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साधारण जीवन की विराट दृष्टि

वीरेन की कविताओं में जीवन का उल्लास है, मनमौजीपन और फक्कड़पन है.
साधारण जीवन की विराट दृष्टि कविता वीरेन
संजय कुंदन 01 August 2018

पुस्तक का नाम कविता वीरेनः वीरेन डंगवाल की संपूर्ण कविताएं, प्रकाशकः नवारुण प्रकाशन, गाजियाबाद, कीमत 475 रु.

पूरी मनुष्यता के प्रति गहरा सरोकार रखने वाले कवि की प्रकाशित-अप्रकाशित, अनूदित कविताओं का संकलन

कविता वीरेन में हिंदी के प्रसिद्ध कवि दिवंगत वीरेन डंगवाल की सभी प्रकाशित-अप्रकाशित और उनकी अनूदित कविताएं संकलित की गई हैं, जिसकी भूमिका उनके समकालीन कवि मंगलेश डबराल ने लिखी है.

डंगवाल के बारे में उनके एक समकालीन कवि आलोक धन्वा ने ठीक ही कहा है कि वीरेन हिंदी के जातीय कवि हैं. वीरेन को हिंदी क्षेत्र के भूगोल और समाज की जितनी पहचान और परख थी, उतनी कम ही कवियों को रही है.

वीरेन की कविताओं में तमाम तरह के फल-फूल, अनाज, ऋतुएं, पशु-पक्षी, त्यौहार और मुहावरे आते हैं. इस दृष्टि से कहा जा सकता है कि वे नागार्जुन-त्रिलोचन की परंपरा में हैं. पर वीरेन की कविताएं इस मायने में अलग हैं कि वे गांवों से ज्यादा कस्बों और छोटे शहरों की पृष्ठभूमि में रची-बसी हैं.

लेकिन उनकी काव्यदृष्टि देशकाल की सीमाओं के पार जाती है. उनका सरोकार पूरी मनुष्यता के प्रति है. उनका अपने परिवेश से गहरा लगाव रहा है. न सिर्फ उसकी प्रकृति और मनुष्य से बल्कि निर्जीव वस्तुओं से भी. वीरेन साधारण से साधारण वस्तुओं को पूरा सम्मान देते हुए उनके भीतर की साधारणता को उद्घाटित करते हैं.

इस तरह वे जीवन की गरिमा को स्थापित करते हैं. वीरेन का मानना है कि प्रेम और करुणा ने ही मनुष्य को मनुष्य बनाया है. आज जीवन में तमाम तरह की विकृतियां इनसे दूर होने के कारण आई हैं.

फरमाइशें उनकी एक दिलचस्प कविता है जिसमें वे कहते हैं—कुत्ते मुझे थोड़ा-सा अपना स्नेह दे/गाय ममता भालू मुझे दे दे यार/शहद के लिए थोड़ा/अपना मर्दाना प्यार/भैंस दे थोड़ा बैरागीपन बंदर फुर्ती/अपनी अक्ल से मुझे बख्शे रहना सियार.

वीरेन की कविताओं में जीवन का उल्लास है, मनमौजीपन और फक्कड़पन है. लेकिन वे जीवन के अंधेरे कोनों को भी अच्छी तरह जानते हैं और उसकी पड़ताल करते हैं. तमाम विसंगतियों पर भी उनकी कड़ी नजर रही है और शोषणमूलक व्यवस्था की परतों को भी उन्होंने उजागर किया है लेकिन ऐसा करते हुए भी उनका स्वर बहुत कर्कश नहीं होता.

दुख कविता में वे कहते हैंरू नकली दुखी आदमी की आवाज में/टीन का पत्तर बजता है/ मसलन मारे गए लोगों पर/ राजपुरुष का रुंधा हुआ गला. इन नकली लोगों ने धूर्तता और बेईमानी से कमजोर तबके का शोषण करके तमाम साधन अर्जित कर रखे हैं.

उनकी चमक-दमक को देखकर आम आदमी को अपनी ईमानदारी व्यर्थ लगने लगती है. लेकिन वीरेन साफ कहते हैं कि अनुचित तरीके से हासिल की गई समृद्धि को कभी जायज नहीं ठहराया जा सकता.

बेईमानों, शोषकों और नक्कालों की एकता को वीरेन अच्छी तरह जानते हैं. लेकिन उन्हें यकीन है कि इनके विरोध में जनता भी एकजुट होगी. वे कहते हैं "इन्हीं सड़कों से चलकर/आते रहे हैं आततायी/इन्हीं पर चलकर आएंगे/हमारे भी जन. कवि का स्पष्ट इशारा है कि हमारे जन आकर हालात को बदलेंगे.

उनकी कोशिशों से अंधेरा छंट जाएगा और उजले दिन आएंगे. कवि के शब्दों में—आए हैं जब हम चलकर इतने लाख वर्ष/इसके आगे भी तब चलकर ही जाएंगे/आएंगे, उजले दिन जरूर आएंगे.

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