एडवांस्ड सर्च

कांग्रेस अपना खोया अतीत कैसे कर सकती है हासिल

कांग्रेस अपने अस्तित्व के सामने खड़ी इस चुनौती का सामना तभी कर सकती है, जब वह एक समावेशी प्रगतिशील राष्ट्रीय दृष्टिकोण पर आक्रामक संवाद के लिए तैयार हो सके

Advertisement
aajtak.in
संध्या द्विवेदी/ मंजीत ठाकुर नई दिल्ली, 23 July 2019
कांग्रेस अपना खोया अतीत कैसे कर सकती है हासिल पुरुषोत्तम अग्रवाल

हाल के दौर में राजनीति पूरी तरह  व्यक्ति पूजा की गिरफ्त में है. न सिर्फ भारत, बल्कि अमेरिका, रूस, चीन, तुर्की, जापान और ब्राजील में भी यही हो रहा है. यह 24x7 टीवी और सोशल मीडिया की गहरी पैठ, और साथ ही राजनैतिक और सामाजिक मूल्यों में निहित आख्यानों के पतन का परिणाम है. यह लगभग वैसा ही है जैसे दुनिया में हर जगह के लोगों ने 'अच्छे दिनों' की आस में करिश्माई नेताओं को कुछ चमत्कारिक शक्तियां प्रदान कर दी हों.

चमत्कारी कदम अक्सर आत्मघाती सिद्ध हुए, जैसे नवंबर 2016 की (कु)ख्यात नोटबंदी, जिसे वफादार मीडिया ने कालेधन के खिलाफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ब्रह्मास्त्र बताया था. लेकिन ऐसे माहौल में, जहां विद्रुप सचाई पेश करने पर आमादा चापलूस मीडिया ने हमारे दिमाग में यह ख्याल तक भर देने की कोशिश की हो कि मोदी भारत को क्रिकेट विश्वकप भी जितवा सकते हैं, उसके लिए किसी दुस्साहस या ढोंग को चमत्कार के रूप में पेश करके जनमत को तोडऩा-मरोडऩा भला कितना मुश्किल होगा!

ऐसे हालात में, यही उम्मीद की जा सकती है कि हाल के आम चुनाव में कांग्रेस की निराशाजनक हार के लिए परिस्थितियों के बजाए कुछ व्यक्तियों को ही जिम्मेदार ठहराया जाएगा. राहुल गांधी पर चौंधिया देने वाले फ्लैश की जद में है. जो लोग कांग्रेस के लिए शर्मसार हो जाने या डूब मरने को कह रहे या जो इस हार के लिए पूरी तरह से राहुल को जिम्मेदार ठहराते हैं, वे यह भूल जाते हैं कि राहुल के नेतृत्व में हाल ही में कांग्रेस ने भाजपा को गुजरात में पानी पिला दिया था और मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में सरकारें बनाई थीं. इस्तीफा देने के बजाए, राहुल को कांग्रेस को पुनर्जीवित करने और हार के वास्तविक कारणों को समझ कर उन्हें दूर करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए था.

लेकिन अगर राहुल ने यह राह चुनी होती तो शायद कांग्रेस के पुराने नेता 'जैसे चलता है चलने दो' वाली मानसिकता से बाहर नहीं आए होते. राहुल गांधी का इस्तीफा, राजनैतिक वर्ग के लिए एक चेतावनी है कि उसे हमेशा जनता की राय के प्रति जवाबदेह होना चाहिए, और कांग्रेस पार्टी के क्षत्रपों के लिए कड़ा संदेश कि एक बड़ी वैचारिक लड़ाई अब लड़ी जानी चाहिए.

भाजपा, कांग्रेस के अस्तित्व के लिए अभूतपूर्व खतरे की तरह उभरी है. और यह तब हुआ है जब भाजपा के खाते में अपने पहले कार्यकाल में कोई वास्तविक उपलब्धि नहीं है. उसने अपने चुनाव घोषणा पत्र को लेकर भी बहुत मेहनत नहीं की थी. कांग्रेस ने, मोदी सरकार के खिलाफ एक जोरदार अभियान चलाया और राजकाज के अपने नजरिए को पेश करने में काफी समय, प्रयास और ऊर्जा लगाई. फिर कांग्रेस के लिए क्या गलत हुआ और कौन-सी बात भाजपा के हक में चली गई?

'राष्ट्रवाद' की धारणा में इसका उत्तर मिल सकता है. भाजपा ने मीडिया में अपने हमदर्दों की मदद से खुद को गौरवान्वित और ताकतवर भारत के निर्माण के सपने को समर्पित पार्टी की तरह पेश किया जबकि कांग्रेस को इस सपने के प्रति उदासीन पार्टी के रूप में सफलतापूर्वक पेश किया, भले ही विरोधी के रूप में नहीं. कांग्रेस ने राजकाज को लेकर अपना एक दृष्टिकोण तो जनता के सामने रखा लेकिन वह लोकतांत्रिक, राष्ट्रवादी पहचान को पुन: प्राप्त करने में नाकाम रही, जिसको लेकर वह ऐतिहासिक और तार्किक रूप से दावे करती है.

अतीत के साथ एक भावनात्मक जुड़ाव और भविष्य के लिए चिंता सभी समाजों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. इस देशभक्ति की भावना को एक पश्चगामी, धर्मांध, अतिवादी राष्ट्रवाद के रूप में या फिर लोकतांत्रिक, समावेशी और आगे की सोच वाले राष्ट्रवाद के रूप में व्यक्त किया जा सकता है. राष्ट्रवाद के विभिन्न पहलुओं पर अकादमिक बहस चल सकती है, लेकिन रोजमर्रा की राजनीति में, राष्ट्रीय भावना की राजनैतिक ताकत से इनकार नहीं किया जा सकता. गांधी, नेहरू, पटेल और मौलाना आजाद जैसे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दूरदर्शी नेताओं को यह पता था.

यह कांग्रेस ही थी जिसने सर्वप्रथम देशभक्ति की भावना और औपनिवेशिक राष्ट्रवाद के खिलाफ मनोभाव को एक समावेशी राष्ट्रवाद में परिवर्तित किया था. स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक दादा धर्माधिकारी के 'मानवनिष्ठ भारतीयता' के स्वरूप में व्यक्त राष्ट्रवाद की रूपरेखा भारतीय समाज के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व करने की आकांक्षा रखती थी, दीगर बात है कि उसकी सफलता की सीमाएं थीं. वास्तव में, गांधी के इस जंग में कूदने के बाद, कांग्रेस भगवान शिव की बारात की तरह हो गई, जिसमें विविध प्रकार के पात्र, कई बार तो जोरदार विरोधाभासी भी, एक साथ आए.

समावेशी भारत का विचार इस बारात का दूल्हा—जुलूस का भगवान शिव—बना. बहुत ही समावेशी राष्ट्रवाद का विचार स्वतंत्र भारत के संविधान में शामिल था. राष्ट्र में असंतोषों का उभार और उनकी अभिव्यक्ति, विभिन्न समूहों के परस्पर विरोधी हित, ऐतिहासिक रूप से अपरिहार्य थे; जो सवाल था, और आज भी है—इन मुकाबलों और लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को कैसे संबोधित किया जाए? भारतीय राष्ट्रवाद के क्षितिज का विस्तार कैसे हो? शिवजी की बारात में शामिल हुए नए और मुखर बारातियों को कैसे समायोजित किया जाए?

इस सवाल का जवाब कांग्रेस ने पिछले एक दशक में खोजने की कोशिश की है, लेकिन एक ऐसे तरीके से जो उसके लिए नुक्सानदेह बन गया है. इसने अपने मंच का सिविल सोसाइटी के ऐसे कार्यकर्ताओं द्वारा इस्तेमाल की इजाजत दे दी जो भारतीय समाजवाद के सुसंगत विचार के बिना विभिन्न एकसूत्री-मुद्दों और एजेंडों को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं. विभिन्न सांस्कृतिक-पहचान के विमर्शों को समायोजित करने की उत्सुकता में, कांग्रेस ने प्रगतिशील भारतीय राष्ट्रवाद के अपने वाजिब दावे को इस तरह छोड़ दिया कि आरएसएस और भाजपा को अपने दक्षिणपंथी बहुसंख्यकवाद के ब्रांड के विचार से समाज को संक्रमित करने की खुली छूट मिल गई.

अपने इस्तीफे में, राहुल गांधी ने अपने सहयोगियों के रवैये के प्रति यह कहते हुए गहरी निराशा व्यक्त की कि आरएसएस के खिलाफ लड़ाई में, ''कई बार, मैं खुद को पूरी तरह से अकेला पाता था.'' अब उनके इस कथन की तुलना मोदी की पहले कार्यकाल की शुरुआत में कही गई बातों के साथ करें, जब उन्होंने केंद्र में पहली-पूर्ण बहुमत वाली भाजपा सरकार को आरएसएस काडर की 'पांच पीढिय़ों की कठिन तपस्या' का फल बताया था. आरएसएस कार्यकर्ताओं में एक संकल्प, जो भले ही गलत और अस्पष्ट हो, का भाव भरकर उसे इतना प्रेरित किया जाता है कि वह उस संकल्प को स्वयं के मुकाबले बड़ा मानता है.

आरएसएस और उसकी राजनैतिक इकाई भाजपा के विपरीत, कांग्रेस कभी भी काडर-आधारित पार्टी नहीं रही है. उसने उपनिवेशवाद विरोधी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एक पार्टी की तुलना में एक आंदोलन के रूप में कार्य करने को प्राथमिकता दी. आजादी के बाद भी, नेहरू ने आर.के. करंजिया (पत्रिका ब्लिट्ज़ के तत्कालीन संपादक) को दिए एक साक्षात्कार में कांग्रेस जैसे एक आंदोलन को काडर-आधारित प्रणाली में बदलने के 'खतरों' के बारे में चर्चा करते हुए इसे ''संघर्षों, प्रति-संघर्षों और राष्ट्र की जीवन शक्ति का अपव्यय'' बताया था. (द माइंड ऑफ मि. नेहरू, लंदन, 1960, पृष्ठ.58)

हालांकि, नेहरू की कांग्रेस ने कभी भी समावेशी, लोकतांत्रिक, दूरंदेशी भारतीय राष्ट्रवाद के अपने वैचारिक आधार को नहीं खोया. उसने अपने कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करना जारी रखा और भारत के अपने विचार के बारे में बड़े पैमाने पर लोगों को शिक्षित किया, यहां तक कि कम्युनिस्ट पार्टियों जैसे काडर प्रशिक्षण की औपचारिक व्यवस्था के बिना भी. फ्रांसीसी विचारक आंद्रे मैल्लुक्स के यादगार शब्दों में, नेहरू ने गांधी और स्वतंत्रता आंदोलन के अन्य दिग्गजों के साथ काम करने से प्राप्त अनुभवजन्य ज्ञान और दूरदर्शी दृष्टिकोण के साथ प्रभावी रूप से 'राष्ट्र के गुरु' की भूमिका निभाई.

उल्लेखनीय रूप से, उन्होंने हिंदू और मुस्लिम सांप्रदायिकता दोनों का ही मुकाबला धर्मनिरपेक्षता के साथ नहीं, जैसा कि आमतौर पर इसकी गलत व्याख्या के कारण समझा जाता है, बल्कि राष्ट्रवाद के साथ किया. धर्मनिरपेक्षता को तो नेहरू के भारतीय राष्ट्रवाद के विचार के अंदर प्रवेश कराया गया था, और यह निश्चित रूप से भारतीय संस्कृति की विभिन्न कशमकशों से अनभिज्ञ या उसके प्रति उदासीन नहीं था. महत्वपूर्ण यह भी है कि काडर-आधारित पार्टी नहीं होने के बावजूद, हाल के दिनों तक जमीनी स्तर के राजनैतिक कार्यकर्ता को कांग्रेस में कभी भी नजरअंदाज नहीं किया गया.

इतिहास का यह सबक आज कांग्रेस के लिए 'क्या करना चाहिए और क्या नहीं' को रेखांकित करता है. पेशेवरों और टेक्नोक्रेट्स की सेवाओं का लाभ उठाना भी महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे अनंत गुना ज्यादा महत्वपूर्ण है इन सेवाओं को एक राजनैतिक संकल्पना के खांचे में रखना. दूसरे शब्दों में, नियमित राजनैतिक कार्यकर्ता की अंतर्दृष्टि और दृष्टिकोण को उचित सम्मान और वजन देना बेहद महत्वपूर्ण है. इसी प्रकार, विभिन्न सामाजिक समूहों और पहचानों की आकांक्षाओं के प्रति संवेदनशील होना अच्छा है, लेकिन इन सबको एक राष्ट्रीय दृष्टिकोण और राष्ट्रीय आकांक्षाओं में पिरोने की चुनौती स्वीकारना ज्यादा फायदेमंद है. यह तभी हो सकता है जब कार्यकर्ताओं के वैचारिक प्रशिक्षण और जनता को राजनैतिक रूप से जागरूक करने को गंभीरता से लिया जाए और हार हो या जीत हो, उस लक्ष्य से पीछे न हटा जाए.

इसको लेकर कोई भ्रम नहीं होना चाहिए कि हम भारत के अतीत, वर्तमान और भविष्य के विचारों की तीव्र प्रतिस्पर्धा के बीच एक सांस्कृतिक युद्ध के मध्य खड़े हैं. कांग्रेस अपने अस्तित्व के सामने खड़ी इस चुनौती का सफलतापूर्वक सामना तभी कर सकती है, जब वह एक समावेशी और प्रगतिशील राष्ट्रीय दृष्टिकोण को अपनाने, उसे परिष्कृत करने और आक्रामक संवाद स्थापित करने के लिए तैयार हो सके.

पुरुषोत्तम अग्रवाल लेखक और सांस्कृतिक आलोचक हैं. उनकी नवीनतम पुस्तक, हू इज़ भारत माता, जवाहरलाल नेहरू द्वारा और उन पर लिखे लेखों (स्पीकिंग टाइगर, 2019) का एक संपादित संग्रह है

***

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay