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ऐसे तो शहर सत्यानाश हो जाएगा

दिल्ली की संरचना वृत्ताकार है और सेंट्रल विस्टा शहर के भौगोलिक केंद्र में स्थित है. अन्य महानगरों, जिनके केंद्र में आबादी का घनत्व सबसे अधिक है, के विपरीत दिल्ली का केंद्र हरा-भरा और खुला है.

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aajtak.in
aajtak.in नई दिल्ली, 27 September 2019
ऐसे तो शहर सत्यानाश हो जाएगा के.टी. रवींद्रन

के.टी. रवींद्रन

संसद परिसर और सेंट्रल विस्टा के पुनर्विकास की केंद्र्र सरकार की हालिया घोषणा ने पूरे भारत के पर्यावरण पेशेवरों को चौंका दिया. अभिरुचि की अभिव्यक्ति (एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट) के प्रकाशित दस्तावेज से ऐसा लगता होता है कि सरकार ने परियोजना पर गंभीरता से विचार नहीं किया है. तय की गई समय-सीमा असंभव प्रतीत होती है, काम की स्थितियां शहर को पूरी तरह से नजरअंदाज कर देती हैं और इसे केवल एक इंजीनियरिंग परियोजना की तरह समझा गया है, जबकि वास्तव में, इसके निहितार्थ दिल्ली के लिए कहीं अधिक जटिल और महत्वपूर्ण हैं. यह भारत में शहरीकरण प्रक्रिया जैसे बड़े मुद्दों पर भी सवाल खड़े करता है.

दिल्ली की संरचना वृत्ताकार है और सेंट्रल विस्टा शहर के भौगोलिक केंद्र में स्थित है. अन्य महानगरों, जिनके केंद्र में आबादी का घनत्व सबसे अधिक है, के विपरीत दिल्ली का केंद्र हरा-भरा और खुला है. यह वास्तव में अनोखी स्थिति है और हरित छवि भारत के लोगों के लिए एक 'राष्ट्रीय स्थान' का विचार गढऩे में योगदान करती है. 26 जनवरी की परेड जैसे आयोजन उस छवि को मजबूत करते हैं.

दिल्ली में ही, हजारों नागरिक इसे एकमात्र हरा फेफड़ा मानते हैं जहां वे अपने परिवार के लोगों के साथ घूमने जाना चाहते हैं. दिल्ली में आने वाला कोई भी पर्यटक बिना सेंट्रल विस्टा को देखे इस शहर से विदा नहीं होना चाहता. यह केवल अचल संपत्ति का एक टुकड़ा नहीं है, बल्कि भारत की राजधानी की मुख्य पहचान है.

सेंट्रल विस्टा दिल्ली मास्टर प्लान में अत्यधिक संरक्षित विशेष इलाका रहा है और इसके विकास संबंधी दिशानिर्देश तैयार करने से पहले विस्तृत शहरी डिजाइन के अध्ययन की आवश्यकता है. संसद भवन और रायसीना हिल की इमारतें एक संरक्षित क्षेत्र का हिस्सा हैं. सेंट्रल विस्टा कमेटी, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित हेरिटेज कंजर्वेशन कमेटी, दिल्ली अर्बन आर्ट कमिशन और साउथ दिल्ली म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन, ये सभी सेंट्रल विस्टा के प्रहरी हैं. यह प्रस्ताव 'ग्रेड-ए' भवनों के लिए मौजूदा विरासत संरक्षण नियमों का उल्लंघन करता है.

यह क्षेत्र व्यावहारिक रूप से दिल्ली का हरा फेफड़ा भी है. इस क्षेत्र में हजारों पूर्ण विकसित पेड़ खड़े हैं और उनकी किस्मत क्या होने वाली है, इसका कोई अंदाजा नहीं है. इस क्षेत्र के हरित मार्ग में केंद्रीय सचिवालय परिसर में एक भवन से दूसरे भवन के बीच पेड़ों के बीच से दूर-दूर तक रास्ते बने हैं. मीनार जैसी इमारतों, गुंबदों के बीच से पैदल मार्गों के मिले-जुले स्वरूप से ही इसकी छवि तैयार होती है. यहां तक कि इन परिसरों की दीवारें और द्वार अपने विरासत चरित्र से अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं.

ये प्रस्ताव तो इन सभी को एक अकल्पनीय इंजीनियरिंग निविदा प्रक्रिया में बदल देने की मंशा दिखाई देता है. दुनिया के कुछ सबसे प्रसिद्ध शहरी डिजाइनों में से एक समझा जाने वाला सेंट्रल विस्टा भी क्या भड़कीले गुडग़ांव या नोएडा के छोटे भाई जैसा बन जाएगा? शहर के मध्य में पार्किंग का भार बढ़ाना अपने आप में सबसे बड़ी नासमझी है.

सबसे महत्वपूर्ण पहलू जिस पर हमें पुनर्विचार की जरूरत है वह यह है कि सतत विकास लक्ष्यों और जलवायु परिवर्तन समझौते पर हमारा रुख क्या है. हम इस बात को गर्व के साथ कहते हैं कि भारत संयुक्त राष्ट्र की इन दोनों पहलों का एक हस्ताक्षरकर्ता रहा है, लेकिन नए सेंट्रल विस्टा प्रस्ताव में टिकाऊपन और जलवायु परिवर्तन के मुद्दों की अनदेखी हो रही है. हमारा अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण कुछ और है और धरातल पर हमारे काम कुछ और! बेशक, यह प्रशंसनीय है कि प्रशासनिक सुधारों के लिए आमूल-चूल परिवर्तन किए जा रहे हैं.

यह तथ्य कि आजादी के बाद से सांसदों की संख्या दोगुनी हो गई है, उस विषय पर भी निश्चित रूप से ध्यान देने की जरूरत है. लेकिन सीमेंट कंक्रीट की आयु 60-80 साल मानी जाती है जिसके बाद यह खराब हो जाता है. कंक्रीट की इमारतों के साथ अगले 150-200 वर्षों के लिए एक नई विरासत बनाने की इच्छा, एक और कपोल कल्पना है.

अगर दिल्ली के केंद्र में इस तरह की एक बहुत विशालकाय और जल्दबाजी में तैयार की गई परियोजना को लागू कर दिया जाए तो यह कितनी बड़ी चुनौती हो सकती है? जब इमारतों को ध्वस्त करके पुनर्निर्माण किया जा रहा होगा, तब कार्यरत मंत्रालय कहां जाएंगे? इस भारी निर्माण के परिणामस्वरूप निकले कचरे, धूल और अन्य विषाक्त पदार्थों का क्या? निर्माण के लिए पानी कहां से आएगा? इन मंत्रालयों तक आम लोगों की पहुंच, सुरक्षा और भंडारण प्रणालियों को किस प्रकार व्यवस्थित किया जाएगा? मुझे तो एक प्रशासनिक आतंक या सत्यानाश जैसी स्थिति दिखती है; एक परियोजना प्रबंधक का दु:स्वप्न शायद सच्चाई में बदलने वाला है!

जलवायु परिवर्तन और भारत की समग्र शहरी विरासत पर गंभीर पेशेवर परामर्श और दृष्टि जरूरी है.

—के.टी. रवींद्रन दिल्ली अर्बन आर्ट कमिशन के पूर्व चेयरमैन हैं

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