एडवांस्ड सर्च

क्यों न साफ कर दिए जाएं ईवीएम पर उठे अंदेशे

आयोग के लिए जरूरी है कि वाजिब अंदेशों पर बिंदुवार स्पष्टीकरण देकर तस्वीर साफ करे

Advertisement
aajtak.in
संध्या द्विवेदी नई दिल्ली, 13 June 2019
क्यों न साफ कर दिए जाएं ईवीएम पर उठे अंदेशे त्रिलोचन शास्त्री

ईवीएम चुनावी दौर का सदाबहार मुद्दा है. इस बार दो नए मुद्दे उभरकर आए. पहला चुनाव आयोग की वेबसाइट पर बताए गए कुल डाले गए वोटों और ईवीएम से मिले वोटों की तादाद में साफ तौर पर सामने आए फर्क का मुद्दा. उसके बाद आयोग ने स्पष्ट कर दिया कि वेबसाइट पर डाले गए आंकड़े अंतरिम थे और उनमें सुधार करके जल्दी ही अंतिम आंकड़े डाल दिए जाएंगे. दूसरा मुद्दा बड़ी तादाद में ईवीएम के 'गायब' हो जाने का है—यह जानकारी आरटीआइ के तहत पूछताछ से मिली. उम्मीद करनी चाहिए कि आयोग आने वाले दिनों में इस पर भी स्थिति स्पष्ट कर देगा.

चुनाव से पहले विपक्षी पार्टियों ने डाले गए वोटों के 50 फीसदी की वीवीपैट (या पेपर ट्रेल) तस्दीक की मांग की थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने नामंजूर कर दिया. विपक्षी दलों ने अपने अंदेशों को बहुत अच्छी तरह सामने नहीं रखा और आयोग को आखिरकार 5 फीसदी पेपर ट्रेल तस्दीक की इजाजत दे दी गई, वह भी बगैर यह बताए कि अगर ईवीएम और पेपर ट्रेल की गिनती में काफी फर्क सामने आता है तो क्या कदम उठाए जाएंगे. एक पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ने हाल ही में कहा कि मशीनों के साथ छेड़छाड़ की कोई आशंका नहीं है. मगर उन्होंने चुनाव आयोग को यह नसीहत नहीं दी कि वह तमाम शको-शुबहों को दूर करे.

दो-एक मुद्दों की पड़ताल करने की जरूरत है: मसलन, चुनावों में फर्जीवाड़े की आशंका. साजिश की थ्योरी हमारे देश में भरपूर हैं. ऐसी ही एक थ्योरी यह है कि छेड़छाड़ ईवीएम को रखते/लाते-ले जाते वक्त हुई. एक और थ्योरी यह है कि मतदान का वक्त खत्म होने के बाद शायद अतिरिक्त वोट डाले गए, क्योंकि कई लोग वोट डालने नहीं आए थे. 2019 के मतदान प्रतिशत के आंकड़ों से बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़े की कोई झलक नहीं मिलती—अगर यह सच होता तो मतदान का प्रतिशत शायद बहुत ज्यादा बढ़ गया होता, कम से कम कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में तो बढ़ ही गया होता.

सचाई चाहे जो हो इस मुद्दे पर तमाम शंका-आशंकाओं को विराम देना जरूरी है. दूसरा मुद्दा यह है कि अगर कोई भूल-चूक हुई हो तो किसी भी निर्वाचन क्षेत्र में उनका चुनाव के नतीजों पर असर पड़ेगा या नहीं. इसके लिए कानूनी उपाय है—मतगणना को लेकर अगर किसी को कोई शिकायत है, तो वह चुनाव याचिका दाखिल कर सकता है. अभी तक किसी ने ऐसा नहीं किया है, पर ऐसी याचिकाएं दाखिल करने के लिए अब भी कुछ हफ्तों का वक्त है.

यह अहम और जरूरी है कि चुनाव हारने वाली या चुनाव हारने की आशंका रखने वाली पार्टियां और उम्मीदवार किसी भी शरारत का संदेह होने पर—चाहे वह फर्जीवाड़ा हो या ईवीएम का गायब होना—मुद्दे को उठाएं या पेपर ट्रैल, पूरे वोटों की दोबारा गिनती, यहां तक कि दोबारा मतदान की मांग करें. विजेता जश्न मनाने में मशगूल हैं. कई शको-शुबहे जाहिर किए गए हैं और बदकिस्मती से उन शको-शुबहों पर हमारी प्रतिक्रियाओं से भी पूर्वाग्रह झांकते नजर आते हैं. जिन्होंने गद्दीनशीन पार्टी को वोट दिया है, वे इन संदेहों को सिरे से खारिज कर देते हैं. दूसरे पक्षों के लिए फर्जीवाड़े के सबूत मौजूद हैं. इन दो परिस्थितियों के बीच व्यवस्था में लोगों का भरोसा बहाल करना बेहद जरूरी है. और यह काम चुनाव आयोग बेहतर तरीके से कर सकता है.

सोशल मीडिया और फेक न्यूज के इस जमाने में अनेक किस्म के मैसेज चौतरफा मंडरा रहे हैं. वे सभी सटीक या तथ्यों पर आधारित नहीं हैं. मगर कुछ दिलचस्प सचाइयां हैं जो गौर करने लायक हो सकती हैं. तीन राज्यों—छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान—ने छह महीने से भी कम वक्त पहले दिया गया विधानसभा चुनावों का अपना फैसला नाटकीय तरीके से उलट दिया. कर्नाटक में दो उलट-पुलट हुए—विपक्ष ने मई 2018 में विधानसभा चुनाव जीते थे और एक साल बाद लोकसभा चुनाव में गद्दीनशीन पार्टी ने भारी तादाद में सीटें अपनी झोली में डाल लीं. मई के आखिर में हुए लोकसभा चुनाव से एक महीने बाद विपक्ष ने एक बार फिर म्युनिसिपल चुनाव जीत लिए. एक साल से भी कम वक्त में दो नाटकीय उलट-पुलट और एक उसके बाद एक महीने से भी कम वक्त में. इसके पीछे संभवत: वाजिब दलीलें मौजूद हैं.

मगर जिन्हें छेड़छाड़ का अंदेशा है, उनके मन में ये बदलाव और भी ज्यादा सवाल खड़े करते हैं. ऐसी हालत में चुनाव आयोग के लिए और भी जरूरी हो जाता है कि तमाम वाजिब संदेहों पर बिंदुवार स्पष्टीकरण देकर सामान्य तस्वीर साफ करे. अगर चुनाव के संचालन में वाकई कोई गड़बड़ी नहीं है, तो चुनाव आयोग की दलीलें शंका उठाने वाले आलोचकों का मुंह बंद कर देंगी, केवल अभी के लिए ही नहीं बल्कि आने वाले तमाम चुनावों के लिए भी. चुनावों को आखिरकार स्वतंत्र और निष्पक्ष दिखना भी चाहिए. भारत जैसे बड़े लोकतंत्र के लिए ऐसा करना बहुत जरूरी है.

त्रिलोचन शास्त्री एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के संस्थापक चेयरमैन और आइआइएम-बंगलौर में प्रोफेसर हैं

***

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay