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शिक्षा विशेषः व्यावहारिक नजरिया

अपनी विलक्षण सूझ-बूझ और बुद्धिमता के लिए जाने जाने वाले नारायण मूर्ति आइआइटी के ग्रेजुएट की खराब पढ़ाई-लिखाई को लेकर हमेशा कुछ न कुछ कहते रहते हैं. मूर्ति आखिर देश के आइआइटी ग्रेजुट्स की पढ़ाई से इतना नाराज क्यों रहते हैं? दिक्कत क्या है उन्हें? इसका जवाब 1,50,000 इंजीनियरों के एक सर्वे से पता चला. इस सर्वे में पाया गया कि केवल 4 फीसदी ही इंजीनियरिंग के शुरुआती कामों में नौकरी करने के लायक थे.

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दिनेश सिंह और अमोघ रायनई दिल्ली, 09 August 2018
शिक्षा विशेषः व्यावहारिक नजरिया इलेस्ट्रशनः सिद्धांत जुमडे

कुछ साल पहले सिडनी की एक यात्रा के दौरान इस लेख के प्रथम लेखक का साबका एक नौजवान भारतीय ड्राइवर से पड़ा. वह दिल्ली के एक ऐसे कॉलेज से कॉमर्स ग्रेजुएट था जो दाखिले की बेहद ऊंची कट-ऑफ के लिए खासा जाना-माना है. उसकी स्थिति को लेकर उत्सुकता होना स्वाभाविक था, क्योंकि वह बहुत धाराप्रवाह ढंग से अपनी बात कहने में सक्षम जान पड़ता था और अपने आसपास की दुनिया के बारे में खासी जागरूक था. जब उससे पूछा गया कि वह सिडनी में कैब क्यों चला रहा है, तो वह नौजवान अचानक रोने लगा और सुबकते हुए उसने बताया कि दिल्ली के कॉलेज से डिग्री लेने में उसने बेकार ही अपना वक्त जाया किया. इसका तकलीफदेह एहसास उसे तब हुआ जब अपनी कॉमर्स की पृष्ठभूमि के दम पर सिडनी में रोजगार हासिल करने की उसकी कोशिशें बारंबार नाकाम हो गईं.

उससे बार-बार कहा गया कि वह व्यावहारिक या उपयोगी कुछ नहीं जानता. इस मशहूर संस्था में साल दर साल यही हालत जारी है और उससे ग्रेजुएट करने वाली तकरीबन आधी कक्षा कैंपस प्लेसमेंट के दौरान रोजगार पाने में नाकाम हो जाती है. लंबे वक्त से हमारी यह धारणा कायम है और खासी तादाद में आंकड़े भी इसकी तस्दीक करते हैं कि हिंदुस्तान में बहुत सारी पढ़ाई वाकई ब्लैकबोर्ड के इर्दगिर्द केंद्रित है और जो ज्ञान दिया जाता है, वह पुराना है और साथ ही असली दुनिया से उसका कोई अर्थपूर्ण वास्ता नहीं है.

इत्तफाकन कई वजहों से हमें इस बात का सीधा तजुर्बा हासिल हुआ है कि हमारी कुछ जानी-मानी शिक्षा संस्थाओं में क्या चल रहा है. शिक्षा और ज्ञान के क्षेत्र में अपनी विलक्षण सूझ-बूझ और बुद्धिमता के लिए जाने जाने वाले नारायण मूर्ति आइआइटी के ग्रेजुएट की बुरी पढ़ाई-लिखाई को लेकर लगातार स्यापा करते रहे हैं. आखिर वह क्या बात है जो मूर्ति को परेशान करती है?

कुछ साल पहले एक बेहद सम्मानित आइआइटी से ग्रेजुएशन कर रहे एक छात्र ने कहा थाः "यहां बिताए साढ़े तीन साल अकादेमिक तौर पर बेकार रहे हैं. यह बात मुझे मेरी बाकी की जिंदगी सालती रहेगी. मैं अप्रैल, 2015 में यहां से चला जाऊंगा और उस वक्त मेरा अकादेमिक ज्ञान या तो वही होगा या थोड़ा-सा ज्यादा होगा जो जुलाई, 2011 में इस संस्थान में मेरे आने के वक्त था.

इम्तिहान के लिए रटने के दौरान मैंने जो थोड़ा-सा सीखा, वह इम्तिहान खत्म होने के साथ ही मिट गया.'' पांच साल पहले एक प्रयोग के तौर पर की गई एक गतिविधि में दिल्ली विश्वविद्यालय ने कैंपस प्लेसमेंट की कवायद के लिए एक अगुआ बहुराष्ट्रीय कंपनी को आमंत्रित किया.

कंपनी में कुछ सौ नौकरियां थीं और वे कुल जमा ऐसे ग्रेजुएट की तलाश में थे जो असरदार ढंग से बातचीत कर सकें और उनमें बुनियादी विश्लेषण का हुनर हो. विश्वविद्यालय ने व्यापक प्रचार-प्रसार किया और सबसे अच्छे 1,200 रिज्यूमे शॉर्टलिस्ट किए. कंपनी ने ब्लाइंड इंटरव्यू किए (आवेदकों के कॉलेज और पारिवारिक पृष्ठभूमि उजागर नहीं की गई).

केवल तीन छात्र कामयाब हो पाए. अब वह भी पढ़ लीजिए जो बहुत ज्यादा वक्त नहीं हुआ जब सेंट स्टीफंस के एक छात्र ने लिखा थाः "एक्सचेंज के मेरे तमाम साथी छात्रों की साझा राय है कि सेंट स्टीफंस में जो हम घर पर पढ़ा करते थे, उसकी तुलना में पढाई-लिखाई एक मजाक है.

इकोनॉमिक हिस्ट्री की एक क्लास में प्रोफेसर कमरे में आते, हाजिरी लेते, नोटबुक खोलते और जोर से पढऩा शुरू कर देते जब तक कि घंटी नहीं बज जाती. अपनी कक्षाओं के दौरान मैंने अकेला सवाल यह पूछा जाता सुना कि उस दिन कवर की गई सामग्री परीक्षा में आएगी या नहीं. याद रखिए यह कोई आम लिबरल आर्ट्स कॉलेज नहीं हैः सेंट स्टीफंस को भारत का अगर सबसे अच्छा नहीं भी तो सबसे अच्छे कॉलेजों में से एक माना जाता है.''

ऐसे में क्या इस बात पर हैरान हुआ जा सकता है कि भारत के शिक्षा फलक पर हिमायत करने लायक इतना कम है? इस निराशाजनक हालात के लिए किसको दोष दें? यहां छांदोग्य उपनिषद् का एक उदाहरण देना शायद समीचीन होगा, जो ईसा से कई सदियों पुराना है.

जब 12 साल के बच्चे सत्यकाम को गौतम हरिद्रुमत के गुरुकुल में भर्ती करवाया गया, तब पूज्य गुरु ने उनसे कहा कि वह मवेशियों को लेकर जंगल जाए और तब तक न लौटे जब तक मवेशियों की तादाद में एक निश्चित गुना बढ़ोतरी न हो जाए. यह काम और कुछ नहीं बल्कि असल दुनिया से जुड़ी एक उद्यमशील परियोजना था. इसके लिए तमाम किस्म के हुनर की जरूरत थी.

मसलन, उसे यह पक्का करना कि मवेशियों को सेहतमंद आहार मिले, जंगल के लुटेरों और शिकारियों से उनकी हिफाजत करनी थी और मवेशियों को अपने हुक्म मानने के लिए प्रशिक्षित करना था और साथ ही उसे खुद अपनी जरूरतों का भी ख्याल रखना था.

कुछ वक्त बाद जब सत्यकाम अपने काम को कामयाबी के साथ अंजाम देकर लौटता है, तब हरिद्रुमत उसकी शख्सियत पर शिक्षा और ज्ञान की रोशनी डालते हैं. यहां हमारे सामने उद्घाटित वह गहरा ज्ञान हैः शिक्षा और हुनर के बीच गहरा रिश्ता है. इस प्रसंग से समूचे इतिहास के दौरान हिंदुस्तान के ज्ञान क्षेत्र की कहानी जाहिर होती है और यह अतीत की उसकी कामयाबियों का राज भी है. ऐसा लगता है कि हमने अपना गहरा ज्ञान और खुद में भरोसा दोनों 18वीं सदी के आखिरी सालों के आसपास कहीं गंवा दिए और उन्हें दोबारा हासिल करने में नाकाम रहे.

हम दुनिया के दूसरे हिस्सों के समूचे इतिहास की खास नजीरों पर ध्यान देते हैं और उनके जरिए ज्ञान और हुनर के गहरे जुड़ाव और ज्ञान हासिल करने के खेल में अंतर आनुशासनिकता यानी विभिन्न अनुशासनों की आपसी निर्भरता को लेकर अपनी बात समझाते हैं. हम गहरे समुद्रों में नौवहन कर पाने के लिए रापालगई की ईजाद और इस्तेमाल का हवाला देते हैं.

क्रोनोमीटर के वक्त से सदियों पहले ईजाद और इस्तेमाल किया गया यह उपकरण सागरों के सफर पर निकले हमारे जहाजों के इस कदर काम आता था कि हिंदुस्तान ने अपने व्यापारिक जहाजों को लंबी-लंबी दूरी की दक्ष और कामयाब समुद्र यात्रों पर भेजकर जबरदस्त संपदा इकट्ठी की थी. रापालगई की ईजाद व्यावहारिक जरूरत का सीधा नतीजा थी, पर यह ज्ञान का ऐसा उत्पाद भी था जिसे व्यावहारिक इस्तेमाल में लाया जा सकता था.

यह बात कभी हरगिज भूलना नहीं चाहिए कि इतिहास के कुछ महामनीषी, जिनकी शिक्षाओं के चलते दुनिया के कुछ वाकई महान और नए धर्मों की रचना हुई, उन भूमिकाओं से करीब से जुड़े थे जिनका वास्ता खेती-किसानी, बढ़ईगीरी और चरवाही सरीखे कामों से था.

उन्होंने हमारे लिए एक बेहद गहरा संदेश छोड़ाः व्यावहारिक हुनर की भूमिका और अहमियत को पहचानो. मेंडल अगर बागबानी के कामों में निपुण नहीं होता और अगर उसने गणित और वनस्पति विज्ञान सरीखे ज्ञान के विषयों का एक साथ इस्तेमाल नहीं किया होता, तो वह उतना गहरा ज्ञान नहीं दे पाता जिसकी वजह से जेनेटिक्स या आनुवंशिक विज्ञान सरीखा क्षेत्र वजूद में आया और जिसने मानव जाति की दशा-दिशा को हमेशा के लिए बदल दिया.

हममें से बहुत कम लोगों को इस बात का एहसास है कि आइंस्टीन हुनरमंद दस्तकार था, जिसे सौ से ज्यादा ईजादों और पेटेंटों का श्रेय हासिल है, जिनमें ऑटोमैटिक कैमरा और एक अनूठा रेफ्रिजरेटर भी शामिल है. न्यूटन, कबीर, फराडे और आर्कमिडीज के बारे में भी यह सच है.

हाल के वक्त का गूगल सर्च इंजन और कुछ नहीं बल्कि एक व्यावहारिक आविष्कार है जो वेब के जरिए दक्षता से सूचनाएं एकत्र करने के लिए ईजाद किया गया है. इसमें गणित का ज्ञान प्रोग्रामिंग के हुनर के साथ गहराई से जुड़ा है. ऐसा नहीं है कि हिंदुस्तान को सुखद तौर पर पता न हो कि क्या करने की जरूरत है. हमारे यहां टैगोर और गांधी सरीखे महात्मा हुए हैं जिन्होंने हाथों के इस्तेमाल और ज्ञान और असल दुनिया के बीच रिश्ते बनाने पर खासा जोर दिया था.

तो इस सबसे क्या निष्कर्ष निकालने की जरूरत है? सबसे अहम सबक यह है कि सच्ची और अच्छी तालीम के लिए हुनर को पहचानना और उसे शिक्षण कार्यक्रमों के साथ गहराई से जोडऩा बेहद जरूरी है. हिंदुस्तान के उच्च शिक्षा संस्थानों में क्या ऐसा होता है? जवाब है जोरदार नहीं! यहां तक आइआइटी सरीखे मशहूर संस्थानों में भी ऐसा नहीं होता.

हमारे सबसे जरूरी और आग्रही नुस्खे देश के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को लक्ष्य करके तय किए गए हैं. उनके शिक्षण कार्यक्रम मोटे तौर पर ब्लैकबोर्ड के जरिए ऐसा ढेरों ज्ञान बांट रहे हैं जिसमें से ज्यादातर अप्रासंगिक और बेमतलब है. इन संस्थानों के ग्रेजुएट कोई भी हुनर या हुनर को ज्ञान के साथ सार्थक ढंग से जोडऩे की काबिलियत हासिल करने में नाकाम रहते हैं.

मिसाल के तौर पर गणित का एक अहम भीतरी विषय, जिसे फ्लुइड डायनेमिक्स के तौर पर जाना जाता है, तकरीबन हरेक विश्वसनीय कॉलेज के गणित के पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाता है. फिर भी इसके छात्र हवाई जहाजों के डिजाइन में इसकी भूमिका के बारे में मोटे तौर पर अनजान ही रहते हैं. क्या फिर कोई ताज्जुब की बात है कि हवाई जहाजों के निर्माण में हिंदुस्तान आगे नहीं निकलता?

यहां एक और भी बुनियादी जरूरत का जिक्र है, जिसका जबरदस्त तकाजा है. ज्यादातर संस्थानों के छात्रों में बुनियादी संचार, विश्लेषण और अहम सोच-विचार के हुनर की कमी है. हमारा तजुर्बा बताता है कि वे ज्यादातर मामलों में सक्चत और खालिस तरीकों से नहीं सोच पाते.

इससे पहले कि आप यह धारणा बनाएं कि उनकी यह नाकाबिलियत मोटे तौर पर अंग्रेजी भाषा से उनकी नावाकफियत की वजह है, जरा संभल जाएं! यहां तक कि काउ बेल्ट कही जाने वाली हिंदी पट्टी में भी ये नौजवान, और यकीनन होनहार दिमाग के नौजवान भी, हिंदी जबान में भी ऊपर बताए गए हुनर प्रदर्शित नहीं करते.

अब उनकी शैक्षिक साज-सज्जा को जरा उनमें इस बेहद अहम हुनर-यानी जानकारियां हासिल करने और उनका विश्लेषण करने और उन्हें कई किस्म के उपयोगों के वास्ते रचनात्मक कोडिंग के साथ पूरी तरह मिलाने के हुनर-के होने की सख्त जरूरत के साथ फिट करने की कोशिश करें.

क्या फिर हम ताज्जुब कर सकते हैं कि एक भी कंप्यूटर लैंग्वेज हिंदुस्तान में ईजाद नहीं की गई है? जब हमारे युवा दिमागों को बेहद अहम सोच-विचार और व्यावहारिक ज्ञान के आनंद और खूबियों का स्वाद चखने को मिलेगा, केवल तभी वे अपने तौर-तरीकों में हुनर पर आधारित ज्ञान हासिल करने और उसके फायदेमंद इस्तेमाल के लिए वाकई नए और अनूठे तरीकों से काम करेंगे.

कॉलेज आने वाले छात्रों की तादाद लगातार बढ़ रही है. नीति आयोग के मुताबिक, तीसरे पायदान की शिक्षा में सकल नामांकन का अनुपात 2015-16 में 24.5 फीसदी बढ़ा है. तिस पर भी जरा इंजीनियरिंग ग्रेजुएट के सामने मुंहबाए खड़ी चुनौतियों पर नजर डालिए. 1,50,000 इंजीनियरों पर किए गए एक सर्वे से पता चला कि केवल 4 फीसदी इंजीनियरिंग के शुरुआती कामों की नौकरी के लायक थे.

ऐसी कोई शैक्षिक संस्था बताइए जिसने एक ऐसा क्रेडिट सिस्टम अपनाया हो जो इस किस्म की उद्यमशीलता पर भी जोर देता हो. औपचारिक शिक्षा और हुनरमंद बनाने के बीच इस द्वैत या फांक को खत्म करना ही होगा. तो वे बुनियादी हुनर कौन-से हैं जो हमारे कॉलेज और विश्वविद्यालयों को देने चाहिए और इसमें सरकार की क्या भूमिका हो सकती है?

सबसे जरूरी और अनिवार्य यह है कि सरकार नियामकीय या नियम-कायदे थोपने वाले निकायों को जितनी जल्दी बेअसर कर दे उतना अच्छा. इन संस्थाओं को अकल्पनाशील अफसरशाही के नियंत्रण और शिकंजों से मुक्त करना ही होगा.

तभी कॉलेज-विश्वविद्यालय बहादुरी के साथ नए-नए प्रयोग कर पाएंगे ताकि वे राष्ट्र की चुनौतियों से निपटने के लिए जरूरी ज्ञान और हुनर को आपस में जोडऩे वाली नवाचारी शिक्षा को बढ़ावा दे पाएंगे. जहां तक यह बात है कि कौन-से हुनर जरूरी हैं, तो वे हैं.

संचार और विश्लेषण का अच्छा हुनर, डिजिटल टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल में माहिर होना और सूचना तथा डेटा को बेहद अहम ढंग से संभालने का हुनर. इसे हर विषय की शिक्षा के साथ गहराई से जोडऩा ही होगा और वैसे भी अंतर-आनुशासनिक तरीके से पढ़ाना ही होगा. यह कोई रॉकेट साइंस नहीं है और इसलिए इस पर अमल बहुत आसान है.

दिनेश सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व वाइस-चांसलर और लंदन की मिडिलसेक्स यूनिवर्सिटी के प्रतिष्ठित एकेडमिक कंसल्टेंट हैं. अमोघ राय एसजीटी यूनिवर्सिटी गुरुग्राम में अर्थशास्त्र के रिसर्च फेलो हैं

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