरोपियों का दानवीकरण करते हैं ताकि उन्हें इतना बुरा दिखाया जा सके कि लगे कि वे हमारे ही बीच के नहीं हैं. इस तरह हम अपने आप को दोषमुक्त करने की कोशिश रहे होते हैं. हममें से कोई भी उस दुख या न्याय पाने की तीव्र निराशा की थाह नहीं ले सकता, जिसे आशा देवी और बद्रीनाथ सिंह ने पिछले सात साल में सहा है. लेकिन, जब हम मुकेश, पवन, विनय और अक्षय को फांसी दिए जाने की चाहत रखते हैं तो बतौर समाज हम छल-छद्म कर रहे होते हैं.

ऐसा करते हुए हम पीडि़ता के माता-पिता के अकल्पनीय दुखों की आड़ ले रहे होते हैं. राज्य या समाज के रूप में अपनी असफलताओं को छिपाने के लिए हम उनकी पीड़ा को ओढ़ कर ऐसा दिखावा नहीं कर सकते कि हम उनके पक्ष में पैरवी कर रहे हैं. समाज में अपराध कोई शुद्ध वैयक्तिक परिघटना नहीं है; अपराध तब होता है जब वैयक्तिक कारकों की विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनैतिक सचाइयों से अंतर्क्रिया होती है. इसमें, अपराध के शिकार और अपराधी, दोनों ही, राज्य और समाज की असफलताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं. अपराध के शिकार के पक्ष में होने का आभास देते हुए कठोरतम संभव दंड की मांग करके राज्य अपने उत्तरदायित्व से बचने का आसान रास्ता पकड़ रहा है. 

अगर हम देखना चाहें तो बहुत सारा नारीवादी शोध कार्य उपलब्ध है जो बताता है कि यौन अपराध दंड की कठोरता से नहीं बल्कि दंड की शर्तिया व्यवस्था से रुकेंगे. हमें जरूरत है बेहतर पुलिस व्यवस्था की, सामाजिक सुरक्षा की, आधुनिक और वैज्ञानिक जांच की, पीडि़तों की अर्थवान सहायता तथा संरक्षा की तथा अनेक अन्य उपायों की. शायद यही समय है कि हम खुली सामाजिक चर्चा करके स्वीकार करें कि दिल्ली सामूहिक बलात्कार कांड जैसी घटनाओं पर हमारी प्रतिक्रिया सामूहिक बदला लेने की भावना से संचालित है. यौन हिंसा के लिए मृत्युदंड राजनैतिक रूप से सुविधाजनक होने के साथ ही उस कठिन काम से ध्यान भटकाने वाला भी है जिसे किए जाने की जरूरत है.  

अनूप सुरेंद्रनाथ राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, दिल्ली में प्रोजेक्ट 39ए के कार्यकारी निदेशक हैं.

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