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आषाढ़ की एक शाम साहित्य-संगीत के नाम

दो राय नहीं कि रचना उत्सव के लिए छत्तीसगढ़ का चुनाव अर्थसम्मत था. अपनी सांस्कृतिक बहुलताओं के कारण भी अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से इसकी ख्याति बेजोड़ रही है. अलबत्ता जिस शीर्ष पत्रिका को वे बरसों से पढ़ते, देखते आ रहे हैं,

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aajtak.in
संध्या द्विवेदी नई दिल्ली, 04 July 2019
आषाढ़ की एक शाम साहित्य-संगीत के नाम इंडिया टुडे रचना उत्सव

शनिवार की उस दोपहर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर का मौसम बारिश की प्रतीक्षा में जैसे बेचैन हुआ जा रहा था. एक तो मॉनसून की देरी, ऊपर से आग उगलता सूरज. लेकिन ठीक एक रोज पहले बस्तर में मॉनसून प्रवेश का ही असर था कि उसके आने की आहट उसी रात राजधानी को भिगो गई. नतीजा! तापमान एकाएक मानो 'तार सप्तक' से 'मंद्र सप्तक' यानी ऊपर से एकदम नीचे आ गया. ऐसे ही समय इंडिया टुडे ग्रुप का राजधानी वासियों को रचना उत्सव और सम्मान समारोह में सक्विमलित होने का न्यौता. जैसे फुहारें अंदर तक भिगो गईं. विचार, संगीत और सम्मान का यह समां 'दोबारा कब होगा? ' पूछा जाता रहा.

शहर के सिविल लाइंस इलाके के कॉफी हाउस का परिसर: दोपहर के कुछ पहले पड़ चुकी हल्की-हल्की फुहारों के कारण मौसम थोड़ा सुरीला हो गया था. प्रवेश मार्ग के करीब आम के पेड़ों की झूमती हुई डालों की सरसराहट. उस पर नए बने कन्वेंशन हॉल में समारोह. आगंतुक थोड़ा कौतुक के साथ आते दिखे. दरअसल कोई आयोजन 'कैसा है' से पहले 'कहां है' में रस लेने वाली बिरादरी के लिए यह सभागार अपनी मनोहरता से ध्यान खींचे जा रहा था. जब वे भीतर दाखिल हुए तो आयोजन की मंचीय व्यवस्था उनके लिए एक तरह से नवाचार थी.

तनिक ठहरिए! अभी तो इंडिया टुडे की सालाना प्रकाशित होने वाली साहित्य वार्षिकी का यह रचना उत्सव आरंभ ही नहीं हुआ था, फिर भी कुछ न होने में ही सुधी श्रोता-दर्शकों के समूह ''कुछ बेहतर'' होने वाला है, इस उम्मीद में आनंदित होते दिखे. शाम की ओर बढ़ रही यह एक ऐसी खुशनुमा दोपहरी थी जिसमें राजधानी का वह चुनिंदा वर्ग शामिल था जिनकी उपस्थिति किसी भी आयोजन की प्राथमिक सफलता पर मुहर लगा जाती है. रंगकर्म, साहित्य, फैशन, सिनेमा, लोक-संगीत और शास्त्रीय संगीत के अलावा प्रशासनिक जमावड़ा. सिद्ध और अनुभवी चेहरे. खचाखच भरा सभागार जैसे कह रहा था कि जगह कुछ और बड़ी हो जानी थी. मजा तो देखिए! जो लोग पसंदीदा सत्रों के हिसाब से आ-जा रहे थे, उनका कोलाहल तो था. अलावा इसके, बहुतेरे ऐसे शौकीनमिजाज पूरे समय चिमटा गाड़कर बैठे थे, जिनका दिल इस रूपाकार वाले दर्जेदार आयोजनों के नाम पर आमतौर पर धड़कता है.

मंच पर इंडिया टुडे की ओर से पेश हो रहा नतीजा रसदार है, इसे साबित करती थी दर्शकों की जीवंत उपस्थिति. नौजवान पीढ़ी इसे फेसबुक पर लाइव दिखाने में रमी थी तो अधिसंख्य रसिक इस बात की उधेड़बुन में थे कि कैसे डॉ. सुरेंद्र दुबे, डॉ. विष्णु सक्सेना या राहत इंदौरी से वन-टू-वन हो जाएं. पहले ही सत्र में दुबे तो सवालों का जवाब देते हुए कुर्सी छोड़कर डायस पर आ गए और कह दिया कि ''कविता पढ़ूं या कविता के बारे में बोलूं, मैं खड़े होकर ही अपनी बात कह सकता हूं.'' असल में कवि सम्मेलन में जाकर पाठ करने से इतर इस तरह इंटीमेट स्पेस में तयशुदा फॉर्मेट के तहत रचना पाठ, वह भी बैठकर! बदलाव का यह रूप दोनों ओर स्वीकार किया जाता रहा. एक वजह बातचीत भी थी. अपनी बोली की मिठास वाली पंक्तियों से लोकप्रिय हुए छत्तीसगढ़ के कवि डॉ. दुबे हों, गेयता से दिलों में घर कर जाने वाले अलीगढ़ के गीतकार डॉ. विष्णु सक्सेना हों या मालवा की बोली से भीगे गजलकार राहत इंदौरी. इनकी चुंबकीय उपस्थिति का रोमांच उनके रहने तक बना रहा! इंदौरी, सक्सेना और दुबे का सत्र एकालाप नहीं था. इंदौरी के पाठ का अंदाज तरन्नुम से इतर उनकी अपनी उपज के कारण हमेशा आनंदी बन जाया करता है. शायद ही कोई इस तरह से गजल पढ़ता हो, जहां मिसरे आगे-पीछे तो होते ही हैं, टूटते-जुड़ते भी हैं. उस पर आकाश की ओर देखता उनका चेहरा और नित बदलती भंगिमाएं. राहत सुनने वालों को भी नहीं बख्श रहे थे: ''मैं दो बातों से बड़ा परेशान होता हूं, एक तो जब घटिया शेर पर दाद मिलती है, दूसरे जब शेर को समझने में जल्दबाजी की जाती है.'' एक-एक घंटे के सत्र में तीनों ने फरमाइशों के अलावा स्वत:स्फूर्त नई रचनाएं भी सुनाईं. उधर, संगीत के दौर में मेघा श्रीराम डाल्टन की दमदार आवाज और उनका काले वस्त्रों में परफॉर्मेंस कुछ की नजर में (देह साक्वयता के चलते ) ''ये फरीदा खानम तो नहीं?'' ऐसा भी था.

ऐसे आयोजन में स्थानीयता के रचनात्मक सौंदर्य का स्मरण न किया जाए तो बात बराबर कैसे होगी. फिर प्रसंग तो रचना उत्सव था. अर्थात् साहित्य, कलाओं को जगह देकर यदि कहीं कुछ दर्जे का रचा, गुना जा रहा है तो उसे नोटिस में लाना. अत: इस एक दिनी उत्सव का समापन उन हस्तियों के अभिनंदन का था जो अपनी-अपनी रचनात्मकता से जीवन और समाज को कुछ और खूबसूरत बनाने में निरंतर योगदान दे रहे हैं. इंडिया टुडे (हिंदी) के संपादक अंशुमान तिवारी ने सम्मानित होने वाली पांचों हस्तियों के सम्मान से पूर्व छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के समक्ष कहा भी कि ''लोकतंत्र सभी रसों का निचोड़ है. हम इस प्रदेश के शिखर पुरुषों को उनके अपने घर में सम्मान देना चाहते थे.''

उधर, इंडिया टुडे के ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा ने अपने संबोधन में रचना उत्सव के महत्व पर रोशनी डाली और इसकी कामयाबी को इंडिया टुडे टीम की मेहनत का साझा नतीजा बताया. मुख्य अतिथि बघेल इस बात को रेखांकित कर गए कि ''इंडिया टुडे का एक दिन इस प्रदेश को देना और प्रादेशिक हस्तियों का अपने बैनर से सम्मान करना, यानी इस राज्य का सांस्कृतिक पर्यावरण एक बड़ी पत्रिका की नजर में है.'' गौरतलब है कि बघेल ने इस मौके पर छत्तीसगढ़ की पांच सांस्कृतिक शख्सियतों—विनोद कुमार शुक्ल (लेखन), तीजनबाई (पंडवानी), डॉ. अरुण कुमार शर्मा (पुरातत्व), मिर्जा मसूद (रंगकर्म) और राहुल सिंह (विषय विशेषज्ञ-संस्कृति और पुरातत्व)—को इंडिया टुडे संस्कृति सम्मान प्रदान किया. अस्वस्थ शुक्ल की जगह उनके सुपुत्र शाश्वत शुक्ल ने सम्मान ग्रहण किया.

दो राय नहीं कि रचना उत्सव के लिए छत्तीसगढ़ का चुनाव अर्थसम्मत था. अपनी सांस्कृतिक बहुलताओं के कारण भी अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से इसकी ख्याति बेजोड़ रही है. अलबत्ता जिस शीर्ष पत्रिका को वे बरसों से पढ़ते, देखते आ रहे हैं, उसकी साहित्य वार्षिकी का यह प्रयास सभी की नजर में साकार होता आनंद था जो पहले कहां देखा गया था? यही कारण था जो वे ''क्या साहित्य वार्षिकी'' प्रतिमाह निकलती है?'' पूछते दिखे. कुछ की जिज्ञासा थी कि क्या हम इसमें प्रकाशित होने को यहीं रचना दे दें? बाल सुलभ कौतुक ऐसा भी था कि क्या वे भी अपनी कोई रचना इस मंच से पढ़ सकते हैं! करीब करीब साढ़े पांच घंटे का समय कैसे बीता, पता ही नहीं चला. छत्तीसगढ़ सिनेमा के अभिनेता मन कुरैशी और अभिनेत्री अनुकृति चौहान को भी इस बीच मंच पर आमंत्रित किया गया. कहना न होगा, रचना और रचनात्मकता के संगम की खातिर ही तो यह उत्सव था. रचना उत्सव इसी समावेशी मन की तरफ समाज को जोडऩे का रचना पथ है. ठ्ठ

उन्होंने कहा, मेरा इंडिया टुडे से पुराना नाता है. काफी साल पहले जब इसका एक रिपोर्टर मेरे पास आया तो घर की चटनी-बासी खाने की जिद की थी. सम्मान लेते समय मुझे उसके साथ बिताया पल याद आ गया.

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