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मृत्युदंडः पक्ष फांसी क्यों नहीं?

मृत्युदंड हमारे समाज में तकरीबन 4,000 साल से मौजूद रहा है. आरंभिक काल में तो यह रोटी के एक टुकड़े की चोरी जैसे छोटे अपराधों से लेकर किसी गुलाम को मुक्त करने या अवैध संबंधों तक के लिए इस्तेमाल किया जाता था. 

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aajtak.in
पिंकी आनंदनई दिल्ली, 04 February 2020
मृत्युदंडः पक्ष फांसी क्यों नहीं? मृत्युदंड पर पक्ष-विपक्ष

पिंकी आनंद

''आप अपराध को देखिए और अपराधी को देखिए. अगर नशे का कोई सौदागर मादक पदार्थ नियंत्रण विभाग के किसी गुप्तचर अधिकारी को गोली मार दे तो उसे मृत्युदंड मिलता है... और, अगर नशे के दो सौदागर किसी 10 साल की लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार करें और उसके बाद अपने नुकीले जूतों की ठोकरों से उसके जबड़े तोड़ दें तो आप खुशी-खुशी, बड़े उछाह और उल्लास से, उन्हें गैस चैंबर में डाल कर उनकी चीखें सुनें. यह बेहद आसान है. उनके अपराध बर्बरता की इंतिहा हैं. मृत्यु भी उनके लिए बहुत अच्छी है, जरूरत से ज्यादा अच्छी.''

— जॉन ग्रिशम, ए टाइम टु किल में

हमारे निर्णयों के मूल में हमारी चेतना होती है. हम इस बारे में विचार करें तो हमारे विचार ही हमें वह बनाते हैं, जो हम होते हैं. हमारे विचार ही समाज, नियम-कानून और कानून तोडऩे पर मिलने वाले दंडों का निर्माण करते हैं. वह सब कुछ जो हम करते हैं या चाहते हैं कि हो या कोशिश करते हैं कि हो, हमारे सोचने से ही संचालित होते हैं. किसी बात के सही, गलत, उचित और न्यायपूर्ण होने के बारे में हमारी धारणाएं भी इसी तरह हमारे विचारों से निर्धारित होती हैं और यही वजह है कि हम अक्सर अपने विचारों को, अपनी अवधारणाओं को और अपने आप को किसी दूसरे के उलट पाते हैं. इससे हम एक अपरिहार्य प्रश्न से रू-ब-रू होते हैं कि हमारे और किसी अपराधी के दिमाग में अंतर क्या है और यह कौन बताएगा कि किसकी अवधारणा बेहतर है, जिसे दूसरे के ऊपर रखा जाना चाहिए?

मृत्युदंड हमारे समाज में तकरीबन 4,000 साल से मौजूद रहा है. आरंभिक काल में तो यह रोटी के एक टुकड़े की चोरी जैसे छोटे अपराधों से लेकर किसी गुलाम को मुक्त करने या अवैध संबंधों तक के लिए इस्तेमाल किया जाता था. पूरी दुनिया में, सर्वाधिक विकसित समाजों से लेकर दूरस्थ जनजातियों तक में इसका इस्तेमाल होता रहा है. इसका इस्तेमाल हतोत्साहित करने के लिए किया जाता रहा है और यह अपराध नियंत्रण का प्रभावी उपाय रहा है. आज हम मृत्युदंड को अंतिम दंड के रूप में वर्गीकृत करते हैं जो 'निकृष्टतम' श्रेणी के ऐसे पैशाचिक अपराधों के लिए आरक्षित है, जो हमें बतौर राष्ट्र दु:स्वप्न की तरह डराते हों, ऐसे दिल दहला देने वाले चरम श्रेणी के अपराध हों जिनके बारे में जानकारी मिलने के बाद महीनों तक लोगों को सड़क पर निकलने में भी डर लगता रहे.

दिसंबर 2012 ऐसा ही महीना था, जब 23 साल की फिजियोथिरैपी इंटर्न के बलात्कार और हत्या से पूरा देश हिल उठा था. युवा और निडर निर्भया के दुर्भाग्यपूर्ण अंत पर पूरा देश गुस्से से उबल पड़ा था जिसकी मौत में शायद सिवा इसके उसकी कोई गलती नहीं थी कि वह उस दुनिया के बारे में भोलेपन की हद तक नासमझ थी जिसमें उसके बलात्कारियों जैसे दरिंदे छुट्टा घूमते हैं. आज, जनवरी 2020 में, उसके साथ बर्बर बलात्कार और हत्या के पूरे सात साल बाद हम अभी मृत्युदंड के गुण-दोष पर चर्चा कर रहे हैं. मृत्युदंड का उल्लेख होते ही हम उसके पक्ष-विपक्ष में बहस करने लग जाते हैं और पूछते हैं कि सभ्य समाज के रूप में हम दंडस्वरूप मृत्यु की वकालत कैसे कर सकते हैं.

मेरे लिए यह बिलकुल सीधा मसला है. वह युवा लड़की बिना किसी गलती के मरी थी. उसे ऐसी पीड़ादायी मृत्यु मिली थी जिसकी वह पात्र नहीं थी. देश की सबसे बड़ी अदालत, सुप्रीम कोर्ट ने उसके साथ हुए अपराध को 'पैशाचिक प्रकृति' का माना है जिसके लिए उसे बड़ी कीमत चुकानी पड़ी. मृत्युदंड के आलोचक प्राय: तर्क देते हैं कि इससे अपराध रुकते नहीं हैं, कि इसके प्रभावी होने के कोई प्रमाण नहीं हैं, कि इससे अपराध की दर में कोई कमी नहीं आई है, लेकिन सत्य यह है कि अपराध की प्रकृति के बारे में केवल सांख्यिकीय दृष्टिकोण नहीं अपनाया जा सकता.

बतौर समाज नागरिकों के प्रति हमारी प्राथमिक जिम्मेदारी उनकी रक्षा करना है. हम मृत्युदंड पर बहस कर सकते हैं और किसी व्यक्ति की बलपूर्वक जान लेने की (अ)मानवीयता को अनुचित मान सकते हैं, लेकिन समाज बृहत्तर लोक हित के आधार पर, जो ज्यादा लोगों के लिए ज्यादा अच्छा हो, काम करता है. अगर समाज के किसी सदस्य की हरकत व्यापक समाज के लिए गंभीर खतरा पैदा करती है और उसे सुधार की संभावना से परे घोषित किया जाता है तो उस स्थिति से निपटने का एकमात्र तार्किक रास्ता उस खतरे को हमेशा के लिए खत्म करना ही है. 

अगर किसी एक या कुछ सदस्यों की हरकतें व्यापक समाज के हितों को खतरे में डालती हैं तो उस खतरे को खत्म किया ही जाना चाहिए.

पिंकी आनंद वरिष्ठ अधिवक्ता और फिलहाल देश की अतिरिक्त महाधिवक्ता हैं

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