एडवांस्ड सर्च

वैश्रवणी: शूर्पणखा की दृष्टि से मर्यादापुरुषोत्तम राम की पड़ताल

भारतीय पौराणिक कथाओं ने शूर्णनखा को खलनायिका बना दिया है. लेकिन यह उपन्यास न सिर्फ उसको सशक्त और नए अंदाज में पेश करती है बल्कि पुरूषों की मर्यादा के प्रतिनिधि राम पर सवाल खड़े करती है.

Advertisement
aajtak.in
सरोज कुमार 24 July 2014
वैश्रवणी: शूर्पणखा की दृष्टि से मर्यादापुरुषोत्तम राम की पड़ताल

वैश्रवणी
लेखक: डॉ. ममतामयी चौधरी
प्रकाशक: हिंद पॉकेट बुक्स प्रा.लि., जे-40, जोरबाग लेन, नई दिल्ली-110003
कीमत: 150 रु.

भारतीय पौराणिक कथाओं ने रावण की बहन शूर्पणखा को खलनायिका बना दिया...लेकिन यह उपन्यास न सिर्फ उसके बहाने स्त्री आजादी के पक्षों को रखता है बल्कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम की भी नए सिरे से पड़ताल करता है. पुरुषों की मर्यादा के खिलाफ स्त्री विद्रोह की कथा है.
''छल, बल, कौशल से अपने को संसार भर में श्रेष्ठ तथा महान प्रतिपादित करने का लोभ जो तुम्हारे भीतर जड़ जमाए हुए है, उसे मैं अच्छी तरह देख सकती हूं. चाहे तुम उसे लाख आवरण से छिपाने का प्रयास क्यों न करो.” ''तुमने अहिल्या को चरणों से स्पर्श क्यों किया? किसी भी समाज की उन्नति नारी को समुचित सम्मान दिए बिना हो नहीं सकती. क्या यह तुम जानते नहीं हो!” यूं तो उपन्यास में हर क्षण शूर्पणखा के चरित्र के बहाने स्त्री आजादी और उसके अधिकारों की आवाज मुखर होती है. लेकिन इसमें वैश्रवणी उर्फ शूर्पणखा के ये कथन कुछ सूत्र हैं जो उपन्यास के मर्म को साझ करते हैं. भारतीय धार्मिक इतिहास ने पुरुषों की मर्यादा बढ़ाने के लिए राम जैसे चरित्रों को गढ़ा और वैश्रवणी जैसे स्त्री चरित्र को खलनायिका बना दिया. इसकी वजह शायद यही है कि पुरुषों की गढ़ी इन कथाओं ने नैतिकता की सारी ठेकेदारी स्त्रियों के कंधों पर डाल दी. शूर्पणखा का प्रसंग इसी की बानगी है. उपन्यास यह सवाल उठाता है कि एक स्त्री जो सिर्फ अपने प्रेम को अभि-व्यक्ति करती है, उसकी नाक काट लेना, कहां की मर्यादा है. इस कथा के बहाने ओडिया लेखिका चौधरी न सिर्फ शूर्पणखा के पक्ष को रखने में सफल हैं बल्कि अहिल्या, मंदोदरी, तारा जैसे स्त्री चरित्रों के बहाने पुरुषों की ओर से किए गए देवताओं के छल-कपट को भी उजागर करती हैं. फिर चाहे वह राम हों, इंद्र हों या लक्ष्मण. सिर्फ यही नहीं, शूर्पणखा रावण जैसे दानव चरित्र को भी कठघरे में खड़ा करती है कि उसने कैसे कथित तौर पर अपनी मुक्ति या अपने दंभ के लिए अपनी बहन को हथियार बनाया. ''पुरुष बस नारी को युद्ध के लिए बहाना ही नहीं बनाते, चारे की भांति प्रयोग भी करते हैं.”
प्रस्तुत उपन्यास एक ज्वलंत विषय को टटोलता है. संभव है अगर यह हिंदी की रचना होती तो अब तक या तो विवादित हो चुकी होती या प्रतिबंध झेल रही होती. हिंदी साहित्य में इस तरह की कोशिशें नगण्य हैं. मैथिलीशरण गुप्त का महाकाव्य साकेत भले ही लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला की पीड़ा को अभिव्यक्त करता है, लेकिन उसमें ऐसा तीव्र विद्रोही स्वर नहीं है. ओडिया में इसकी परंपरा पहले से है. महाभारत की प्रमुख पात्र द्रौपदी पर आधारित प्रतिभा राय का उपन्यास द्रौपदी  इसकी मिसाल है.
हालांकि हिंदी साहित्य और हिंदी पाठकों की दृष्टि में घर कर गईं धार्मिक कथाओं की स्त्री-विरोधी छवियों को तोडऩा बेहद कठिन है, लेकिन अच्छी बात है कि अन्य भारतीय भाषाओं में ऐसा हो रहा है. इस वजह से ऐसे उपन्यासों के हिंदी में ही नहीं बल्कि अन्य भाषाओं में अनुवाद की जरूरत है. वैश्रवणी  इस दिशा में सराहनीय कोशिश है. भाषा थोड़ी मुश्किल जरूर है लेकिन यह शायद पौराणिक काल को दर्शाने और उसे पकडऩे की वजह से है. लेकिन यह दुरुहता कथावस्तु की ज्वलंतता के सामने ठहरती नहीं. कहना न होगा, प्रस्तुत रचना को इस नजरिए से पढ़ा जाना न सिर्फ दिलचस्प है बल्कि बेहद जरूरी भी है.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay