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शायरी: पेड़ से लिपटी सोच

जावेद अख्तर की कुछ गजलों में भी सिलसिलेवार विधा को अपनाया गया है. इन गजलों में भी जिज्ञासा और मनन पाया जाता है जो अपना खास लुत्फ रखता है.

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aajtak.in
गोपीचंद नारंगनई दिल्‍ली, 18 August 2012
शायरी: पेड़ से लिपटी सोच

लावा
जावेद अख्तर
राजकमल प्रकाशन,
दरियागंज, नई दिल्ली-2,
कीमतः 250 रु.
info@rajkamalprakashan.com

जावेद अख्तर का कविता संग्रह तरकश वर्षों पहले आया था. .कुर्रतुलऐन हैदर ने इसकी भूमिका लिखी थी. जावेद ने गजलें भी कही हैं और नज्में भी, लेकिन उनका जादू नज्मों में चला; जैसे वक्त, वो कमरा याद आता है, एक मोहरे का सफर, मेरी आवारगी, भूख, मदर टेरेसा गोया उनका ट्रेडमार्क बन गईं. लेकिन ये न.ज्में जदीद (आधुनिक) नज्म की उस परंपरा से ख़ासी भिन्न हैं जो नून मीम राशिद, मीराजी और अख्तरुल ईमान से चली आती थी, या जो मजाज़, जां निसार अख्तर, मश्दूम, अली सरदार जाफरी और कैफी आजमी से संबद्ध थी.

जावेद के नए संग्रह में छोटी-बड़ी हर तरह की नज्में हैं. उनकी बुनत या संरचना में एक चीज जो बार-बार आकर्षित करती है वह है उनकी मानसिक जिज्ञासा या चिंतन और मनन. उनका चिंतन किसी समस्या की वास्तविकता को परखना, जटिल और बारीक गुत्थियों को सुलझाना, ब्रह्मांड के रहस्यों के साथ-साथ मानवीय आत्मा और जीवन के भेद को पाने का प्रयास है. ये खेल क्या है, कायनात, अजीब किस्सा है, बरगद, बर वक़्त एक और ख्य़ाल इन सब नज्मों में मूल्यों की जिज्ञासा ही उस मानसिकता को दर्शाती है जो कि जीवन के भेदों को पाने या राजों को जानने का प्रयास और जुस्तजू करती है. दूसरी बात यह कि आम तौर से नज्मों की रचना में जावेद छोटे-छोटे मिसरों से काम लेते हैं.

ऐसा नहीं कि लंबी बहरों (छंदों) में उन्होंने लिखा नहीं. बहुत-सी गजलें लंबी जमीनों में भी हैं, लेकिन न.ज्मों को वे टुकड़ों में बांट देते हैं जो कि सिलसिलेवार अपनी शाब्दिक विषयात्मकता से परत-परत गहराई में उतरते हुए पूरी कुशलता और कुशाग्रता के साथ काव्य को सृजित करते हैं. तीसरी विशेषता यह है कि वे सवाल पर सवाल उठाते हैं, चौथे यह कि इन दर्जा-ब-दर्जा सोचते हुए सवालों में वे पाठक को भी साथ रखते हैं और संवाद करते हुए, पंक्तियों को प्रश्नसूचक बनाते हुए आगे बढ़ते हैं. पांचवीं और आश्रिी बात यह कि इन न.ज्मों में चिंतन प्रश्नसूचक ही नहीं, कहीं कहीं विस्मयिक परिस्थितियों से भी उद्रित होता हैः

मैं सोचता हूं/ये मोहरे क्या हैं/अगर मैं समझूं/कि ये जो मोहरे हैं/सि.र्फ लकड़ी के हैं खिलौने/तो जीतना क्या हारना क्या. नज्म का शीर्षक है ये खेल क्या है. जैसे-जैसे वह आगे बढ़ती है अंदाजा होता है कि बात शतरंज की नहीं, जिंदगी के खेल की है. यह जीत-हार जिंदगी की समस्याओं की है. शतरंज केवल परदा है. कायनात ऐसी ही एक और गिरह दर गिरह रहस्यमयी नज्म है.

विस्तृत ब्रह्मांड का एक छोर से दूसरे छोर तक फैलाव जो अनंत है, यह एक ऐसा रहस्य है जिसको रूटीन समझ्कर आम तौर से मानव बेहिसी से गुजर जाता है. लेकिन दार्शनिक, साधु-संत, विद्वान सब इस रहस्यमयी समस्या से जूझते रहे हैं. जावेद की जिज्ञासापूर्ण दृष्टि यहां हर दृश्य को टटोलती है, सोचती है और प्रश्न करती हुई पाठक की समझ, बोध, आश्चर्य और विस्मय को संवाद से संबद्ध करती हुई चलती हैः मैं कितनी सदियों से तक रहा हूं/ये कायनात और उसकी वुसअत/तमाम हैरत तमाम हैरत/ये क्या तमाशा ये क्या समां है...जिसे समझते हैं हम फलक है/के जिसमें जुगनू की शक्ल में/हजारों सूरज पिघल रहे हैं...और अंत में फिर सवालों का सवाल सवाल ये है/वहां से आगे कोई जमीं है/कोई फलक है/अगर नहीं है/तो ये 'नहीं' कितनी दूर तक है.

चिंतन से परिपूर्ण स्वर और सोच की धार छोटी न.ज्मों में भी मिलती है. इन न.ज्मों की समस्याएं और प्रश्न भिन्न हैं. मगर बौद्धिक जिज्ञासा, कुछ सोचने-खोजने की लगन और प्रश्नसूचक संवाद में पाठक को आत्मविभोर करने की शैली वही है. अजीब क़िस्सा है, बरगद, शुदा हाफिज, आंसू, जबान ऐसी ही जीती-जागती सोचने पर मजबूर करती हुई नज्में हैं.

अजीब क़िस्सा है जितनी मानवीय संबंधों पर है, उतनी इस समस्या पर भी है कि आइडियल या मंजिल को पाने की डाह, उसकी तड़प और खोज में है, कामयाबी में नहीं. कई बार सफलता और संतुष्टि अपना पर्याय भी बन जाती है. बरगद उपनगरीय संस्कृति की यादें ताजा करता है कि हर चीज ज्‍यों की त्यों है, मोड़ भी, लोग भी, रास्ते भी लेकिन गांव में अपनापन और ठंडक की एक छांव थी जो वक्त के चक्रव्यूह में खो गई है जिसको वापस नहीं लाया जा सकता.

जावेद की गजलें भी इतनी ही चिंतनशील और मर्मस्पर्शी हैं. गजल का हर शेर इकाई होता है लेकिन कुछ गजलों में भी सिलसिलेवार विधा को अपनाया गया है. उनमें भी समान भावुकता की लय जहां धीमी है वहीं बौद्धिक चिंतन और विद्वता की फजा भी है जो नज्मों में है. गजल की सांकेतिकता में दार्शनिक परंपरा का अपना स्थान है पर यहां भी जावेद का अंदाज अलग है. अक्सर इनमें भी जिज्ञासा, चिंतन-मनन पाया जाता है जो अपना ख़ास लुत्फ़ रखता है.

इस संग्रह की अंतिम नज्म पेड़ से लिपटी बेल की गिनती जावेद की अतिसंवेदनशील नज्मों में करता हूं. इसमें चिंतन और जिज्ञासा की वही सवाल करती हुई रूपकबद्ध परिस्थिति है, वही छोटे-छोटे मिसरे, वही आश्चर्य और प्रश्न का वातावरण है, जो उनके सृजनात्मक हस्ताक्षर का दर्जा रखता है. बेल तो पेड़ की एक डाल से लिपटी मामूली-सी चीज है. पेड़ की खुशबू और रंगत उसमें समाती चली गई, और बजाए खुद यह पेड़ के वजूद का हिस्सा बन गई. पेड़ के बारे में यूं तो सौ अफ्साने थे, बेल का कोई जिक्र नहीं था. फिर कैसे आज बेल अपनी बांहों में पेड़ के पूरे वजूद को संभाले उसकी जिंदगी का सहारा बनी हुई है? बेल अपनी बांहों में अब है पेड़ संभाले/धीरे धीरे/घायल शाशें पर/पत्ते फिर से निकल रहे हैं/धीरे धीरे/नई जड़ें फूटी हैं/और धरती में गहरी उतर रही हैं/बेल पे जैसे/एक नई मुस्कान के नन्हे फूल खिले हैं. इस कविता में जिंदगी की निष्ठुरता और निराशा को आशा में बदल देने का मंजर है.

लेकिन यह पेड़ कौन है और यह बेल कौन है, जो आशा और निराशा का रूपक और व्यापकता का सूचक है. यह बेल लिपटी हुई भी इस प्रकार है कि अलग नहीं की जा सकती. यह संकेत आवश्यक है कि जावेद की शायरी में भावुकता का तूफान नहीं. यहां जोशो-श्रोश की आंधियां नहीं. लावा तो है, आग भी और चिंगारियों का दृश्य भी है जिसे हम देखते आ रहे हैं, लेकिन वह इकहरी रूमानियत नहीं जिसकी तीव्रता और सतहीपन ने कुछ प्रसिद्ध शायरों की शायरी को भावनाओं का दलदल बना दिया था.

पेड़ से लिपटी बेल दरअसल जमाने की तुंदो तेज आंधियों से जूझती और जिंदगी और रंगो-नूर का संकेत करती रचनात्मकता है, जिसके सहारे जिंदगी आगे बढ़ती रही है. सूरज अब का.फी आगे निकल आया है. पेड़ आंधियों और तू.फानों को झेल चुका है. शाश् दर शाश् लिपटी हुई आंतरिक रचनात्मकता और चिंतन मनन की बेल ही है जो बांहों में पेड़ को संभाले हुए है. यह हर मंजिल पर पेड़ के साथ उगती और फैलती रही है. आज अगर इसमें रंगो-नूर है तो यह केवल पेड़ ही के लिए नहीं, सबके लिए शुभ संकेत है.

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