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नजरियाः सोने का अंडा देने वाली मुर्गी हलाल

रिजर्व बैंक की तीन विशेषज्ञ समितियों के नजरिये की उपेक्षा कर बजट में डिजिटल पेमेंट को मुफ्त करने का चौंकाने वाला ऐलान किया गया है.

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aajtak.in
aajtak.in नई दिल्ली, 04 September 2019
नजरियाः सोने का अंडा देने वाली मुर्गी हलाल प्रशांतो के. रॉय

नजरिया/ प्रशांतो के. रॉय

यह दिमाग चकरा देने वाली योजना है. ऐसी योजना जिसका कोई तर्क उनके पास भी नहीं है जो आधुनिक, राष्ट्रवादी और डिजिटल भारत की योजनाएं बनाने के उस्ताद हैं. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने पहले बजट में घोषणा की कि कम नकदी वाली अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए कुछ डेबिट कार्ड और अन्य डिजिटल भुगतानों पर से सभी तरह के शुल्क हटाए जाएंगे. दुकानदारों से लिया जाने वाला मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) शून्य कर दिया जाएगा.

एमडीआर वह शुल्क है जो कार्ड से भुगतान लेने वाले किसी व्यवसायी को देना पड़ता है—एक रुपया प्रति सैकड़ा या ऐसी ही किसी अन्य दर से. यह रुपया डिजिटल-भुगतान शृंखला में शामिल पक्षों के व्ययों की पूर्ति करता है. व्यवसायी को नकदी संभालने के झंझट से मुक्ति मिलती है और ऐसे ग्राहक भी मिलते हैं जो डिजिटल भुगतान पसंद करते हैं और आम तौर पर नकदी उपयोग करने वालों से ज्यादा खर्च करते हैं.

नया प्रस्ताव सभी रिटेल व्यवसायियों से यह कहने जैसा है कि अब से आप सारा सामान उसी कीमत पर बेचेंगे जिस पर आपने खरीदा. आप कोई लाभ नहीं ले सकते.

इस फैसले से अगर कुछ ही डेबिट कार्ड प्रभावित हो रहे हों, जैसे कि सरकार समर्थित रूपे, तब भी यह अन्य कार्ड के अस्तित्व के लिए संभावित खतरा हो सकते हैं. अगर केवल एक कार्ड को शुल्क से मुक्त किया जाता है, तो व्यापारी दूसरों को क्यों स्वीकार करेंगे? प्रतिस्पर्धा के लिहाज से यह और भी बुरा होगा अगर उन 'मुफ्त कार्ड' को करदाता के पैसे से सब्सिडी दी जाए. आज की तारीख में रु. 2,000 से कम के लेनदेन पर एमडीआर की प्रतिपूर्ति सरकार करती है.

पेमेंट्स काउंसिल ऑफ इंडिया का कहना है कि एमडीआर खत्म करना भुगतान प्राप्त करने वाले उद्योग के पतन का कारण बन जाएगा. यह वित्त मंत्रालय की 2016 की रतन वातल रिपोर्ट और 2019 में रिजर्व बैंक की नंदन नीलेकणि समिति की रिपोर्ट जैसी विशेषज्ञ समितियों की रिपोर्टों पर बिजली गिराने जैसा है.

मुफ्त में कोई काम नहीं होता—ऐसे में भुगतान नेटवर्क, कार्ड मशीन और इन संस्थाओं के कर्मचारियों के वेतन का भुगतान कौन करेगा?

इस सवाल का जवाब गोलमोल था. सुश्री सीतारमण ने कहा कि डिजिटल भुगतान के बढऩे से नकदी के रखरखाव पर होने वाले खर्च में बचत से बैंक और रिजर्व बैंक यह भुगतान करेंगे. महत्वपूर्ण समाचार यह है कि व्यवसाय राजस्व मॉडल पर चलते हैं, न कि लागत-बचत या दूसरों की गाड़ी चलाने वाले सहयोगी के रूप में. बड़ी बात यह भी है कि नकदी की भारी लागत का वहन तो करदाता करता है. ऐसे में अगर सरकार को, उदाहरणार्थ, 25 अरब डॉलर की बचत हो रही है, तो यह मुआवजा बैंकों या रिजर्व बैंक के बजाए उसे खुद क्यों नहीं देना चाहिए—वह भी तब जब रिजर्व बैंक से हाल में ही 25 अरब डालर ले लिए गए हैं?

बैंकों के खर्चे दिए गए कर्ज पर मिलने वाले ब्याज से चलते हैं. इसी तरह, एमडीआर से भुगतान नेटवर्क की लागत का भुगतान होता है. इस एमडीआर का बंटवारा अधिग्रहणकर्ता (जिसकी कार्ड मशीन विक्रयस्थल पर कार्ड स्वीकार करती है), जारीकर्ता (कार्ड जारी करने वाला बैंक) और नेटवर्क (वीजा, मास्टरकार्ड, रूपे) के बीच होता है. एमडीआर को खत्म करने का अर्थ है व्यापारी को धन (एमडीआर) का स्रोत न रहने देना. तो, भुगतान कौन करेगा? ग्राहक? ध्यान देने की बात है कि कुछ क्रेडिट कार्ड ग्राहकों से वार्षिक शुल्क लेते हैं— लेकिन रिजर्व बैंक के अनुसार दिसंबर 2018 में भारत में 95.8 करोड़ डेबिट कार्ड और सिर्फ 4.4 करोड़ क्रेडिट कार्ड थे.

बजट आने के बाद कई दिनों तक भुगतान नेटवर्क से जुड़े अधिशासी हैरान इधर-उधर भटक रहे थे, जैसे कि काटे जाने से पहले भटकते मुर्गे. वे पूछ रहे थे, यह सब किसने किया. रिजर्व बैंक ने जवाब दिया, हमने नहीं. बात सामने आने के बाद से रिजर्व बैंक और वित्त मंत्री के सामने यह मुद्दा उठाने वाला नेशनल पेमेंट्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (एनसीपीआइ) भी इसका दोषी नहीं है. ऐसे में लगता है, बुद्धिमानी की यह लहर वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग और वित्तीय सेवाओं के विभाग से आई है.

2018 में रिजर्व बैंक के डेटा लोकलाइजेशन समादेश सहित हाल में सामने आई कई दूसरी नीतियों की ही तरह इस बारे में भी किसी के साथ कोई परामर्श नहीं किया गया था.

सरकार के आतंक का इस बात से अनुमान लगाया जा सकता है कि वीजा और कुछ अन्य को छोड़कर ज्यादातर बैंकों ने इस बारे में चूं तक नहीं की है. केवल चार भारतीय बैंकों ने रिजर्व बैंक और सरकार के सामने इस मुद्दे को उठाया है. बहुराष्ट्रीय बैंक 'इंतजार करो और देखो' की नीति पर चल रहे हैं. आर्थिक मंदी में राजस्व की कमी के दौरान डिजिटल भुगतान उस मुर्गी जैसे साबित हो सकते हैं जो समानांतर अर्थव्यवस्था को खत्म करते हुए टैक्स रूपी सोने के अंडे देती हो. इसीलिए इस मुर्गी का उत्पीडऩ करने या मारने वाली किसी हरकत को उतावलापन और बहुत उतावलापन ही कहा जा सकता है.

लेखक तकनीकी विषयों के लेखक और नीति सलाहकार हैं.

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