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फैंटेसी में तला सियासी व्यंग्य

धरना, प्रदर्शन और कथित जनांदोलन पर उपन्यास में की गई एक टिप्पणी काबिल-ए-गौर है, ''क्रांति की मशाल हर बार धधकती तो है लेकिन कुत्ते के टांग उठाते ही बुझ भी जाती है.

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aajtak.in
सईद अंसारीनई दिल्ली, 25 February 2020
फैंटेसी में तला सियासी व्यंग्य प्रजातंत्र के पकौड़े

कोई दो साल पुराना वाकया है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'पकौड़ा रोजगार' वाले बयान ने मीडिया जगत में हलचल पैदा कर दी थी. इस बयान के बाद से चुहल, छींटाकशी और कटाक्ष के लिए पकौड़ों का इस्तेमाल एक प्रतीक के रूप में लगातार होता आया है. लेकिन क्या हुआ जब इन सबके बीच एक आम पकौड़े वाले ने प्रधानमंत्री के बयान को गंभीरता से ले लिया? उसके बाद शुरू हुआ फैंटेसी की दुनिया का एक अनोखा सफर जो नोएडा में रामभरोसे पकौड़े वाले के ठेले से होता हुआ दावोस के वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम तक जा पहुंचा.

चर्चित व्यंग्य लेखक राकेश कायस्थ का उपन्यास प्रजातंत्र के पकौड़े कई वजहों से अलग है. इसमें करारा व्यंग्य फैंटेसी की तश्तरी में रखकर परोसा गया है. पटरी पर ठेला लगाने वाले रामभरोसे के पकौड़ा टाइकून बनने की पूरी कहानी इतनी दिलचस्प है कि किस्सागोई में आप पूरी तरह खो जाते हैं.घटनाएं आपको बांधे रखती हैं और दृश्य मुस्कराने और कई बार पेट पकड़कर हंसने को मजबूर करते हैं. व्यंग्य के साथ फैंटेसी का मेल कृश्न चंदर जैसे उर्दू अफसानानिगार की रचनाओं में खूब नजर आता है. इस लिहाज से कायस्थ के इस उपन्यास को एक अलग श्रेणी में रखा जा सकता है.

किताब पढ़ते वक्त ऐसा लगता है कि भारतीय राजनीति किसी बड़े रियलिटी शो का मंच है, जहां हर दिन कोई न कोई ओरिजनल ड्रामा होता रहता है. हाल के बरसों में राजनीति के मंच पर हुए हर बड़े तमाशे का रूपक इस किताब में नजर आता है. धरना, प्रदर्शन और कथित जनांदोलन पर उपन्यास में की गई एक टिप्पणी काबिल-ए-गौर है, ''क्रांति की मशाल हर बार धधकती तो है लेकिन कुत्ते के टांग उठाते ही बुझ भी जाती है.'' भाषा की ऐसी ही एक और बानगी देखिए, ''जब भी लोकतंत्र के खतरे में होने का शोर उठता है, समझदार नेता लोकतंत्र को फौरन लॉकर में बंद कर देता है, ताकि उसकी रक्षा की जा सके.''

पूरी किताब ऐसी ही चुटीली टिप्पणियों से भरी है. ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि ये टिप्पणियां अलग से चिपकाई गई नहीं हैं बल्कि एक बड़े कथानक में कुछ यूं पिरोई गई हैं कि सीवन दिखती नहीं. सम-सामयिक, सामाजिक-राजनैतिक स्थितियों को ठीक से समझने वालों को यह किताब ज्यादा मजा देगी पर आम पाठकों को भी यह पसंद आएगी. हालांकि आखिरी हिस्से में पहुंचकर लगता है कि घटनाक्रम अचानक तेजी से आगे बढ़ रहा है. इसके बावजूद पठनीयता बरकरार रहती है.

प्रजातंत्र के पकौड़े

लेखक: राकेश कायस्थ

प्रकाशक: किस्सागो, ओशिवरा, मुंबई

कीमत: 175 रुपए

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