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महिलाएं बचा सकती हैं देश-दुनिया को

सिलिकॉन वैली ने स्त्री-पुरूष बराबरी से आंखें मूंद रखी हैं लेकिन भारतीय आइटी ऐसा न करे, खासकर जब आइटी छात्राओं में इजाफा हो रहा है.

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विवेक वाधवानई दिल्ली, 18 August 2014
महिलाएं बचा सकती हैं देश-दुनिया को

जब मैं पहली बार सिलिकॉन वैली पहुंचा, तो हैरान रह गया. मैं भारतीयों की कामयाबी पर रिसर्च कर रहा था और इस नतीजे पर पहुंचा कि यह पूरी तरह मेरिट आधारित है. ड्यूक, यूसी-बर्क ले और हार्वर्ड में मेरी रिचर्स टीमों ने यह बात दर्ज की कि सिलिकॉन वैली में 52 प्रतिशत नई कंपनियां (स्टार्ट-अप) विदेशों से आए लोगों ने शुरू की है. भारतीय उद्यमियों ने ब्रिटेन, चीन, ताइवान और जापान के कुल प्रवासी समूहों से अधिक स्टार्ट-अप स्थापित किए. कामकाजी आबादी में सिर्फ छह प्रतिशत अनुपात होने के बावजूद भारतीयों ने सिलिकॉन वैली की 15 प्रतिशत कंपनियां शुरू की हैं. शिक्षा और हालात के मामले में प्रवासियों के पिछड़ेपन के बावजूद यह कामयाबी उल्लेखनीय है. मैंने सोचा कि इस हिसाब से तो सिलिकॉन वैली को शेष दुनिया के लिए मिसाल होना चाहिए.
 
लोकप्रिय ब्लॉग टेकक्रंच के टेक्नोलॉजी सम्मेलन में शामिल होकर और यह देखकर आंखें खुल गईं कि मंच पर महिलाओं की मौजूदगी सिर्फ स्टाफ  और एक सर्कस कलाकारों के रूप में थी. वहां मौजूद 100 से अधिक कंपनियों में एक की भी मुखिया कोई महिला नहीं थी. श्रोता अधिकतर नौजवान गोरे मर्द थे. कुछ भारत और चीन से भी थे लेकिन वे भी पश्चिम के रंग में डूबे हुए थे.

मैंने जब अग्रणी टेक्नोलॉजी कंपनियों की एग्जीक्यूटिव टीमों पर नजर डाली तो उनमें एक भी महिला नहीं मिली. ऐपल की पूरी मैनेजमेंट टीम में एक भी महिला नहीं है. सिलिकॉन वैली की लगभग सारी निवेश कंपनियों में पुरुषों का दबदबा है. उनकी वेबसाइट पर देखी गई कुछ महिलाएं या तो मार्केटिंग में थीं या मानव संसाधन में. इस मामले में सबसे आगे वेंचर कैपिटल कंपनियां (वीसी) रहीं. TheFunded.com की 2009 की 89 टॉप वीसी की सूची में सिर्फ एक वीसी की प्रमुख महिला थी.

मुझे इससे भी बड़ी हैरानी इस बारे में लिखने पर हुई आलोचना से हुई. फरवरी, 2010 में टेकक्रंच के लिए एक ब्लॉग में मैंने लिखा, ‘‘सिलिकॉन वैलीः तुम और तुम्हारी कुछ वीसी में जेंडर की समस्या है.’’ इसके जवाब में मुझे जिस तरह की नफरत भरी मेल, अपरिपक्व ऑनलाइन चैटर और ट्विटर पर व्यक्तिगत हमले झेलने पड़े उससे मैं हैरान रह गया. कुछ बेहद सम्मानित वीसी, जिन्हें मैं अपना दोस्त कहा करता था, उनकी ईमेल ने तो मुझे और भी चौंका दिया. एक ने मुझसे पूछा कि इस मुद्दे को इस तरह उभारने के पीछे मेरा एजेंडा क्या था. दूसरे ने चेतावनी दी, ‘‘वैली में कामयाबी हासिल करने का यह तरीका नहीं है.’’ किसी और ने पूछा कि क्या मैं महिलाओं को रिझाने की कोशिश कर रहा हूं और सुझाव दिया कि इससे भी बेहतर तरीके हैं. इनमें से कुछ वीसी मशहूर भारतीय हैं, जिनके बारे में आप अकसर पढ़ते रहते हैं. लिंग भेद की कोई राष्ट्रीय या नस्लीय सीमा नहीं है.

उसके बाद से मैंने पुरुष और महिला उद्यमियों के माहौल के अंतर का अध्ययन किया है. सच में तो ऐसा कोई अंतर नहीं है. पुरुष हो या महिला, सब में लगभग एक जैसी प्रेरणा और कामयाबी के कारक होते हैं. लेकिन महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले ज्यादा बढ़त हासिल होती है.

सबसे पहला फायदा तो यही है कि महिलाओं ने जिन कंपनियों को स्थापित किया है वह पुरुषों की तुलना में पूंजी के मामले में अधिक किफायती हैं. महिलाओं के नेतृत्व में हाइटेक स्टार्ट-अप की नाकामी की दर कम है. वेंचर समर्थित जो कंपनियां महिलाएं चलाती हैं उनकी वार्षिक कमाई पुरुषों की कंपनियों से 12 प्रतिशत अधिक होती है. इसी तरह जिन संगठनों में प्रबंधन के उच्चस्तर पर महिलाओं को सबसे अधिक स्थान दिया जाता है, उनकी इक्विटी पर फायदा 35 प्रतिशत अधिक और शेयरधारकों के लिए कुल लाभ 34 प्रतिशत अधिक होता है.

महिलाओं को बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स मंो रखने से भी बेहतर नतीजे मिलते हैं. सबसे अधिक अनुपात में महिला बोर्ड निदेशक रखने वाली कंपनियां, सबसे कम अनुपात वाली कंपनियों से 53 प्रतिशत बेहतर प्रदर्शन करती हैं. उनकी बिक्री पर कमाई 42 प्रतिशत अधिक और निवेश की गई पूंजी पर कमाई 66 प्रतिशत अधिक होती है.

सिलिकॉन वैली में सुधार की प्रक्रिया चल रही है. उजागर होते लिंग भेद पर आक्रोश है; समाधानों पर चर्चा और अमल हो रहा है; महिलाएं एक-दूसरे की मदद करने लगी हैं; और वेंचर कैपिटल सिस्टम अपनी बारीकी से छानबीन कर रहा है और अपने तरीके बदल रहा है. इस समस्या का अध्ययन करने के बाद मैंने एक पुस्तक के संकलन का फैसला किया, जिसमें महिलाओं के सामने मौजूद चुनौतियों और उन पर विजय पाने के तरीकों पर लोगों से विचार मांगे. मुझे यह जानकर खुशी हुई कि 500 से अधिक मददगार हाथ आगे बढ़े और उन्होंने इस प्रोजेक्ट में मेरे साथ काम किया. इनमें दर्जनों हाथ भारत के थे. इनोवेटिंग विमन नाम की इस किताब का विमोचन इस साल सितंबर में होगा. इसमें इन महिलाओं की कहानी है और इनकी कामयाबी के रहस्य बताए गए हैं. भारतीय उद्योग को इन महिलाओं से सीख लेनी चाहिए.

आइटी सहित कई भारतीय कंपनियों के बोर्ड में कोई महिला नहीं है. कुल मिलाकर भारत में बोर्ड में महिलाओं की हिस्सेदारी सिर्फ 5 प्रतिशत है, जबकि अमेरिका में 17 प्रतिशत है. प्रबंधन के उच्चस्तर पर भी हालत इतनी ही खराब है. इन्फोसिस, विप्रो, टीसीएस, टेक महिंद्रा और अन्य कंपनियों में शायद ही कोई महिला अधिकारी है. खास तौर पर कंप्यूटिंग के इस नए युग में यह उनके लिए बड़ी क्षति है.
टैबलेट, ऐप्स और क्लाउड कंप्यूटिंग के इस युग में आइटी उपभोक्ता को अपने आइटी विभागों से मिलने वाली टेक्नोलॉजी से कहीं बेहतर टेक्नोलॉजी सुलभ है. वे अपने आइपैड पर सस्ते, शानदार और जानदार ऐप्स डाउनलोड कर सकते हैं, जिनके सामने उनके कॉर्पोरेट सिस्टम आदिम लगते हैं. नए जमाने के इन ऐप्स के लिए कंपनी के भीतर सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट्स और मेंटेनेंस करने वाले लोगों की जरूरत नहीं है. यह ऐप्स उपभोक्ता के अनुसार ढाले जा सकते हैं और बुनियादी प्रोग्रामिंग कौशल से कोई भी इन्हें बना सकता है. इसीलिए भारत की आउटसोर्स कंपनियों और उनके ग्राहकों की संख्या घट रही है, जिनमें सीआइओ और आइटी विभाग शामिल है.

ऐसे कई और तरह के प्रयास हो रहे हैं, जिनसे टेक्नोलॉजी का पूरा परिदृश्य बदल रहा है, नए खरबों डॉलर के मौके पैदा हो रहे हैं और इनसानों की समस्याओं के समाधान का मंच तैयार हो रहा है. कंप्यूटिंग, मेडिसिन, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, 3डी प्रिंटिंग, रोबोटिक्स और सेंसर्स जैसी कई टेक्नोलॉजी में जबरदस्त तरक्की हो रही है और दाम गिर रहे हैं. मसलन, मिट्टी की नमी की निगरानी, पानी के अधिकतम इस्तेमाल और हानिकारक रसायनों का इस्तेमाल कम से कम कराने वाली खेती से जुड़ी प्रणालियों में इस्तेमाल के लिए बेहद सस्ते सेंसर उपलब्ध हैं. इनसे खेती के काम में क्रांति आ सकती है. इनसानों की सेहत की निगरानी और रोगों के लिए परीक्षण में काम आने वाले सेंसर भी हैं. कंप्यूटर ऐप्स सेहत के आंकड़ों को जिनोमिक आंकड़ों से मिलाकर समझा सकते हैं कि हमारे जिनोम, आदतों और बीमारियों के बीच क्या संबंध है. वे समग्र उपचार भी विकसित कर सकते हैं. उनसे वृद्धों की देखभाल में मदद के लिए रोबोटिक सहायक विकसित किए जा सकते हैं और स्कूल की सुविधा से वंचित करोड़ों बच्चों को पढ़ाने के लिए ट्यूटर तैयार किए जा सकते हैं. रोबो मैन्युफैक्चरिंग का ऑटोमेशन कर सकते हैं और 3डी प्रिंटर्स से कहीं भी आधुनिक प्रोडक्ट तैयार करना संभव है.

इस तरह की टेक्नोलॉजी के विकास के लिए शिक्षा अहम है. एक से अधिक विषय का ज्ञान बहुत काम का है. आज पुरुषों से कहीं अधिक महिलाएं विज्ञान के विभिन्न विषय पढ़ रही हैं और सिलिकॉन वैली में लड़कों की तुलना में लड़कियों की शिक्षा और दिलचस्पी कहीं अधिक व्यापक है. अगर विभिन्न विषयों की शिक्षा को महिला की क्षमता और बेहतर काम करने की इच्छा से जोड़ दें तो बड़ा ताकतवर संयोग बनता है. इसीलिए मानवता की भारी चुनौतियों से पार पाने और दुनिया को बचाने में महिलाएं सर्वाधिक सक्षम हैं. इसीलिए उन्हें पढ़ाना और प्रेरित करना जरूरी है.

कंप्यूटर साइंस पढऩे वाली महिलाओं का अनुपात अमेरिका में 1987 में 37 प्रतिशत के स्तर से 2012 में गिरकर सिर्फ 17 प्रतिशत रह गया. लेकिन भारत में आइटी छात्राओं की संख्या बढ़ रही है. नैस्कॉम के अनुसार, आइटी की कई कंपनियों में 24 -32 प्रतिशत महिला कर्मचारी हैं, जबकि बीपीएम कारोबार में उनका अनुपात 34-42 प्रतिशत है और नए भर्ती कर्मचारियों में महिला अनुपात 38-40 प्रतिशत है.
भारत को अगर टेक्नोलॉजी के भविष्य पर हावी होने और अगला 100 अरब डॉलर का उद्योग खड़ा करने का सपना सच करना है, तो इनोवेशन इकोनॉमी में महिलाओं को वह भूमिका देनी होगी जिसकी वे हकदार हैं.

लेखक स्टैनफोर्ड लॉ स्कूल में फेलो और ड्यूक युनिवर्सिटी के प्रैट स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग में रिसर्च डायरेक्टर हैं. 

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