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छंद बंध तोड़ छटपटाता वक्त

खरे की बहुत-सी कविताएं गद्य की वापसी की कविताएं हैं. ये लंबे समय तक अपने ठोस गद्य और कहानीपन के साथ पाठकों के पास बनी रहती हैं.

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निशांतनई दिल्ली, 24 July 2019
छंद बंध तोड़ छटपटाता वक्त सेतू समग्रः कविता

विष्णु खरे एक विलक्षण कवि हैं—लगभग लासानी'' और ''विष्णु खरे की कविताएं हिंदी भाषा के सामर्थ को कई तरह के विषयों में ले जाकर विस्तृत और स्थित करती हैं.'' पहला वाक्य कवि केदारनाथ सिंह का है और दूसरा कुंवर नारायण का. हमारे समय के दो श्रेष्ठ कवियों ने विष्णु खरे के कवि को विलक्षण और विस्तृत पाया है, उसकी प्रशंसा की है और वह भी पूरे मनोयोग से उन्हें पढ़ते हुए. आजादी के बाद मुक्तिबोध की परंपरा के वे सबसे बड़े कवि हैं और अपने ढंग के अनूठे.

अभी-अभी सेतु प्रकाशन से खरे की सगमग्र कविताओं का संचयन सेतु समग्र: कविता/ विष्णु खरे नाम से आया है. इसकी भूमिका में हमारे समय के वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल लिखते हैं: ''कविता के संसार में ऐसे रचनाकार हमेशा से कम रहे हैं, जिन्होंने कविता में प्रस्थापना-परिवर्तन किया और कविता के इतिहास में भी बदलाव किया.'' यह इस भूमिका का पहला वाक्य है.

हिंदी कविता का इतिहास कोई छोटा-मोटा इतिहास नहीं. वह हिंदी समाज और हिंदी जाति का भी इतिहास है. समय और समाज ने जैसे-जैसे करवट बदली, कवियों ने उसे अपनी कविता में दर्ज किया. चारण-भाट काल से लेकर उदारीकरण तक के समय को. 1972 की आलोचना में छपी टेबिल कविता से खरे ने हिंदी कविता के मिजाज को बदलना शुरू किया और सातवें संग्रह और अन्य कविताएं तक आते-आते कविता के इतिहास में बदलाव कर डाले. कविता को उन्होंने आम आदमी के आक्रोश की भाषा में तब्दील कर दिया. आक्रोश की अभिव्यक्ति में ही उनकी कविताएं गद्यमय होती गईं.

कभी कविता के लिए आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा था, ''जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है.''   कहां हृदय है और कहां आत्मा, यह सवाल जाने भी दें तो इस कथ्य में रसदशा और ज्ञानदशा की बात कही गई है. खरे की कविता में बुद्धि और हृदय दोनों का मणिकांचन संयोग नजर आता है, मुक्तिबोध के शब्दों में ज्ञानात्मक संवेदना की तरह.

उनकी कई कविताएं एक तरफ सोचने को विवश करती हैं तो दूसरी तरफ रोने को, ठीक मार खा रोई नहीं की तरह. उनकी बेटी कविता अपनी बेटी पर लिखी गई नहीं है. उसका पहला वाक्य देखिए: जाने से पहले उसने कहा/ अपनी बेटी समझकर ही मुझे रख लीजिए. और अंतिम बंध है: ''सुबह फिर निकल जाती हैं मेरी हजारों बेटियां/ एक परेशान, डरी हुई, अपमानित उम्मीद लिए/ अपने असली पिताओं से अलग उस पिता की तलाश में/जो उन्हें बेटी के काबिल माने न माने, रख तो ले. यह कविता 'बुलंद भारत' की दयनीय तस्वीर दिखलाती है.

हमारे समय के भयावह सच को खरे की एक और कविता संकेत देखती-पकड़ती है: ठूंठों पर बैठे गिद्ध और चील शवों की घात में नीचे देखते हैं/कोकिलों, शुकों, मयूरों, चातकों के कंठ से/लपटें और चीत्कार निकलती हैं/वे ध्वजों पर बैठकर उन्हें नोच डालते हैं. महाभारत के समय का आधुनिक वर्जन मानी जाने वाली इस लंबी कविता का अंश हमें बतलाता है कि हम ऐसे समय में जी रहे हैं/ जहां गिद्ध घरों में घुस आते हैं और हम चिल्ला तक नहीं सकते.

खरे पर गद्य में कविता लिखने का आरोप लगा है. महावीर प्रसाद द्विवेदी का एक कथन है, ''गद्य और पद्य दोनों में कविता हो सकती है.'' खरे की बहुत-सी कविताएं गद्य की वापसी की कविताएं हैं. ये लंबे समय तक अपने ठोस गद्य और कहानीपन के साथ पाठकों के पास बनी रहती हैं.

पाठक खीज सकता है पर उनकी उपस्थिति को नकार नहीं सकता. खरे के पास नकार की भाषा है लेकिन यह नकार इसी समय की देन है. यह नकार कुछ न कर पाने की बेचैनी से उपजता है. इस नकार की वजह से उनकी भाषा अधिक जटिल हो सकती थी लेकिन उनके लालित्यमय गद्य ने इसे बचा लिया. कविता में इतने लालित्यमय गद्य का प्रयोग विष्णु खरे की खासियत है. इसके लिए उनकी कविताएं याद की जाएंगी.

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