एडवांस्ड सर्च

हिंदिस्तान का बेतुका नजरिया

यह 'हिंदी' कौमी या जनता की हिंदी से बुनियादी तौर पर अलग है. यही वह 'हिंदी' है जिसे मैं 'गुरुग्राम' और 'प्रयागराज' से जोड़ता हूं, जो तत्सम की अभिलाषा से बदसूरत हो चुकी है. उस अभिलाषा से, जो काल और इतिहास के क्रम को उलटना चाहती है.

Advertisement
aajtak.in
aajtak.in नई दिल्ली, 27 September 2019
हिंदिस्तान का बेतुका नजरिया आलोक राय

आलोक राय

हमारा राजनैतिक जीवन जोड़तोड़ और छल-प्रपंचों में महारत की ऐसी खान बन गया है कि यह समझना मुश्किल है कि हिंदी के राष्ट्रीय भाषा होने, या बनने, को लेकर अमित शाह के आकस्मिक विस्फोट का क्या अर्थ लगाया जाए. आखिरकार यह खबरों के सिलसिले को अपने हिसाब से फेंटने और लगातार आ रही बुरी खबरों से ध्यान भटकाने की कोशिश भी हो सकती है.

तमिलनाडु और दक्षिण की तरफ कुछेक हिंदी-विरोधी प्रदर्शन हुए नहीं कि घाटी का संकट लोगों की यादों में धुंधला पड़ जाएगा और उसमें तिरोहित हो जाएगा, जिसे वे 'सामान्य हालात' कहकर खुश होते हैं —जिसके मायने हैं चारों तरफ कंटीले तार की बाड़बंदी और वीरान सड़कों पर गश्त लगाते अक्रस्पा (सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून) से महफूज बंदूकधारी सैनिक. आर्थिक संकट के भी जल्दी खत्म होने के कोई आसार नहीं है—इसमें साधारण गणित नहीं, बल्कि पीयूष गोयल का ''क्वांटम अर्थशास्त्र'' शायद काम आए, वह भी हिंदी की थोड़ी-सी मदद से.

या यह भी हो सकता है कि अमित शाह महज हवा का रुख भांपने के लिए पतंग उड़ा रहे हों, लोगों की संभावित प्रतिक्रिया जानने की गरज से. ऐसे में अक्लमंद प्रतिक्रिया यही होगी कि इस उकसावे को अनदेखा कर दिया जाए और इस नादानी के, जिसका वादा किया गया है, असल नीति बनने का इंतजार किया जाए. लेकिन—और ठीक यहीं कठपुतलियां नचाने वाला कठपुतलियों पर अपने नियंत्रण का प्रदर्शन करता है—कुछ फौरन चीखने-चिल्लाने और उछल-कूद करने लगे. मेरी राय में विरोध के इस तमाशे के बजाए उदास खामोशी बेहतर है. आखिकार हम हिंदी को बराबर वालों में प्रथम बनाने के, एक स्तर पर हानिरहित, इस सुझाव से ज्यादा बड़े गुस्से का इजहार देख चुके हैं.

बेशक सिवा इसके कि यह जाहिरा मासूमियत अपने आप में कुटिल पैंतरा, आखिरी जानलेवा झटके से पहले रिझाने वाली मुस्कान, हो सकती है. इस राजनैतिक खेल के दूसरे कई खिलाडिय़ों के उलट, संघियों की एक असल विचारधारा है—और हकीकत यह भी है कि भगवा फौजें अपने जहरीले लक्ष्यों की खोज में अथक जुटी रहती हैं. इस स्तर पर हिंदी—एक खास किस्म की हिंदी—उनके कोर एजेंडे का एक बड़ा हिस्सा है.

इस मुकाम पर यह तर्क मेरे लिए खास तौर पर मुश्किल हो जाता है—क्योंकि आखिरकार मैं खुद को हिंदी वाले के तौर पर ही देखता हूं, जो मानता है कि हिंदी में खासकर हिंदी प्रदेशों की लोकतांत्रिक ऊर्जा को लामबंद करने की अकूत क्षमता है, जो आज अपने को इतने विकृत, जहरीले रूपों में व्यक्त कर रहे हैं. यह वह हिंदी है जो सहस्राब्दी के दौरान व्यावहारिक तौर पर इस महान देश के समूचे विस्तार में साझा जिंदगी जीने वाले लोगों के बीच संचार के माध्यम के तौर पर विकसित हुई है.

यह वह भाषा है जिसमें स्थानीय और क्षेत्रीय बोलियों के अनंत रूप समाहित हैं, जो सभी मिलकर निरंतर संचार के लिए पर्याप्त हैं और जिसकी लोगों को सबसे ज्यादा जरूरत है. मोटे तौर पर बंबई के सिनेमा की बदौलत यह हिंदी व्यावहारिक तौर पर पहले ही 'राष्ट्रीय' हो चुकी है. बेशक, इस हिंदी पर काम करने—बहुत सारा काम करने—की जरूरत है ताकि यह उच्चतर दर्जे की पंजिकाओं का निर्माण कर सके, ज्ञान की वाहक और भंडार बन सके. और संघी मंत्रियों की जबान से नियमित झरने वाली मूर्खताओं से असंबद्ध रह सके.

मगर इस सचमुच मुश्किल काम में उस एक और शुद्धतावादी 'हिंदी' की दखल से कोई मदद नहीं मिलती, जो 20वीं सदी की शुरुआत में उभरी थी. यह हृदय प्रदेश के सवर्ण हिंदुओं की उन हमेशा भव्य से भव्य होती जाती महत्वाकांक्षाओं की वाहक थी, जो औपनिवेशिक प्रशासन में निचली पायदान की नौकरियां हासिल करने से लंबी दूरी तय करके उपनिवेशकों की अंग्रेजी को स्वतंत्र भारत की राष्ट्रीय भाषा के रूप में विस्थापित करने तक आ गईं.

संविधान सभा ने इस प्रवृत्ति को लेकर उचित ही आगाह किया था और उस वक्त भी इसे 'हिंदी साम्राज्यवाद' माना था. यह 'हिंदी' कौमी या जनता की हिंदी से बुनियादी तौर पर अलग है. यही वह 'हिंदी' है जिसे मैं 'गुरुग्राम' और 'प्रयागराज' से जोड़ता हूं, जो तत्सम की अभिलाषा से बदसूरत हो चुकी है. उस अभिलाषा से, जो काल और इतिहास के क्रम को उलटना चाहती है और हमें, भाषा वगैरह को, उस ब्राह्मणवादी—आर्य, निश्चित रूप से संस्कृतनिष्ठ, शुद्धता की मिथकीय अवस्था में वापस ले जाना चाहती है, जिसे महज होने की 'पहचान' से मुक्ति दिलाकर शुद्ध तथा एकांग 'पहचान' अवस्था में बहाल किया जा सके. जैसे, एक राष्ट्र, एक संस्कृति, एक भाषा... और—क्यों नहीं?—एक दलीय लोकतंत्र भी.

यह खतरनाक बकवास है और इसे खुलकर कहा जाना चाहिए. हम बहु-सांस्कृतिक, बहु-भाषाई, बहु-धार्मिक देश हैं— विविधता के उत्सव, महापर्व जैसे. हमारे राज्यतंत्र का ढीला-ढाला, संघीय स्वरूप संवैधानिक बुद्धिमता है, कमजोरी की निशानी नहीं. जैसा हमारे संविधान-निर्माताओं ने परिकल्पना की थी, इसे हल्के हाथों से थामे रखा जाए तो यह ढांचा टिका रहेगा. लेकिन बहुत ज्यादा बहुसंख्यक दबाव डाला—जैसी भी, जहां भी कतरब्यौंत के साथ—तो पारंपरिक, आनुवंशिक, ऐतिहासिक दरारें खुलने लगेंगी, टूटने लगेंगी. ढांचे दबाव में टूट जाते हैं. यह बताना सीधा-सादा भौतिकशास्त्र है, राजद्रोह नहीं.

आलोक राय लेखक, अनुवादक और अंग्रेजी के पूर्व प्रोफेसर हैं.

***

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay