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बदलते समाज के आईने से रू-ब-रू

ये किस्से हमें चिर-परिचित से लगते हैं, जिन्हें हम घर या पास-पड़ोस में देखते आए हैं. दिल के काफी करीब.

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मानसी शर्मा माहेश्वरी 23 July 2014
बदलते समाज के आईने से रू-ब-रू

कोहरे का सूरज
लेखकः जयनाथ मणि त्रिपाठी
प्रकाशकः अंचल भारती प्रकाशन, देवरिया-274001
कीमतः 200 रु.

महानगर, जहां पड़ोसी एक दूसरे को नहीं जानते, एक-दूसरे के सुख-दुख से किसी का कोई सरोकार नहीं है और जहां सड़क पर पड़ा घायल व्यक्ति तड़प-तड़प कर मर जाता है और लोग मूक दर्शक बने रहते हैं, ऐसे जीवन की कल्पना जीवन की सांझ देख रहे लोगों के गले नहीं उतरती.
हमारे लिए जो रोजमर्रा की बातें हैं उन्हें ही कुछ अलग नजर से देखने की कोशिश हैं ये कहानियां. जैसे, वापसी में अपने घर देवरिया पहुंचे बुजुर्ग के बारे में लेखक लिखते हैं, “उन्हें वह सब कुछ मिल गया जो दिल्ली ने उनसे छीन लिया था.” पीढ़ी का दर्द और निश्चत उदासी में युवाओं और बुजुर्गों के बीच बनी खाई और उसकी वजह से लगभग बेमानी करार दे दी गई बुजुर्गों के अनुभव से तैयार नसीहतों को लेखक ने खूबसूरती के साथ पिरोया है. सभी कहानियां अनुभवों की पोटली हैं, जिसे लेखक ने पूरी तरह खोलकर पाठकों के सामने रख दिया है. ये किस्से हमें चिर-परिचित से लगते हैं, जिन्हें हम घर या पास-पड़ोस में देखते आए हैं. दिल के काफी करीब.

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