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यह आजादी की नई जंग है

समलैंगिकता के अपराधीकरण के खिलाफ उठा लोगों का गुस्सा इस एहसास का नतीजा है कि पुराना सत्ता प्रतिष्ठान नागरिकों को उनके अधिकार नहीं देना चाहता है और भारत पर अपना प्रतिक्रियावादी पूर्वाग्रह थोपना चाहता है.

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वीर संघवीनई दिल्ली, 01 January 2014
यह आजादी की नई जंग है

इस बात पर यकीन करना बहुत अजीब लगेगा कि समलैंगिकता पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शन और दिल्ली के विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी (आप) के जोरदार प्रदर्शन के बीच आपस में किसी तरह का रिश्ता है. पहली नजर में इन दोनों मुद्दों का आपस में कोई संबंध नजर नहीं आता है. लेकिन इस संबंध को समझने के लिए आपको अपने आप से सिर्फ यह सवाल पूछना हैः क्या इनमें से कोई भी घटना आज से दस साल या पांच साल पहले संभव थी. अगर कुछ साल पहले किसी ने आपसे कहा होता कि एक आरटीआइ कार्यकर्ता, एक चुनाव विश्लेषक और एक वकील कोई राजनैतिक पार्टी बनाएंगे और वह पार्टी सदन में लगभग सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरेगी तो आप उसे निरा मूर्ख ही समझते. यहां तक कि तीन साल पहले जब अण्णा हजारे का आंदोलन अपने चरम पर था, तब भी राजनेताओं का यही मानना था कि आंदोलन करने वालों से कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि उनकी कोई चुनावी जमीन नहीं है.

अब जरा समलैंगिकता के मुद्दे को लेते हैं. पांच साल पहले जब हम में से कई लोगों ने ऐसे लेख लिखे थे कि जो समाज समलैंगिक लोगों के साथ भेदभाव करता हो, वह खुद को उदार या जनतांत्रिक बताने का दावा नहीं कर सकता है. उस समय ऐसी बात बोलने वाले हमारे जैसे लोगों की संख्या लगभग नगण्य थी. उस समय किसी ने भी यह नहीं सोचा था कि समलैंगिकों के अधिकारों की लड़ाई एक दिन ऐसी स्थिति में पहुंच जाएगी कि उसके पक्ष में हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर उतर आएंगे, जैसा कि 15 दिसंबर को भारत के शहरों में देखने को मिला. लोग सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ प्रदर्शन करते दिखाई दिए. समलैंगिकों के अधिकारों के पक्ष में लोगों की इतनी जबरदस्त प्रतिक्रिया देखकर मैं सचमुच स्तब्ध हूं. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन प्रदर्शनों में तमाम ऐसे लोग भी शामिल थे, जिनका निजी तौर पर समलैंगिकता से कुछ भी लेना-देना नहीं था.

अगर इन दो घटनाओं से आपको यकीन नहीं होता है कि भारत में आज कुछ नया हो रहा है तो एक साल पहले की दिल्ली गैंग रेप की घटना पर गौर कीजिए. उस समय जनता का जैसा गुस्सा देखने को मिला, वह अभूतपूर्व था. दिल्ली में किसी महिला के खिलाफ दरिंदगी की वह कोई पहली घटना नहीं थी. उससे पहले भी ऐसी कई घटनाएं हो चुकी थीं. दिल्ली गैंग रेप की घटना में न तो पीड़िता कोई नामी-गिरामी हस्ती थी, न ही वह किसी बड़े परिवार से जुड़ी हुई थी. इसके बावजूद इस घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया. हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर उतरकर अपना गुस्सा जाहिर करने लगे. उस आंदोलन में न तो कोई नेता था, न ही उसके पीछे कोई छिपा एजेंडा था. इसके पीछे जागरूक नागरिकों का सचमुच का गुस्सा था. ये घटनाएं दिखाती हैं कि सत्ता प्रतिष्ठान द्वारा दशकों से हल्के में लिए जाने के बाद शहरी भारत अब अपनी आवाज बुलंद करने लगा है.

यह लड़ाई किसी राजनैतिक पार्टी के खिलाफ नहीं है. गैंग रेप के खिलाफ लोगों का गुस्सा पुलिस और सभी नेताओं के खिलाफ  था क्योंकि वे उनकी बेटियों और बहनों को सुरक्षा देने में नाकाम साबित हो चुके थे. समलैंगिकता के अपराधीकरण के खिलाफ उठा लोगों का गुस्सा इस एहसास का नतीजा है कि पुराना सत्ता प्रतिष्ठान (जिसमें न्यायपालिका भी शामिल है) नागरिकों को उनके अधिकार नहीं देना चाहता है और भारत पर अपना प्रतिक्रियावादी पूर्वाग्रह थोपना चाहता है. ‘‘आप’’ को लोगों का जो जबरदस्त समर्थन मिला, वह दरअसल इस बात का संकेत है कि लोग पुरानी राजनैतिक पार्टियों से ऊब चुके हैं और अब बदलाव चाहते हैं.

ऐसा क्यों हो रहा है? इसके कई कारण हैं. आज का मध्यवर्ग पहले से कहीं ज्यादा बड़ा है और आत्मविश्वास से भरा हुआ है. भारत का शिक्षित वर्ग खुद को पश्चिमी समाज के बराबर समझने लगा है. लेकिन यूरोप और अमेरिका में राजनैतिक व्यवस्था जहां पहले दर्जे की है, वहीं हम अब भी तीसरे दर्जे के राजनैतिकों और तीसरे दर्जे के शासन और न्याय में फंसे हुए हैं. लोग जानना चाहते हैं कि आखिर क्यों हम इसे सहन करें? आज भारत में शिक्षित लोगों की जितनी विशाल संख्या है, उतनी पहले कभी नहीं थी. सोशल मीडिया न सिर्फ लोगों की आवाज और उनका गुस्सा जाहिर करने का माध्यम बन गया है, बल्कि वह विरोध के स्वर और भावनाओं को गोलबंद करने में भी मदद करता है.

हम अपनी विशाल आबादी के फायदों के बारे में काफी सुन चुके हैं, जैसा कि 30 साल से कम उम्र के युवाओं की बहुसंख्यक आबादी होने से हमारी अर्थव्यवस्था को लाभ मिलेगा. पर किसी ने शायद यह नहीं सोचा है कि युवाओं की यह विशाल आबादी हमारी राजनीति और हमारे समाज को किस तरह प्रभावित करेगी. हमारी नई पीढ़ी अपने माता-पिता के उदाहरण का अनुकरण करते हुए सबकुछ चुपचाप सहन करने वाली नहीं है. यह वह पीढ़ी है, जो अपनी आवाज बुलंद करना जानती है. जनतंत्र तभी सबसे ज्यादा कारगर होता है, जब वहां के नागरिक न सिर्फ अपनी मांग को लेकर आवाज उठाते हैं, बल्कि दूसरों के लिए भी समान अधिकारों की मांग करते हैं. और अब शिक्षित भारतीय यही कर रहा है. पिछले दो हफ्तों की घटनाओं को अगर एक संकेत माना जाए तो यह पीढ़ी एक नए भारत का निर्माण होने तक चुप बैठने वाली नहीं है.

(वीर संघवी एक स्तंभकार और टीवी ऐंकर हैं)

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