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बुलबुल के चमन पर फिर कड़की बर्क़

गौतम ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी कोर्ट के सदस्य के तौर पर अपने कार्यकाल के दौरान यह मुद्दा कभी नहीं उठाया. कानून निर्माता होने के नाते वे संसद में भी ये मुद्दा उठा सकते थे.
बुलबुल के चमन पर फिर कड़की बर्क़ नाराजगी हाल के बवाल के बाद दोषियों पर कार्रवाई की मांग के लिए आंदोलन करते एएमयू के विद्यार्थी; और
मोहम्मद आसिम सिद्दीकी 17 May 2018

यह 7 मार्च, 2018 की बात है और मौका था अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) के 65वें दीक्षांत समारोह का, जिसमें भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद मुख्य अतिथि थे. राष्ट्रपति यूनिवर्सिटी में छात्रों की ओर से किए गए स्वागत से अभिभूत थे.

स्वागत में बड़ी तादाद में छात्राएं भी शामिल थीं, जिन्होंने अपने बुद्धिबल से आधे से ज्यादा तमगे अपनी झोली में डाले थे. राष्ट्रपति ने एएमयू की भूमिका के कसीदे काढ़ते हुए यूनिवर्सिटी के कई प्रतिष्ठित पूर्व छात्रों के नाम याद किए.

उन्हें पूरा यकीन था कि यहां पढ़ाई कर रहे छात्र 'भारत भाग्य विधाता' हैं जो भविष्य में हिंदुस्तान की सेवा करेंगे. पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने सर सैयद अहमद खान की 200वीं सालगिरह पर बतौर मुख्य अतिथि एएमयू की तारीफ की थी और इसे भारतीय राष्ट्रवाद की मुकम्मल मिसाल बताया था, जहां विभिन्न मजहबी, जातीय, क्षेत्रीय और भाषायी पृष्ठभूमि से आए छात्र राष्ट्रवाद की अवधारणा को जीते हैं.

इस बार भी यह एएमयू और राष्ट्रवाद ही है, पर स्वर और मुद्राएं अलहदा हैं. एक हफ्ते से ज्यादा हुआ, एएमयू हर तरफ मीडिया ट्रायल का सामना कर रही है, जिसमें भाजपा के प्रवक्ता, दक्षिणपंथी बहसबाज और कुछ अति उत्साही ऐंकर यूनिवर्सिटी की तरफदारी में खड़े हरेक शख्स के लिए बड़ी बेरुखी से देशद्रोही और गद्दार सरीखे लफ्जों का इस्तेमाल कर रहे हैं.

मीडिया में कर्णभेदी आवाजें और ज्यादा तीखी हो गई हैं. प्राइम टाइम टेलीविजन की कुछ सुर्खियां चीखते हुए पुकार रही थीं— 'जिन्ना का जिन्न', 'एएमयू जिन्ना से कब आजाद होगा', 'एएमयू संस्थापकों का जश्न मनाएगा या जिन्ना का'. यूनिवर्सिटी के स्टुडेंट्स यूनियन हॉल में मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर के मुद्दे ने देश की दूसरी बुरी या अच्छी खबरों को अपनी छाया से ढक लिया है.

यह सब 30 अप्रैल की एक चिट्ठी से शुरू हुआ, जो अलीगढ़ के सांसद सतीश गौतम ने एएमयू के वाइस चांसलर (वीसी) प्रोफेसर तारिक मंसूर को लिखी थी. इसमें उन्होंने वीसी से यूनिवर्सिटी के स्टुडेंट्स यूनियन हॉल की दीवार पर टंगी मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर को हटाने के लिए कहा था.

इससे पहले कि यह चिट्ठी वीसी के दफ्तर को मिलती, मीडिया में इसकी चर्चा होने लगी. चिट्ठी के जवाब का इंतजार किए बगैर और यूनिवर्सिटी को फैसला लेने का जरा भी वक्त दिए बगैर हिंदू जागरण मंच, हिंदू युवा वाहिनी और एबीवीपी के सहयोगी संगठनों के लोग 2 मई को कैंपस में धड़धड़ाते हुए घुस आए.

उन्होंने यूनिवर्सिटी के सुरक्षा कर्मचारियों के साथ मार-पीट करने के साथ धमकी भरे और आपत्तिजनक नारे लगाए. चिट्ठी लिखने का यह वक्त, हिंसा और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में इस पर योजनाबद्ध बहसों ने एक ऐसा मुद्दा खड़ा कर दिया जिसमें वोटों का ध्रुवीकरण करने की ताकत और संभावना है, खासकर तब जब कर्नाटक के चुनाव इतने नजदीक थे और 2019 का मिशन भी सामने दिखाई दे रहा था. मुसलमान, एएमयू, जिन्ना और तथाकथित 'गद्दारों की फौज' सिर चढ़कर बोलने वाले कॉकटेल का मसाला थी.

गौतम ने एएमयू के निर्णय लेने वाले सबसे ऊंचे निकाय अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी कोर्ट के सदस्य के तौर पर अपने कार्यकाल के दौरान यह मुद्दा कभी नहीं उठाया. कानून निर्माता होने के नाते वे संसद में भी यह मुद्दा उठा सकते थे और देश में जिन्ना की तमाम तस्वीरों पर पाबंदी का कानून बनाने के लिए जोर डाल सकते थे.

तस्वीर लगाने को लेकर चल रही बहस में एएमयू के छात्रों के खिलाफ बर्बर पुलिस कार्रवाई के मुद्दे को भी मिला दिया गया. यह कार्रवाई उनके खिलाफ तब की गई जब वे कैंपस में दक्षिणपंथी शोहदों के जबरन दाखिल होने के खिलाफ एफआइआर दर्ज करवाने गए थे.

एएमयू के छात्रों पर इस पुलिस कार्रवाई से तकरीबन पूरा कैंपस यूनिवर्सिटी की सड़क पर आ गया और दोषियों की गिरफ्तारी के साथ घटना की न्यायिक जांच की मांग करने लगा. एएमयू टीचर्स एसोसिएशन ने भी 3 मई को हुई अपनी सामान्य सभा की बैठक में छात्रों को पूरे दिल से अपना समर्थन दिया.

पुलिस कार्रवाई के खिलाफ प्रदर्शन करते एएमयू छात्रों की तस्वीरें चैतरफा फैलाई गई हैं. अलबत्ता विरोध प्रदर्शन करते एएमयू छात्रों की ठीक यही वे तस्वीरें हैं जिनका इस्तेमाल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सोशल नेटवर्किंग साइटों ने उन्हें जिन्ना के समर्थक और हमदर्द के तौर पर पेश करने के लिए किया है.

छात्रों की विशाल भीड़ को दिखाती इन तस्वीरों के साथ गुमराह करने वाले कैप्शन लगाकर उन्हें बहुत शरारती ढंग से जिन्ना के प्रति उनके समर्थन के सबूत के तौर पर पेश किया गया. हकीकत यह है कि एएमयू का कोई भी छात्र या शिक्षक जिन्ना का न तो समर्थक है और न ही हमदर्द.

जिन्ना एएमयू के हर शख्स के लिए इतिहास हैं—एक तकलीफदेह इतिहास. एएमयू छात्रों का एक नारा उनके रुख को बयान करता है, ''जिन्ना इतिहास है, आस्था नहीं.''

यूनियन हॉल में जिन्ना की तस्वीर 1938 से ही लगी है, जब उन्हें एएमयू स्टुडेंट यूनियन की आजीवन सदस्यता से नवाजा गया था. यह वहां कई दूसरों की तस्वीरों के साथ लगी है, जिनमें गांधीजी, जवाहरलाल नेहरू, बी.आर.

आंबेडकर और जिन्ना के कट्टर आलोचक अबुल कलाम आजाद भी शामिल हैं. यह तस्वीर वहां ऐतिहासिक अभिलेख के तौर पर है. इसकी पुरातात्विक अहमियत है. यह अविभाजित हिंदुस्तान के इतिहास का अभिलेख है.

यूनिवर्सिटी में एक राय यह है कि चीजें जिन्ना की तस्वीर पर मुमकिन है कि न रुकें. अगर जिन्ना की तस्वीर हटा भी ली जाती है, तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि दूसरी ऐतिहासिक शख्सियतों की तस्वीरें हटाने और उनके नाम पर कायम कुछ इमारतों के नाम बदलने की मांगें नहीं उठेंगी.

मांग यह भी हो सकती है कि मुहम्मद इकबाल की तस्वीरें हटाई जाएं और उन्हें पाठ्यक्रम से पूरी तरह निकालकर बाहर किया जाए. फिर तो सर सैयद अहमद खान की तस्वीर भी कुछ लोगों को परेशानी का सबब लग सकती है.

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी ने पहले भी दुष्प्रचार और पूर्वग्रहों का सामना किया है. सतीश गौतम की अगुआई में 2014 में भाजपा के नेता चाहते थे कि एएमयू राजा महेंद्र प्रताप सिंह की 128वीं जयंती का उत्सव मनाए और इस दिन छुट्टी का ऐलान करे.

विडंबना तो यह है कि राजा ने, जिनका मौजूदा विवाद में भी जिक्र आया है, हमेशा जनसंघ की मुखालिफत की और 1957 का संसदीय चुनाव उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ जीता था. वाजपेयी जमानत तक नहीं बचा पाए थे. वाम रुझान वाले राजा जिनकी तस्वीर यूनिवर्सिटी की सेंट्रल लाइब्रेरी की दीवार की शोभा बढ़ा रही है, उनका दक्षिणपंथी विचारधारा में कुछ भी साझा नहीं था.

नवंबर 2014 में अंडरग्रेजुएट छात्राओं को यूनिवर्सिटी की सेंट्रल लाइब्रेरी की सदस्यता नहीं देने के मुद्दे का इस्तेमाल समूची यूनिवर्सिटी को दकियानूसी, प्रतिगामी और पितृसत्तात्मक करार देने के लिए किया गया.

पिछले साल यूनिवर्सिटी की एक कैंटीन में गोमांस परोसे जाने का झूठा और उकसाऊ आरोप लगाया गया. उसी साल यह भी आरोप लगाया गया कि हिंदू छात्रों को रमजान के दौरान भूखे रहने को मजबूर किया जा रहा है, जो बेशक सच नहीं था.

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक दर्जे को लेकर मौजूदा सरकार का रुख बड़ी चिंता का विषय है—यूनिवर्सिटी के छात्रों और शिक्षकों के लिए ही नहीं, बल्कि हिंदुस्तान के समूचे मुस्लिम समुदाय के लिए भी.

सरकार ने 1967 के अजीज बाशा बनाम भारत संघ मुकदमे के फैसले की हिमायत की है, जिसमें कहा गया था कि एएमयू को मुसलमानों ने 'स्थापित' नहीं किया है और वह इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 2006 के उस आदेश को चुनौती देने से पीछे हट गई है, जिसमें एएमयू के अल्पसंख्यक स्वरूप को मानने से इनकार कर दिया गया है. केस की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है.

यह यूनिवर्सिटी मुसलमानों के लिए आधुनिक तालीम के सर सैयद अहमद खान (1817-1898) के विजन को पूरा करती है. 1857 के विद्रोह के बाद मुसलमानों का दमन होता देखकर फिक्रमंद सर सैयद को मुसलमानों के लिए तालीम और सुधार की जरूरत का अहसास हुआ. 1877 में उन्होंने अलीगढ़ में मोहम्मडन-एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज की स्थापना की, जो 1920 में यूनिवर्सिटी बना.

शुरुआत में ऑक्सब्रिज मॉडल पर बनाई गई एएमयू मोटे तौर पर आवासीय यूनिवर्सिटी है, जहां आज पढ़ाई के सैकड़ों पाठ्यक्रम और प्रोग्राम चलाए जाते हैं और दुनिया भर के तमाम हिस्सों से छात्र-छात्राएं यहां पढ़ने आते हैं.

लाला अमरनाथ से लेकर सैयद मुश्ताक और जफर इकबाल तक, इस्मत चुगताई से लेकर राही मासूम रजा तक और जावेद अक्चतर से लेकर नसीरुद्दीन शाह तक एएमयू के पूर्व छात्रों की फेहरिस्त में शामिल नामवर शख्सियतें हैं.

यह यूनिवर्सिटी आज मुल्क की सबसे अव्वल संस्थाओं में शुमार की जाती है. हकीकत तो यह है कि टाइम्स हायर एजुकेशन रैंकिंग ने एएमयू को दुनिया की 301-400 बेहतरीन यूनिवर्सिटियों के खाने में रखा है.

मानव विकास मंत्रालय ने हाल ही में नेशनल इंस्टीट्यूट रैंकिंग फ्रेमवर्क (एनआइआरएफ) की जो रैंकिंग जारी की है, उसमें एएमयू भारतीय विश्वविद्यालयों में 10वें पायदान पर है. इतने बेहतरीन संस्थान को राजनीति का अड्डा बनाना दुर्भाग्यपूर्ण है.

लेखक अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी पढ़ाते हैं.

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